
वैश्विक महाशक्तियों के बीच बर्फीले आर्कटिक क्षेत्र में वर्चस्व की जंग अब अपने सबसे निर्णायक और आक्रामक मोड़ पर पहुंच चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा कूटनीतिक और रणनीतिक कदम उठाते हुए डेनमार्क और स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड के साथ एक ऐतिहासिक त्रिस्तरीय सुरक्षा समझौते (Trilateral Security Deal) की घोषणा कर दी है। इस समझौते के तहत वॉशिंगटन को ग्रीनलैंड की सुरक्षा, बेसिंग और रणनीतिक जरूरतों पर स्थायी अधिकार हासिल होगा।
ट्रंप ने इसे बिना किसी समाप्ति तिथि वाला एक 'इनफिनिट लाइफ एग्रीमेंट' (अनंतकालीन समझौता) करार दिया है। इस नए समझौते ने मास्को में व्लादिमीर पुतिन और बीजिंग में शी जिनपिंग के सत्ता गलियारों में भारी खलबली मचा दी है, क्योंकि इस समझौते का सीधा और प्राथमिक मकसद रूस और चीन को आर्कटिक के विशाल बर्फीले गलियारे से पूरी तरह बेदखल करना है।
क्या है ट्रंप का 'इनफिनिट' ग्रीनलैंड समझौता और अमेरिका को क्या मिला
इस समझौते की औपचारिक रूपरेखा संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के इतर हस्ताक्षरित होने जा रही है। समझौते के प्रमुख प्रावधानों के मुताबिक, किसी भी गैर-नाटो (Non-NATO) देश को ग्रीनलैंड की जमीन, जलक्षेत्र या हवाई क्षेत्र में सैन्य बेस बनाने, सैन्य उपस्थिति दर्ज करने या संवेदनशील बुनियादी ढांचे में निवेश करने की सख्त मनाही होगी। अमेरिका को यहां न केवल स्थायी ओवरफ्लाइट और बेसिंग अधिकार मिले हैं, बल्कि वह भविष्य में अपनी जरूरत के हिसाब से नए सैन्य प्रतिष्ठान भी स्थापित कर सकेगा।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता ग्रीनलैंड की संप्रभुता और वहां के नागरिकों के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान करता है, लेकिन साथ ही नाटो और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र की साझा सुरक्षा को अभेद्य बनाता है। अमेरिका पहले से ही उत्तरी ग्रीनलैंड में अपना रणनीतिक 'पितुफिक स्पेस बेस' (पूर्व में थूले एयर बेस) संचालित करता है। अब इस समझौते के बाद अमेरिका दक्षिणी ग्रीनलैंड में अतिरिक्त सैन्य ठिकाने और अत्याधुनिक रडार प्रणालियां लगाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नींद क्यों उड़ गई
रूस के लिए ग्रीनलैंड का यह अमेरिकी नियंत्रण सीधे तौर पर उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और परमाणु निवारक क्षमता (Nuclear Deterrence) पर कड़ा प्रहार है। रूस और उत्तरी अमेरिका के बीच इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBMs) का सबसे छोटा हवाई मार्ग उत्तरी ध्रुव और आर्कटिक के ऊपर से होकर गुजरता है। ग्रीनलैंड ठीक इसी मिसाइल ट्रैजेक्ट्री के केंद्र में स्थित है।
अमेरिका का प्रस्तावित 'गोल्डन डोम' (Golden Dome) मिसाइल डिफेंस सिस्टम ग्रीनलैंड की इस भौगोलिक स्थिति पर पूरी तरह निर्भर है। ग्रीनलैंड में उन्नत अर्ली-वार्निंग रडार, स्पेस-ट्रैकिंग सेंसर्स और इंटरसेप्टर मिसाइलें तैनात होने से रूस के हाइपरसोनिक और बैलिस्टिक हथियारों को उड़ान के शुरुआती चरण में ही ट्रैक और नष्ट किया जा सकेगा। इसके अलावा, रूसी नौसेना के उत्तरी बेड़े (Northern Fleet) की परमाणु पनडुब्बियों के लिए अटलांटिक महासागर में प्रवेश का पारंपरिक 'जीआईयूके गैप' (ग्रीनलैंड-आइसलैंड-यूके) अब पूरी तरह से अमेरिकी और नाटो की निगरानी में जकड़ जाएगा, जिससे रूसी पनडुब्बियों की गोपनीय गश्त पर लगभग पूर्ण विराम लग जाएगा।
चीन के 'पोलर सिल्क रोड' और दुर्लभ खनिजों के सपने पर लगा ताला
चीन भले ही आर्कटिक का प्रत्यक्ष तटीय देश न हो, लेकिन उसने खुद को एक दशक पहले ही 'नियर-आर्कटिक स्टेट' (Near-Arctic State) घोषित कर रखा है। चीन अपने महत्वाकांक्षी 'पोलर सिल्क रोड' (Polar Silk Road) प्रोजेक्ट के जरिए पिघलते आर्कटिक समुद्री मार्गों पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहता था, जिससे यूरोप के लिए उसका व्यापारिक मार्ग हफ्तों छोटा हो जाता। इसके लिए बीजिंग पिछले कई वर्षों से ग्रीनलैंड में हवाई अड्डों के विस्तार, अनुसंधान केंद्रों की स्थापना और खनन परियोजनाओं में भारी निवेश की कोशिश कर रहा था।
ट्रंप के इस मास्टरस्ट्रोक ने चीन के इन सभी मंसूबों पर पूरी तरह ताला जड़ दिया है। समझौते की शर्तों के अनुसार, अमेरिका की स्पष्ट मंजूरी के बिना कोई भी चीनी कंपनी ग्रीनलैंड के बंदरगाहों, हवाई पट्टियों या रणनीतिक क्षेत्रों में एक डॉलर का भी निवेश नहीं कर सकेगी। इसके अलावा, ग्रीनलैंड में दुनिया के सबसे बड़े अविकसित दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (Rare Earth Elements) और क्रिटिकल मिनरल्स के विशाल भंडार दबे हैं, जो इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर और आधुनिक हथियार प्रणालियों के लिए अपरिहार्य हैं। चीन वर्तमान में वैश्विक रेयर अर्थ सप्लाई चेन पर एकाधिकार रखता है, लेकिन ग्रीनलैंड के अमेरिकी सुरक्षा छतरी के नीचे आने से पश्चिमी देश चीन पर अपनी निर्भरता पूरी तरह खत्म करने के करीब पहुंच गए हैं।
भारत, नई दिल्ली और वैश्विक भू-राजनीति पर इस बदलाव का प्रभाव
आर्कटिक में शक्ति संतुलन का यह पुनर्गठन भारत के सामरिक और आर्थिक हितों के लिहाज से भी अत्यंत प्रासंगिक है। भारत की आधिकारिक 'आर्कटिक नीति' (Arctic Policy) इस क्षेत्र में सतत अनुसंधान, जलवायु परिवर्तन के अध्ययन और वैश्विक समुद्री मार्गों की स्थिरता पर केंद्रित है। नई दिल्ली, जो रूस के साथ ऊर्जा व्यापार और पश्चिमी देशों के साथ सुरक्षा साझेदारी का संतुलन बनाती है, इस क्षेत्र में बढ़ते सैन्यीकरण पर बारीक नजर रखे हुए है।
यदि आर्कटिक का उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route) अत्यधिक तनावग्रस्त होता है, तो भविष्य के वैकल्पिक व्यापारिक गलियारों और ऊर्जा प्रवाह पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। हालांकि, दुर्लभ पृथ्वी खनिजों पर चीन के वैश्विक एकाधिकार को तोड़ने का कोई भी कदम भारत के उभरते हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्र के लिए दीर्घकाल में सप्लाई चेन की सुरक्षा के लिहाज से फायदेमंद साबित हो सकता है।
नए शीत युद्ध का केंद्र बनता बर्फीला आर्कटिक
जलवायु परिवर्तन के कारण ध्रुवीय बर्फ के तेजी से पिघलने से आर्कटिक का क्षेत्र अब केवल वैज्ञानिकों के शोध का विषय नहीं रहा, बल्कि यह नए शीत युद्ध (Cold War 2.0) का सबसे संवेदनशील अखाड़ा बन चुका है। अप्रयुक्त तेल, प्राकृतिक गैस, रणनीतिक खनिजों और सबसे छोटे समुद्री नौवहन मार्गों पर नियंत्रण पाने की यह होड़ आने वाले दिनों में और विकराल रूप ले सकती है।
ट्रंप प्रशासन द्वारा ग्रीनलैंड को अपनी सुरक्षा परिधि में पूरी तरह शामिल कर लेने से अमेरिका ने यह साफ कर दिया है कि वह पश्चिमी गोलार्ध और उत्तरी अटलांटिक में किसी भी विरोधी महाशक्ति की मौजूदगी को रत्ती भर भी बर्दाश्त नहीं करेगा। रूस और चीन की संयुक्त प्रतिक्रिया अब इस बात पर निर्भर करेगी कि वे आर्कटिक परिषद के मंचों और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों में किस हद तक अपनी नौसैनिक और राजनयिक चुनौती को आगे बढ़ाते हैं।
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