
बिहार की सियासत में एक बार फिर भूचाल आ गया है। मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह और जनता दल यूनाइटेड (JDU) के बीच उपजा विवाद अब सिर्फ राजनीतिक खींचतान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके तार एक गंभीर आपराधिक मामले से भी जुड़ते नजर आ रहे हैं। हाल ही में जेडीयू द्वारा पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित किए जाने और तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इस सियासी बगावत और पुरानी घटनाओं के पीछे की असली पृष्ठभूमि क्या है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि दुलारचंद यादव हत्याकांड के न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए उनके पोते नीरज कुमार ने दिल्ली तक दौड़ लगाई और कानूनी शिकंजा कसने का पूरा ताना-बाना बुना।
मोकामा टाल इलाके की वो घटना और दुलारचंद यादव हत्याकांड का पूरा सच
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान मोकामा के टाल इलाके में राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर थी। चुनाव प्रचार के दौरान जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी के समर्थन में प्रचार कर रहे स्थानीय दबंग व प्रभावशाली शख्सियत दुलारचंद यादव की संदेहास्पद परिस्थितियों में मौत हो गई थी। इस घटना के बाद इलाके में भारी तनाव फैल गया था। आरोप सीधे तौर पर मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह और उनके काफिले पर लगाए गए थे। इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अनंत सिंह को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में बेऊर जेल भेज दिया था। हालांकि राजनीतिक रसूख और तमाम समीकरणों के बीच मार्च 2026 में पटना हाईकोर्ट से अनंत सिंह को इस मामले में जमानत मिल गई थी, जिसके बाद वे जेल से बाहर आ गए थे।
पोते नीरज कुमार की दिल्ली दौड़ और सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई
पटना हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद से ही दुलारचंद यादव के परिवार में भारी आक्रोश देखा गया। मृतक के पोते नीरज कुमार ने इस फैसले के खिलाफ हार नहीं मानी और न्याय की आस में दिल्ली का रुख किया। नीरज कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके तहत अनंत सिंह को राहत मिली थी। याचिका में पुरजोर तरीके से यह मांग की गई है कि अनंत सिंह के पुराने आपराधिक इतिहास और प्रभाव को देखते हुए उनकी जमानत को तुरंत रद्द किया जाए और उन्हें दोबारा सलाखों के पीछे भेजा जाए। इस कानूनी कदम के बाद से ही दिल्ली से लेकर पटना तक की राजनीतिक और न्यायिक हलचल तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे सूबे की सियासत में पारा चढ़ता जा रहा है।
जेडीयू से निष्कासन और अनंत सिंह के तीखे तेवर
एक तरफ जहां दुलारचंद यादव हत्याकांड की गूंज देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच चुकी है, वहीं दूसरी तरफ बिहार के सत्ता के गलियारों में भी बड़े राजनीतिक बदलाव देखने को मिले हैं। हाल ही में हुए एमएलसी चुनावों और पार्टी विरोधी गतिविधियों का हवाला देते हुए जेडीयू ने अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से छह साल के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इसके साथ ही विधानसभा अध्यक्ष को उनकी विधायकी रद्द करने के लिए पत्र भी सौंपा गया है और उनके सरकारी आवास को खाली करने का फरमान भी जारी हो चुका है। इन तमाम ताबड़तोड़ प्रशासनिक और राजनीतिक कार्रवाइयों के बाद अनंत सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ी है और बगावत के सुर तेज कर दिए हैं। अनंत सिंह ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे आने वाले समय में अपनी खुद की नई पार्टी का गठन कर सकते हैं और विरोधियों को चुनावी मैदान में करारा जवाब देंगे।
भौगोलिक और राजनीतिक नफा-नुकसान पर टिकी सबकी निगाहें
मोकामा और बाढ़ के टाल इलाके से लेकर पटना और दिल्ली तक फैली इस राजनीतिक और कानूनी जंग का असर आगामी बिहार की राजनीति पर पड़ना तय माना जा रहा है। स्थानीय समीकरणों के लिहाज से भूमिहार बाहुल्य इस बेल्ट में अनंत सिंह का अपना एक अलग प्रभाव रहा है, लेकिन दूसरी तरफ दुलारचंद यादव हत्याकांड के कानूनी शिकंजे ने उनकी राहें बेहद कठिन कर दी हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट में नीरज कुमार की याचिका पर सुनवाई के दौरान अनंत सिंह की जमानत खारिज होती है, तो उनकी राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को बड़ा झटका लग सकता है। बहरहाल, दिल्ली के गलियारों से लेकर पटना की सड़कों तक मची इस सनसनीखेज उथल-पुथल ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बिहार की राजनीति में अपराध, न्याय और सत्ता का यह संघर्ष हमेशा से सबसे बड़ा केंद्र बिंदु रहा है।
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