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सेंट्रल एशिया को लेकर भारत का बड़ा रणनीतिक दांव, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक गलियारे पर टिकी दुनिया की नजर

वैश्विक भू-राजनीति के वर्तमान दौर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति लगातार नए आयाम गढ़ रही है, और इसी कड़ी में उनका ताशकंद मिशन पूरी दुनिया के सामरिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का केंद्र बन गया है। मध्य एशिया के दिल कहे जाने वाले उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद का यह दौरा भारत की उस बड़ी रणनीतिक सोच का हिस्सा है, जिसके जरिए नई दिल्ली यूरेशिया क्षेत्र में अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत करना चाहती है। यह दौरा केवल दो देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके सामरिक और आर्थिक निहितार्थ सुदूर भविष्य की वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

मध्य एशिया में भारत की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता

भारत का मध्य एशिया के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव सदियों पुराना रहा है, लेकिन आधुनिक समय में इस क्षेत्र की महत्ता ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक मार्गों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से कई गुना बढ़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति हमेशा से 'नेबरहुड फर्स्ट' के साथ-साथ 'एक्सटेंडेड नेबरहुड' यानी विस्तारित पड़ोस पर केंद्रित रही है। मध्य एशिया के देश, जिनमें उज्बेकिस्तान की स्थिति भौगोलिक रूप से बेहद सामरिक है, भारत के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ताशकंद मिशन के जरिए भारत इस क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा और मध्य एशियाई बाजारों तक अपनी अबाध पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम बढ़ा रहा है।

ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक गलियारों का नया समीकरण

आज के वैश्वीकृत युग में किसी भी देश की आर्थिक प्रगति उसकी ऊर्जा सुरक्षा पर निर्भर करती है और मध्य एशिया प्राकृतिक गैस तथा यूरेनियम जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों का अपार भंडार है। प्रधानमंत्री मोदी के इस ताशकंद दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत और उज्बेकिस्तान के बीच ऊर्जा सहयोग को एक नए मुकाम पर ले जाना है। इसके साथ ही, उत्तर-दक्षिण अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारा (INSTC) और अश्गाबात समझौते जैसी पहलों के माध्यम से भारत ताशकंद के जरिए रूस, यूरोप और मध्य एशिया के अन्य बाजारों से जुड़ने के नए और सस्ते व्यापारिक रास्ते तलाश रहा है। समुद्री मार्गों की निर्भरता को कम करते हुए थल मार्ग से होने वाले इस व्यापारिक विस्तार से भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई मजबूती मिलने की पूरी संभावना है।

क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ साझा रणनीति

मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के सामने आतंकवाद, कट्टरपंथ और सीमा पार से होने वाली अस्थिरता एक बहुत बड़ी और साझा चुनौती बनी हुई है। ताशकंद में हो रही उच्चस्तरीय बैठकों और वार्ताओं में इस बात पर विशेष जोर दिया जा रहा है कि कैसे दोनों देश मिलकर क्षेत्रीय सुरक्षा को चाक-चौबंद कर सकें। अफगानिस्तान के मौजूदा हालात और वहां की राजनीतिक अनिश्चितता का असर पूरे मध्य एशियाई क्षेत्र पर पड़ता है, इसलिए भारत और उज्बेकिस्तान के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और आतंकवाद विरोधी अभियानों को संयुक्त रूप से धार देने पर सहमति बन रही है। यह रणनीतिक तालमेल न केवल दोनों देशों की आंतरिक सुरक्षा के लिए फायदेमंद है, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य माना जा रहा है।

सांस्कृतिक कूटनीति और जन-से-जन संपर्क का विस्तार

कूटनीति के केवल राजनीतिक और आर्थिक आयामों से परे, प्रधानमंत्री मोदी हमेशा से सांस्कृतिक संबंधों और लोगों के बीच आपसी जुड़ाव को मजबूत करने पर बल देते रहे हैं। उज्बेकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते बॉलीवुड, योग, आयुर्वेद और ऐतिहासिक धरोहरों के जरिए बेहद गहरे हैं। ताशकंद में भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों का आकर्षण और वहां हिंदी भाषा के अध्ययन के प्रति बढ़ती रुचि दोनों देशों के रिश्तों में एक मानवीय तंतु का काम करती है। इस यात्रा के दौरान सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नए समझौतों पर मुहर लगने की उम्मीद है, जिससे दोनों देशों के युवा और पेशेवर एक-दूसरे के करीब आ सकेंगे और भविष्य की साझेदारियों की नींव को और अधिक ठोस बना सकेंगे।

भू-राजनीतिक संतुलन और भारत का वैश्विक कद

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में वर्तमान समय को बड़े फेरबदल का दौर माना जा रहा है, जहां पारंपरिक साझेदारियां बदल रही हैं और नए समीकरण आकार ले रहे हैं। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ताशकंद दौरा यह स्पष्ट संदेश देता है कि भारत अब वैश्विक मामलों में एक मूक दर्शक नहीं, बल्कि एक 'विशिष्ट खिलाड़ी' (Key Player) के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है। मध्य एशिया जैसे सामरिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में भारत की यह सक्रियता पश्चिमी देशों और पूर्वी शक्तियों दोनों का ध्यान आकर्षित कर रही है। आने वाले समय में यह रणनीतिक दांव भारत को ऊर्जा, व्यापार और कूटनीति के मोर्चे पर एक अजेय बढ़त दिलाने में मददगार साबित होगा, जिससे ग्लोबल साउथ के देशों के बीच भी भारत का नेतृत्व करने वाला कद और अधिक मजबूत होगा।