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दिल्ली में क्लाउड सीडिंग, बारिश तो नहीं हुई, लेकिन प्रदूषण में आई मामूली गिरावट, जानिए क्यों

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News India Live, Digital Desk: दिल्ली के दम घोंटू प्रदूषण से निजात पाने के लिए हाल ही में एक बहुत चर्चित प्रयोग किया गया – क्लाउड सीडING, यानी कृत्रिम बारिश कराने की कोशिश. योजना यह थी कि हवाई जहाज़ से बादलों में ख़ास तरह के केमिकल का छिड़काव किया जाएगा, जिससे बारिश होगी और हवा में तैर रहा ज़हर धुल जाएगा. लेकिन, इस प्रयोग का जो नतीजा सामने आया है, वह काफी हैरान करने वाला है. दिल्ली में बारिश तो नहीं हुई, लेकिन कुछ इलाकों में प्रदूषण के स्तर में एक मामूली सी गिरावट ज़रूर दर्ज की गई.

तो सबसे पहला सवाल: आख़िर बारिश हुई क्यों नहीं?

इसका जवाब छिपा है मौसम की साधारण सी साइंस में. IIT कानपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार, कृत्रिम बारिश की कोई भी कोशिश तभी सफल हो सकती है, जब बादलों में पर्याप्त नमी हो – कम से कम 50 प्रतिशत. लेकिन जिस समय यह प्रयोग किया गया, दिल्ली के ऊपर मौजूद बादलों में नमी का स्तर सिर्फ़ 10 से 20 फ़ीसदी था.

इसे ऐसे समझिए कि आप एक लगभग सूखी हुई तौलिया को निचोड़कर उससे पानी की उम्मीद नहीं कर सकते. ठीक उसी तरह, सूखे बादलों से बारिश करा पाना संभव नहीं था, और यही वजह है कि यह कोशिश नाकाम रही.

जब बारिश नहीं हुई, तो प्रदूषण कैसे घट गया?

यह इस पूरे प्रयोग का सबसे दिलचस्प हिस्सा है. भले ही छिड़काव से बारिश नहीं हुई, लेकिन विमान से जो सिल्वर आयोडाइड और नमक जैसे रसायन छोड़े गए, उन्होंने हवा में मौजूद प्रदूषक कणों (PM2.5) के लिए एक चुंबक का काम किया. प्रदूषण के छोटे-छोटे कण इन रासायनिक कणों से चिपक गए, जिससे वे भारी हो गए और धीरे-धीरे ज़मीन की तरफ़ बैठने लगे.

आंकड़ों के मुताबिक, मयूर विहार, करोल बाग और बुराड़ी जैसे इलाकों में, जहां यह छिड़काव केंद्रित था, PM2.5 का स्तर 221-230 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से घटकर 203-207 के स्तर पर आ गया. यह कोई बहुत बड़ी गिरावट नहीं थी और इसका असर भी सिर्फ़ कुछ घंटों तक ही रहा. हालांकि, पास के नोएडा और ग्रेटर नोएडा में 0.1 से 0.2 मिलीमीटर की बेहद हल्की बूंदाबांदी ज़रूर रिकॉर्ड की गई.

क्या यह प्रदूषण का स्थायी समाधान है?

विशेषज्ञों का साफ़ मानना है कि क्लाउड सीडिंग एक बेहद खर्चीला और अस्थायी उपाय है. इस एक प्रयोग की लागत लाखों में है, और इसका असर भी चंद घंटों का होता है. अगर बारिश हो भी जाती, तो भी प्रदूषण का स्तर एक-दो दिन में वापस वहीं पहुंच जाता. असल समाधान प्रदूषण पैदा करने वाली जड़ों, जैसे कि वाहनों का धुआं, उद्योगों से उत्सर्जन और पराली जलाने जैसी समस्याओं से निपटना है.

यह प्रयोग एक वैज्ञानिक परीक्षण के तौर पर तो महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन दिल्ली की सांसों में घुले ज़हर का यह कोई स्थायी इलाज नहीं है.

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