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डेढ़ साल की उम्र में पैरों ने छोड़ा साथ, अटूट हौसले से हरविंदर सिंह ने रचा इतिहास

जिंदगी में जब मुश्किलें और शारीरिक सीमाएं इंसान का रास्ता रोकने की कोशिश करती हैं, तो केवल अटूट इच्छाशक्ति और अटूट हौसला ही वह हथियार बनता है जो किसी को इतिहास रचने की दिशा में आगे बढ़ाता है। भारतीय पैरा तीरंदाजी (Para Archery) के स्टार खिलाड़ी हरविंदर सिंह (Harvinder Singh) की जीवन यात्रा भी कुछ ऐसी ही संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक रही है। बचपन में महज डेढ़ साल की उम्र में एक गलत इंजेक्शन के कारण उनके पैरों ने काम करना बंद कर दिया था, लेकिन इस शारीरिक चुनौती को उन्होंने कभी अपनी नियति नहीं माना। अपनी कड़ी मेहनत, निरंतर अभ्यास और कभी न हार मानने वाले जज्बे के बल पर हरविंदर सिंह ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन किया है। एशियन पैरा गेम्स (Asian Para Games) में शानदार प्रदर्शन करते हुए उन्होंने तीरंदाजी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक (Gold Medal) अपने नाम कर लिया है। उनकी इस स्वर्णिम सफलता ने न केवल पूरे देश का सीना गर्व से चौड़ा किया है, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए भी एक उम्मीद की किरण जलाई है जो कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे हैं।

बचपन का वह दुखद हादसा और किसान परिवार से उठकर वैश्विक चैंपियन बनने का सफर

हरियाणा के एक छोटे से गांव के मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे हरविंदर सिंह की शुरुआत बेहद साधारण रही। जब वे केवल डेढ़ साल के थे, तो उन्हें तेज बुखार आया था। इलाज के दौरान एक गलत दवा या इंजेक्शन के रिएक्शन के कारण उनके दोनों पैरों में पैरालिसिस यानी लकवा मार गया। इस हादसे ने उनके परिवार को झकझोर कर रख दिया, लेकिन हरविंदर ने बचपन से ही कभी खुद को दूसरों से कमजोर नहीं समझा। पढ़ाई में अव्वल रहने के साथ-साथ उन्होंने खेल के प्रति अपनी रुचि को बनाए रखा। कॉलेज के दिनों में उन्होंने पहली बार तीरंदाजी के खेल को देखा और 2012 के लंदन पैरालंपिक से प्रेरित होकर धनुष-बाण थामने का फैसला किया। खेत की पगडंडियों से शुरू हुआ यह सफर आज दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों तक पहुंच चुका है, जहां वे लगातार भारत के लिए पदक जीत रहे हैं।

एशियन पैरा गेम्स के रोमांचक फाइनल में हरविंदर सिंह का दबदबा

एशियन पैरा गेम्स के इस ऐतिहासिक मुकाबले में हरविंदर सिंह की शुरुआत से ही बेहद एकाग्रता और सटीकता देखने को मिली। रिकर्व पुरुष व्यक्तिगत स्पर्धा के फाइनल मैच में उनका सामना दुनिया के बेहतरीन पैरा तीरंदाजों से था। बेहद तनावपूर्ण और कड़े मुकाबले के दौरान हरविंदर ने अपनी नसों पर गजब का नियंत्रण बनाए रखा और एक के बाद एक सटीक निशाने साधे। जब फाइनल सेट में उन्होंने अपने अंतिम तीर से सीधे बुल आई (Bullseye) को भेदा, तो पूरे स्टेडियम में भारत के समर्थन में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। विपक्षी खिलाड़ी को करारी शिकस्त देकर जब हरविंदर सिंह ने स्वर्ण पदक जीता, तो भारतीय तिरंगा सबसे ऊपर फहराया गया और राष्ट्रगान की गूंज ने हर भारतीय खेल प्रेमी के रोंगटे खड़े कर दिए।

पढ़ाई और खेल का अनोखा तालमेल: पीएचडी की डिग्री के साथ खेल के मैदान पर परचम

हरविंदर सिंह केवल खेल के मैदान में ही चैंपियन नहीं हैं, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है। वे देश के उन विरले एथलीटों में शामिल हैं जिन्होंने खेल के उच्चतम शिखर पर रहने के साथ-साथ अपनी उच्च शिक्षा जारी रखी। हरविंदर सिंह ने अर्थशास्त्र (Economics) में अपनी पीएचडी (Ph.D.) की पढ़ाई पूरी की है, यही वजह है कि उन्हें प्यार से 'डॉक्टर हरविंदर' भी कहा जाता है। सुबह से शाम तक घंटों तीरंदाजी का अभ्यास करना और फिर देर रात तक किताबों के बीच बैठकर रिसर्च पेपर लिखना उनके कड़े अनुशासन को दर्शाता है। उनका यह व्यक्तित्व यह साबित करता है कि यदि मन में दृढ़ संकल्प हो, तो इंसान एक साथ पढ़ाई और खेल दोनों में इतिहास लिख सकता है।

देश भर में खुशी की लहर और आने वाले पैरालंपिक के लिए नए सपने

हरविंदर सिंह की इस स्वर्णिम उपलब्धि के बाद देश के प्रधानमंत्री, खेल मंत्री और विभिन्न राज्य सरकारों ने उन्हें बधाई संदेश भेजे हैं। सोशल मीडिया से लेकर उनके गृह राज्य हरियाणा तक जश्न का माहौल है और लोग एक-दूसरे को मिठाइयां बांट रहे हैं। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि हरविंदर सिंह का यह स्वर्ण पदक आगामी पैरालंपिक खेलों के लिए भारतीय दल के मनोबल को कई गुना बढ़ाएगा। अपनी इस जीत के बाद हरविंदर ने कहा कि उनका अगला लक्ष्य ओलंपिक और पैरालंपिक में भारत के लिए एक बार फिर से तिरंगा लहराना है। उनकी यह सफलता देश की युवा पीढ़ी को यह संदेश देती है कि यदि आपके पास हौसला और मेहनत की ताकत है, तो शारीरिक अपंगता भी आपके सपनों के आड़े नहीं आ सकती।