
वैश्विक भू-राजनीति और एशिया के सामरिक गलियारों से इस समय एक बहुत बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है। चीन की राजनीति और सेना के भीतर चल रहे उथल-पुथल के दौर के बीच देश के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक बेहद कड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है। भारत के साथ सीमा विवादों के केंद्र में रहे और डोकलाम तथा गलवान घाटी संघर्ष के दौरान पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के वेस्टर्न थिएटर कमांड की कमान संभालने वाले शीर्ष चीनी जनरल झाओ जोंगकी को देश के सर्वोच्च राजनीतिक सलाहकार निकाय से आधिकारिक तौर पर बाहर कर दिया गया है। इस कार्रवाई ने एक बार फिर बीजिंग के सत्ता गलियारों में चल रही अंदरूनी खींचतान और शी जिनपिंग द्वारा सैन्य नेतृत्व में किए जा रहे बड़े पैमाने पर फेरबदल को दुनिया के सामने ला खड़ा किया है। भारत की सीमाओं पर आक्रामक सैन्य नीतियों के लिए जाने जाने वाले इस वरिष्ठ जनरल की अचानक हुई यह विदाई अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में चर्चा का मुख्य विषय बन गई है।
चीनी सरकारी एजेंसी शिन्हुआ का आधिकारिक एलान और बिना कारण बताए निष्कासन
चीन की सरकारी और आधिकारिक समाचार एजेंसी 'शिन्हुआ' द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, जनरल झाओ जोंगकी को चाइनीज पीपुल्स पॉलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस (CPPCC) और उससे जुड़े अन्य महत्वपूर्ण पदों से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है। बीजिंग की कार्यशैली के अनुरूप, इस उच्चस्तरीय निष्कासन के पीछे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी या सरकार की ओर से कोई भी स्पष्ट कारण साझा नहीं किया गया है। इसके अलावा, आधिकारिक तौर पर यह भी घोषणा नहीं की गई है कि जनरल झाओ के खिलाफ किसी प्रकार की औपचारिक जांच शुरू की गई है या उन्हें केवल राजनीतिक प्रशासनिक दायित्वों से मुक्त किया गया है। हालांकि, कूटनीतिक जानकारों और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के अचानक उठाए गए कदम सामान्य नहीं होते हैं और इसके पीछे गहरे रणनीतिक तथा आंतरिक राजनीतिक कारण छिपे हो सकते हैं।
पीएलए (PLA) के भीतर शी जिनपिंग द्वारा बड़े पैमाने पर अधिकारियों की सफाई अभियान
जनरल झाओ जोंगकी को इस प्रकार से बाहर किए जाने का यह घटनाक्रम ऐसे संवेदनशील समय में सामने आया है जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी ही सेना यानी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के भीतर बड़े पैमाने पर सफाई अभियान चला रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में शी जिनपिंग ने सेना के भीतर कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों, थिएटर कमांड के प्रमुखों, रक्षा विश्वविद्यालयों के नेतृत्व और हथियार खरीद से जुड़े महत्वपूर्ण विभागों के अधिकारियों को उनके पदों से हटा दिया है। चूंकि शी जिनपिंग सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CPC) के महासचिव होने के साथ-साथ शक्तिशाली सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) के अध्यक्ष भी हैं, इसलिए सेना पर उनकी पकड़ सर्वोपरि है। हाल ही में शी जिनपिंग ने दो बेहद वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों—झांग यूक्सिया और लियू झेनली—को भी सीएमसी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इन दोनों दिग्गजों के हटने के बाद अब सात सदस्यों वाले इस अत्यंत प्रभावशाली सैन्य आयोग में केवल दो सक्रिय सदस्य ही बचे हैं, जिनमें खुद राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी शामिल हैं। इस बात से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि ड्रैगन की सेना के भीतर शीर्ष स्तर पर किस कदर अविश्वास और फेरबदल का दौर चल रहा है।
कौन हैं जनरल झाओ जोंगकी और भारत के साथ उनका क्या रहा है इतिहास?
जनरल झाओ जोंगकी पीएलए के उन चुनिंदा जनरलों में शामिल रहे हैं जिन्होंने भारत के साथ लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की सुरक्षा देखने वाले सबसे संवेदनशील 'वेस्टर्न थिएटर कमांड' के कमांडर के रूप में कार्य किया है। उनके कार्यकाल के दौरान भारत और चीन के बीच दो सबसे बड़े और गंभीर सैन्य गतिरोध सामने आए थे, जिन्होंने दोनों देशों के संबंधों को ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर ला दिया था।
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2017 का डोकलाम गतिरोध (Doklam Standoff): वर्ष 2017 में जब भारत और चीन की सेनाएं भूटान-तिब्बत-भारत ट्राई-जंक्शन पर स्थित डोकलाम क्षेत्र में आमने-सामने आ गईं और 73 दिनों तक भारी तनाव बना रहा, उस दौरान जनरल झाओ जोंगकी ही वेस्टर्न थिएटर कमांड की कमान संभाल रहे थे। इस संकट के दौरान उनके आक्रामक रुख की चर्चा पूरी दुनिया के रक्षा गलियारों में थी।
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2020 की गलवान घाटी की खूनी झड़प (Galwan Valley Clash): इसके बाद मई 2020 में पूर्वी लद्दाख सेक्टर में एलएसी के विभिन्न बिंदुओं पर चीनी सैनिकों की भारी तैनाती और 15 जून 2020 को गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प भी उन्हीं के कार्यकाल में हुई। इस भीषण संघर्ष में भारत के 20 वीर सैनिक मातृभूमि के लिए बलिदान हुए थे, जबकि चीनी पक्ष को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा था जिसकी पुष्टि बीजिंग ने बहुत समय बाद की थी।
समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा 2020 में जारी की गई एक सनसनीखेज रिपोर्ट में अमेरिकी खुफिया सूत्रों का हवाला देते हुए यह दावा किया गया था कि जनरल झाओ जोंगकी ने ही कथित तौर पर भारत को सबक सिखाने के लिए गलवान घाटी के उस आक्रामक ऑपरेशन को अपनी सीधी मंजूरी दी थी। भारत विरोधी रणनीतियों को अमली जामा पहनाने वाले इस शीर्ष जनरल का इस तरह से राजनीतिक सलाहकार संस्था से बाहर होना सामरिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।
निष्कर्ष: चीनी सैन्य नेतृत्व में बदलाव और भारत के दृष्टिकोण से इसके मायने
कुल मिलाकर देखा जाए तो जनरल झाओ जोंगकी की विदाई और शी जिनपिंग द्वारा चीनी सेना में चलाए जा रहे इस बड़े उच्चस्तरीय शुद्धिकरण अभियान ने यह साबित कर दिया है कि बीजिंग के आंतरिक सत्ता समीकरणों में कुछ भी सामान्य नहीं चल रहा है। एक तरफ जहां शी जिनपिंग पार्टी और सेना पर अपनी पकड़ को और अधिक तानाशाही और केंद्रीकृत बनाते जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गलवान और डोकलाम जैसे सीमा विवादों के प्रमुख किरदारों का इस प्रकार से हाशिए पर जाना यह संकेत देता है कि चीन की क्षेत्रीय रणनीतियों की समीक्षा भी आंतरिक स्तर पर की जा रही है। भारत के रणनीतिक और सुरक्षा प्रतिष्ठान इन तमाम गतिविधियों पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि सीमावर्ती क्षेत्रों की कमान संभालने वाले जनरलों का इस प्रकार हटना पड़ोसी देश के आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर चल रहे बड़े बदलावों की कहानी कहता है।
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