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Ashirwad Niyam : आशीर्वाद देते समय हमेशा दाहिने हाथ का ही क्यों होता है इस्तेमाल? जानें इसके पीछे का सटीक धार्मिक और वैज्ञानिक तर्क

अक्सर हम अपने बड़ों के पैर छूते हैं और वे हमारे सिर पर अपना दाहिना हाथ रखकर आशीर्वाद देते हैं। शास्त्रों के अनुसार, आशीर्वाद की यह प्रक्रिया केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह एक ऊर्जा का संचार (Energy Transfer) है। आइए जानते हैं कि इस नियम के पीछे की असल वजह क्या है।1. दाहिना हाथ ही क्यों? (धार्मिक कारण)सनातन धर्म में दाहिने अंग को ‘शुभ’ और ‘पवित्र’ माना गया है:देव तत्व का वास: माना जाता है कि दाहिने हाथ में देवताओं का वास होता है और इससे निकलने वाली ऊर्जा सकारात्मक होती है।दाहिना मार्ग (Dakshinamarga): शास्त्रों में दाहिने हाथ को धर्म और कर्म का प्रतीक माना गया है। बाएं हाथ को अक्सर अशुद्ध कार्यों या ‘पितृ’ कार्यों के लिए उपयोग किया जाता है, इसलिए शुभ कार्यों और आशीर्वाद के लिए इसे वर्जित माना गया है।2. विज्ञान और ऊर्जा का प्रवाह (Scientific Reason)हमारे शरीर में ऊर्जा का प्रवाह निरंतर होता रहता है। विज्ञान और योग शास्त्र के अनुसार:सकारात्मक ऊर्जा (Positive Ions): दाहिना हाथ शरीर की सकारात्मक ऊर्जा को बाहर की ओर प्रवाहित करने का मुख्य केंद्र है। जब कोई बड़ा व्यक्ति छोटे के सिर पर अपना दाहिना हाथ रखता है, तो वह अपनी संचित ऊर्जा और शुभ संकल्प उस व्यक्ति में स्थानांतरित करता है।इड़ा और पिंगला नाड़ी: शरीर के दाहिने हिस्से का संबंध ‘पिंगला नाड़ी’ (सूर्य स्वर) से होता है, जो शक्ति, तेज और प्राण ऊर्जा का प्रतीक है। दाहिने हाथ से आशीर्वाद देने पर यह तेज सामने वाले व्यक्ति को प्राप्त होता है।3. पैर छूने और हाथ रखने का ‘सर्किट’जब आप किसी के पैर छूते हैं, तो एक ऊर्जा चक्र (Energy Circuit) पूरा होता है:आपके हाथों की उंगलियां जब सामने वाले के पैरों को छूती हैं और उनका दाहिना हाथ आपके सिर (सहस्रार चक्र) को छूता है, तो ऊर्जा का एक गोलाकार प्रवाह बनता है। इससे विनम्रता और ज्ञान का आदान-प्रदान होता है।4. आशीर्वाद देने के सही नियमशास्त्रों में आशीर्वाद देने और लेने के कुछ विशेष नियम बताए गए हैं:एकाग्रता: आशीर्वाद देते समय मन में ईर्ष्या या क्रोध नहीं होना चाहिए।संपर्क: हाथ का सिर से स्पर्श होना आवश्यक है, क्योंकि सिर ऊर्जा का केंद्र (Chakra) है।अभिवादन: जो व्यक्ति अभिवादन और सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल (अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः…) चारों बढ़ते हैं।