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विधानपार्षद बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज पर गहराया अयोग्यता का संकट

बिहार की राजनीति में विधान परिषद चुनाव के नतीजे आते ही एक बड़ा नया संवैधानिक और राजनीतिक बवंडर खड़ा हो गया है। हाल ही में संपन्न हुए उपचुनावों में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जीत दर्ज करने वाले निर्दलीय एमएलसी बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से विजयी हुए निर्दलीय एमएलसी डॉ. राहुल राज के ऊपर अयोग्यता (Disqualification) की भारी तलवार लटक गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश कार्यालय पहुंचकर पार्टी में शामिल होने के दावों और तस्वीरों के बाद राष्ट्रीय जनता दल (RJD) तथा प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने इस पूरे घटनाक्रम को संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) का खुला उल्लंघन करार दिया है। विपक्ष और जन सुराज ने साफ कर दिया है कि वे विधान परिषद के सभापति के समक्ष अर्जी देने के साथ-साथ इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) और पटना हाई कोर्ट तक ले जाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि यह मामला अदालत की चौखट तक पहुंचता है, तो दोनों विधानपार्षदों की सदस्यता बचेगी या फिर वे अयोग्य घोषित हो जाएंगे?

#1 चुनाव जीतते ही बीजेपी के दफ्तर पहुंचे दोनों निर्दलीय MLC, तस्वीरें सामने आते ही मचा हंगामा

पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब विधान परिषद की सदस्यता की आधिकारिक शपथ लेने से पहले ही दोनों नवनिर्वाचित एमएलसी बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज पटना स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचे। वहां प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और उपमुख्यमंत्री व अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में उनके स्वागत की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। शुरुआती बयानों में दोनों नेताओं की ओर से पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने की बातें सामने आईं। हालांकि, जैसे ही विपक्षी दलों ने दलबदल विरोधी कानून के तहत उनकी एमएलसी सदस्यता रद्द कराने का मोर्चा खोला, बंशीधर ब्रजवासी ने तुरंत अपना रुख बदलते हुए फेसबुक लाइव के जरिए सफाई दी कि उन्होंने बीजेपी ज्वाइन नहीं की है, बल्कि केवल सरकार को अपना समर्थन दिया है। वहीं राहुल राज इस पूरे विवाद पर काफी हद तक चुप्पी साधे हुए हैं।

#1 क्या कहता है संविधान का दलबदल कानून? क्यों मुश्किल में फंसे बंशीधर और राहुल राज?

संवैधानिक जानकारों और भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के पैरा 2(2) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति निर्दलीय उम्मीदवार (Independent Candidate) के रूप में चुनाव जीतता है और चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद किसी भी राजनीतिक दल की औपचारिक सदस्यता ग्रहण करता है, तो वह तत्काल प्रभाव से सदन का सदस्य बने रहने के लिए अयोग्य (Disqualified) हो जाता है। केवल मनोनीत (Nominated) सदस्यों को किसी दल में शामिल होने के लिए 6 महीने का समय मिलता है, जबकि जनता द्वारा चुने गए निर्दलीय सांसदों, विधायकों या एमएलसी पर यह छूट लागू नहीं होती। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और जन सुराज के वकीलों का तर्क है कि दोनों एमएलसी ने सार्वजनिक रूप से बीजेपी की सदस्यता लेने की बात स्वीकार की थी और इसके साक्ष्य (वीडियो व तस्वीरें) मौजूद हैं, जो उन्हें अयोग्य ठहराने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार प्रदान करते हैं।

#1 जन सुराज और RJD पहुंचे सभापति के पास, 3 महीने में फैसला न होने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की चेतावनी

इस पूरे मामले में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया है। जन सुराज के प्रतिनिधिमंडल ने बिहार विधान परिषद के सभापति प्रो. (डॉ.) रामवचन राय से मुलाकात कर बंशीधर ब्रजवासी और डॉ. राहुल राज की अयोग्यता की मांग को लेकर लिखित शिकायत दर्ज कराई है। जन सुराज के कानूनी सलाहकारों ने स्पष्ट कर दिया है कि संविधान की 10वीं अनुसूची के पैरा 6(1) के तहत अयोग्यता पर अंतिम फैसला लेने का अधिकार सभापति के पास है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की नजीर के मुताबिक यदि सभापति 3 महीने के भीतर इस आवेदन पर कोई अंतिम और निष्पक्ष फैसला नहीं लेते हैं, तो पार्टी इस मामले में तुरंत सुप्रीम कोर्ट और पटना हाई कोर्ट में याचिका (Writ Petition) दायर करेगी।

#1 कोर्ट जाने पर क्या बन सकते हैं कानूनी समीकरण? दोनों एमएलसी के पास क्या हैं विकल्प?

यदि यह मामला अदालत में जाता है, तो कानूनी लड़ाई मुख्य रूप से 'सदस्यता ग्रहण करने' (Formal Joining) बनाम 'बाहरी समर्थन देने' (External Support) के तकनीकी साक्ष्यों के इर्द-गिर्द घूमेगी। यदि भाजपा और दोनों एमएलसी यह साबित करने में सफल रहते हैं कि उन्होंने कभी पार्टी का आधिकारिक फॉर्म नहीं भरा, पार्टी रजिस्टर में दस्तखत नहीं किए और केवल सरकार के प्रति समर्थन जताया था, तो उन्हें राहत मिल सकती है। इसके विपरीत, यदि अदालत के सामने विपक्ष द्वारा दिए गए वह वीडियो साक्ष्य और भाजपा का वह शुरुआती प्रेस नोट प्रामाणिक मान लिया जाता है जिसमें उनके भाजपा की सदस्यता लेने का दावा किया गया था, तो दोनों विधानपार्षदों की सदस्यता जाना तय माना जा रहा है। फिलहाल इस अभूतपूर्व कानूनी और सियासी घमासान पर पूरे बिहार के राजनीतिक पंडितों और आम जनता की पैनी नजरें टिकी हुई हैं।