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नेशनल स्टील पॉलिसी 2047: भारत का 604 MT स्टील उत्पादन क्षमता का महात्वाकांक्षी रोडमैप, ‘ग्रीन स्टील’ और डीकार्बोनाइजेशन पर सबसे बड़ा दांव

भारत को वैश्विक विनिर्माण और बुनियादी ढांचे का सिरमौर बनाने की दिशा में इस्पात मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी औद्योगिक रोडमैप पेश किया है। देश की आजादी के शताब्दी वर्ष यानी 2047 तक 'विकसित भारत' के संकल्प को धरातल पर उतारने के लिए नेशनल स्टील पॉलिसी (NSP) के नए विजन के तहत कच्चा इस्पात (Crude Steel) उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 604 मिलियन टन (MT) प्रति वर्ष करने का महात्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया है। मौजूदा समय में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने, आयात पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त करने और घरेलू स्तर पर प्रति व्यक्ति इस्पात खपत को विकसित देशों के समकक्ष पहुंचाने के लिए यह विस्तार बेहद अहम माना जा रहा है। सरकार का यह कदम केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी लाकर पर्यावरण-अनुकूल 'ग्रीन स्टील' (Green Steel) तकनीक को अपनाने की दिशा में एक युगांतरकारी मोड़ साबित होगा।

2047 तक 604 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का विशाल औद्योगिक खाका

नेशनल स्टील पॉलिसी के पुराने लक्ष्यों में वर्ष 2030-31 तक 300 मिलियन टन की क्षमता हासिल करने की योजना बनाई गई थी, जिसे अब नई गति देते हुए वर्ष 2047 तक 604 मिलियन टन तक विस्तारित किया गया है। भारत में तीव्र गति से हो रहे शहरीकरण, राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलवे डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और रक्षा विनिर्माण की भारी मांग को पूरा करने के लिए घरेलू इस्पात की उपलब्धता रीढ़ की हड्डी का काम करेगी। इस्पात विशेषज्ञों के अनुसार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज महारत्न कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) और राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड (RINL) के साथ-साथ निजी क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों जैसे टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू स्टील, और जिंदल स्टील एंड पावर को विशाल पूंजी निवेश (Capex) के जरिए अपनी उत्पादन इकाइयों का विस्तार करना होगा। इस मेगा इंडस्ट्रियल विस्तार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों कुशल व अर्ध-कुशल रोजगार के अवसरों का सृजन होगा, जिससे औद्योगिक राज्यों विशेषकर ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश की क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा।

ग्रीन स्टील और डीकार्बोनाइजेशन पर सरकार का अभूतपूर्व फोकस

पारंपरिक स्टील उत्पादन प्रक्रिया कोयले और कोक पर अत्यधिक निर्भर होती है, जिसके चलते यह क्षेत्र वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जकों में गिना जाता है। नेशनल स्टील पॉलिसी के नए दिशा-निर्देशों में साफ किया गया है कि 604 मीट्रिक टन की ओर बढ़ता कदम पर्यावरण की अनदेखी करके नहीं उठाया जाएगा। भारत ने 2070 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन का जो लक्ष्य तय किया है, उसे साधने के लिए स्टील सेक्टर का डीकार्बोनाइजेशन सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसके लिए इस्पात मंत्रालय ने 'ग्रीन स्टील' निर्माण को अनिवार्य प्राथमिकता में शामिल किया है। ग्रीन स्टील वह इस्पात है जिसके निर्माण में पारंपरिक जीवाश्म ईंधन की जगह नवीकरणीय ऊर्जा (सोलर एवं विंड) और हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) का उपयोग किया जाता है। नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के साथ स्टील प्लांट्स को जोड़ा जा रहा है ताकि ब्लास्ट फर्नेस में कोकिंग कोल की खपत को धीरे-धीरे घटाकर न्यूनतम स्तर पर लाया जा सके। इसके अलावा कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) तकनीकों को बड़े प्लांट्स में पायलट प्रोजेक्ट से आगे बढ़ाकर व्यावसायिक स्तर पर लागू करने की दिशा में रियायतें और प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं।

स्क्रैप रीसाइक्लिंग, सर्कुलर इकोनॉमी और स्क्रैप-बेस्ड फर्नेस को बढ़ावा

कच्चे लौह अयस्क (Iron Ore) पर दबाव कम करने और ऊर्जा खपत घटाने के लिए सरकार स्टील स्क्रैप रीसाइक्लिंग नीति को आक्रामक रूप से लागू कर रही है। देश में व्हीकल स्क्रैपेज पॉलिसी और औद्योगिक कबाड़ प्रबंधन के जरिए उच्च गुणवत्ता वाले स्टील स्क्रैप का संग्रह बढ़ाया जा रहा है। स्क्रैप-आधारित इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) और इंडक्शन फर्नेस (IF) के जरिए स्टील तैयार करने से कार्बन उत्सर्जन में 60 से 70 प्रतिशत तक की सीधी कमी आती है। घरेलू स्तर पर पर्याप्त स्क्रैप उपलब्ध कराने के लिए प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में आधुनिक ऑटोमेटेड श्रेडिंग और सेग्रीगेशन सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। इससे न केवल सर्कुलर इकोनॉमी को गति मिल रही है, बल्कि द्वितीयक इस्पात उत्पादकों (Secondary Steel Producers) को भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उच्च गुणवत्ता वाले बार, रॉड और स्ट्रक्चरल स्टील बनाने में मदद मिल रही है।

कच्चे माल की सुरक्षा और कोकिंग कोल के आयात पर निर्भरता कम करने का प्लान

604 मिलियन टन स्टील उत्पादन का लक्ष्य साधने के लिए देश को अरबों टन उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क और कोकिंग कोल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी। वर्तमान में भारत कोकिंग कोल के लिए काफी हद तक ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों के आयात पर निर्भर है, जिससे विदेशी मुद्रा का बड़ा बहिर्वाह होता है। इस निर्भरता को तोड़ने के लिए घरेलू कोकिंग कोल वॉशरियों की तकनीक को अपग्रेड किया जा रहा है और नॉन-कोकिंग कोल को उच्च तापमान पर इस्तेमाल करने योग्य बनाने के लिए कोल गैसीफिकेशन तकनीकों पर काम तेज कर दिया गया है। इसके साथ ही खान मंत्रालय के सहयोग से देश के भीतर नए लौह अयस्क ब्लॉकों की पारदर्शी नीलामी की जा रही है और स्लरी पाइपलाइनों का नेटवर्क खड़ा किया जा रहा है ताकि खानों से सीधे स्टील प्लांटों तक कच्चे माल की ढुलाई सस्ती, सुरक्षित और प्रदूषण-मुक्त तरीके से हो सके।

वैश्विक प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय कार्बन बॉर्डर टैक्स (CBAM) का मुकाबला

यूरोपीय संघ द्वारा लागू किए जा रहे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे वैश्विक नियमों ने भारतीय इस्पात उद्योग के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। यदि भारतीय निर्यातक ग्रीन मानकों का पालन नहीं करते, तो उनके उत्पादों पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी कार्बन टैक्स लगाया जा सकता है। नेशनल स्टील पॉलिसी का 2047 का यह विजन इसी खतरे को अवसर में बदलने का रक्षा कवच है। जब भारत में ग्रीन स्टील का उत्पादन बड़े पैमाने पर होगा, तो भारतीय इस्पात न केवल घरेलू बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करेगा बल्कि अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व के देशों में भी बिना किसी व्यापारिक बाधा के शीर्ष वरीयता हासिल करेगा। सरकार उच्च श्रेणी के स्पेशियलिटी स्टील और ऑटोमोबाइल-ग्रेड स्टील के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के अगले चरणों को भी इस नीति के साथ एकीकृत कर रही है, जिससे भारत आयातक से बदलकर वैश्विक स्टील का सबसे भरोसेमंद निर्यातक बनकर उभरेगा।