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इजरायल चुनाव: एग्जिट पोल में नेतन्याहू गठबंधन बहुमत से दूर, कांटे की टक्कर के बीच राजनीतिक अनिश्चितता और बढ़ी

मध्य पूर्व (Middle East) के सबसे अहम देश इजरायल (Israel) से इस वक्त एक बहुत ही बड़ी और चौंकाने वाली राजनीतिक खबर सामने आ रही है। इजरायल में हुए आम चुनावों के बाद वोटों की गिनती का दौर तेजी से जारी है, लेकिन शुरुआती रुझानों और एग्जिट पोल (Exit Polls) के आंकड़ों ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सामने आए एग्जिट पोल के मुताबिक, बेंजामिन नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन बहुमत के जादुई आंकड़े से काफी पीछे नजर आ रहा है, जिससे देश में एक बार फिर राजनीतिक गतिरोध और सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। इजरायल की राजनीति में इस उथल-पुथल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इजरायली संसद (Knesset) के इन चुनावों में वर्तमान समीकरण क्या बन रहे हैं और किस गठबंधन की स्थिति कैसी है।

इजरायल में सरकार बनाने के लिए क्या है बहुमत का जादुई आंकड़ा

इजरायल की चुनावी व्यवस्था और संसद के नियमों के अनुसार, देश में किसी भी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए कुल 120 सीटों वाली संसद (कनेसेट) में कम से कम 61 सीटों का बहुमत हासिल करना अनिवार्य होता है।

लेकिन हाल ही में संपन्न हुए चुनावों के बाद इजरायली टीवी चैनलों और मीडिया द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल के आंकड़े यह बता रहे हैं कि कोई भी राजनीतिक दल या स्पष्ट गुट अपने दम पर इस जादुई आंकड़े तक पहुंचता हुआ नजर नहीं आ रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मुख्य पार्टी 'लिकुड' (Likud) इस चुनाव में भी संसद की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर सकती है, जिसे अकेले 24 से 25 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। इसके बावजूद, नेतन्याहू के नेतृत्व वाले पूरे दक्षिणपंथी और अति-दक्षिणपंथी दलों के ब्लॉक को मिलाकर कुल 50 सीटें मिलने की ही उम्मीद है, जो बहुमत के आंकड़े (61) से काफी दूर है।

विपक्षी खेमे की स्थिति मजबूत, गादी आइजेंकोट के नेतृत्व वाले ब्लॉक को बढ़त

दूसरी तरफ, नेतन्याहू के धुर विरोधियों और विपक्षी दलों के खेमे में उत्साह का माहौल देखा जा रहा है। पूर्व सैन्य प्रमुख और प्रमुख विपक्षी नेता गादी आइजेंकोट (Gadi Eizenkot) के नेतृत्व वाले विपक्षी ब्लॉक को एग्जिट पोल में लगभग 52 से 53 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।

विपक्षी दलों का यह प्रदर्शन यह संकेत देता है कि देश की जनता के एक बड़े वर्ग में मौजूदा सत्ता के खिलाफ असंतोष मौजूद है। हालांकि, विपक्षी ब्लॉक भी अकेले अपने दम पर सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों के आंकड़े से थोड़ा पीछे है, जिसके कारण इजरायल की राजनीति में त्रिशंकु संसद (Hung Parliament) जैसी स्थिति बनती दिख रही है। दोनों ही प्रमुख खेमों के पास स्पष्ट बहुमत न होने के कारण अब छोटे क्षेत्रीय दलों और किंगमेकर की भूमिका निभाने वाले अन्य समूहों की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ गई है।

वोटों की गिनती जारी, 'डबल लिफाफे' तय करेंगे जीत-हार का असली फैसला

यरुशलम से मिल रही आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, पोलिंग स्टेशनों पर आम मतों की गिनती पूरी होने के बाद अब चुनाव अधिकारी 'डबल लिफाफों' (Double Envelopes) की बेहद संवेदनशील और लंबी गिनती में जुट गए हैं।

इन विशेष डबल लिफाफों में उन तमाम इजरायली नागरिकों के मत शामिल हैं जो अपनी अनिवार्य ड्यूटी या पेशेवर व्यस्तताओं के चलते अपने तय मतदान केंद्र पर वोट डालने नहीं जा सके थे। इनमें मुख्य रूप से देश की सीमाओं पर तैनात सैनिक, विभिन्न देशों में तैनात राजनयिक, तथा अस्पतालों में सेवा दे रहे डॉक्टर और नर्स शामिल हैं। ऐसे लगभग 600,000 विशेष वोट हैं, जिनकी गिनती पूरी होने के बाद ही अंतिम और पुख्ता तस्वीर साफ हो पाएगी। हालांकि, चुनावी जानकारों का यह मानना है कि आम तौर पर इन लिफाफों से नतीजों में बहुत बड़ा उलटफेर नहीं होता, फिर भी कांटे की टक्कर और बेहद कम अंतर वाले इस चुनाव में हर एक सीट का बहुत बड़ा मोल है।

रिकॉर्ड मतदान के बावजूद खंडित जनादेश, क्या इजरायल में बदलेगी सत्ता

इस बार के इजरायली चुनावों की एक और सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि देश में रिकॉर्ड तोड़ मतदान दर्ज किया गया, जिससे यह साबित होता है कि यहूदी-इजरायली मतदाता अपने देश के राजनीतिक भविष्य को लेकर बेहद जागरूक और बंटे हुए हैं। दोनों प्रमुख राजनीतिक गुटों के बीच वोटों का यह मुकाबला लगभग बराबरी का रहा है।

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यदि अंतिम परिणाम भी एग्जिट पोल के इन्हीं आंकड़ों के आसपास ठहरते हैं, तो इजरायल में एक बार फिर जोड़-तोड़ की राजनीति या अस्थिर गठबंधन सरकार बनने के आसार पैदा हो सकते हैं। नेतन्याहू के राजनीतिक करियर और उनकी नीतियों के लिहाज से यह चुनाव उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा साबित हो रहा है। देखना यह होगा कि क्या विपक्षी दल मिलकर सरकार बनाने में सफल होते हैं या फिर नेतन्याहू एक बार फिर अपनी राजनीतिक चातुर्य से सत्ता बचाने में कामयाब रहते हैं।