
News India Live, Digital Desk: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किन्नरों (Transgenders) द्वारा उपहार या ‘नेग’ स्वीकार करने को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी व्यक्ति से उपहार या पैसा स्वीकार करना कोई कानूनी अधिकार नहीं है जिसे अदालतों के माध्यम से लागू कराया जा सके। जस्टिस गजानन कुमार की पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की जब वह किन्नरों के दो गुटों के बीच चल रहे ‘क्षेत्राधिकार’ (Jurisdiction) विवाद से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट के इस रुख ने उन दावों को खारिज कर दिया है जिसमें किन्नर अपने इलाके तय करने की मांग कर रहे थे।किन्नरों के दो गुटों में छिड़ा था वर्चस्व का युद्ध पूरा मामला प्रयागराज के फूलपुर क्षेत्र से जुड़ा है, जहां किन्नरों के दो समूहों के बीच यजमानों से उपहार और बधाई लेने के अधिकार को लेकर विवाद चल रहा था। एक पक्ष ने अदालत में याचिका दायर कर मांग की थी कि उनके इलाके की सीमाएं (Demarcation) तय कर दी जाएं ताकि दूसरा पक्ष उनके क्षेत्र में हस्तक्षेप न कर सके। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पीढ़ियों से उनके पूर्वजों के समय से यह परंपरा चली आ रही है और एक निश्चित सीमा के भीतर उनका ही अधिकार होना चाहिए।हाई कोर्ट की दो टूक: परंपरा कानून से ऊपर नहीं अदालत ने याचिका को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि भारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी विशेष समुदाय को उपहार मांगने या उसे अपना ‘अधिकार’ बताने की अनुमति देता हो। हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा कि बधाई या नेग पूरी तरह से यजमान की इच्छा पर निर्भर करता है। अदालत ने यह भी साफ किया कि वह किसी के क्षेत्राधिकार को इस आधार पर तय नहीं कर सकती कि कौन कहां से पैसा वसूल करेगा। कोर्ट ने इसे ‘सिविल राइट’ के दायरे से बाहर माना और पुलिस प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए।सामाजिक मान्यताओं और कानूनी मर्यादाओं का टकराव यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सदियों से भारतीय समाज में किन्नरों द्वारा शुभ अवसरों पर बधाई और नेग लेने की परंपरा रही है। अक्सर देखा जाता है कि इलाकों को लेकर इन समूहों के बीच हिंसक झड़पें भी होती हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस फैसले के जरिए यह संदेश दिया है कि परंपराएं अपनी जगह हैं, लेकिन उन्हें कानूनी हक की तरह पेश कर अदालती संरक्षण नहीं मांगा जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अपनी मर्जी से कुछ देता है तो वह अलग बात है, लेकिन इसे जबरन या अधिकार के तौर पर नहीं लिया जा सकता।पुलिस को आदेश: कानून हाथ में लेने वालों पर हो कार्रवाई याचिका खारिज करने के साथ ही कोर्ट ने स्थानीय प्रशासन को सचेत किया है कि इस तरह के सीमा विवादों के कारण सार्वजनिक शांति भंग नहीं होनी चाहिए। यदि कोई भी पक्ष दूसरे पक्ष को डराता-धमकाता है या जबरन वसूली की कोशिश करता है, तो पुलिस को सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। इस फैसले के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि किन्नर समुदाय के भीतर चल रहे वर्चस्व की जंग को सुलझाने के लिए अदालतें किसी प्रकार की ‘बाउंड्री वॉल’ नहीं खींचेंगी।
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