
News India Live, Digital Desk : केंद्र सरकार द्वारा 16 अप्रैल 2026 को संसद में जातिगत जनगणना कराने की ऐतिहासिक घोषणा के बाद अब आर्थिक मोर्चे पर भी नई मांग उठने लगी है। दिल्ली के प्रमुख व्यापारिक संगठन ‘चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री’ (CTI) ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर एक बेहद महत्वपूर्ण मांग रखी है। CTI का कहना है कि जातिगत आंकड़ों के साथ-साथ सरकार को टैक्सपेयर्स (करदाताओं) का डेटा भी सामने लाना चाहिए, ताकि यह साफ हो सके कि देश के राजस्व में किस वर्ग का कितना योगदान है।’आर्थिक योगदान’ की भी हो पहचान: बृजेश गोयलCTI के चेयरमैन बृजेश गोयल ने पत्र में तर्क दिया है कि अगर सरकार सामाजिक न्याय के लिए जातियों की गिनती कर रही है, तो अर्थव्यवस्था में योगदान देने वालों की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।सिद्धांत: गोयल ने ‘जितनी जाति, उतनी हिस्सेदारी’ की तर्ज पर ‘जितना टैक्स, उतनी हिस्सेदारी’ का नारा बुलंद किया है।तर्क: जो समुदाय या वर्ग देश की जीडीपी और टैक्स कलेक्शन में अधिक योगदान देता है, उन्हें सरकारी नीतियों, योजनाओं और सेवाओं में उसी अनुपात में प्रतिनिधित्व और प्राथमिकता मिलनी चाहिए।टैक्स डेटा सार्वजनिक करना संभव: CTI लीडर्ससंगठन के पदाधिकारियों दीपक गर्ग, राहुल अदलखा और गुरमीत अरोड़ा का कहना है कि सरकार के लिए यह काम मुश्किल नहीं है:उपलब्ध डेटा: सरकार के पास पहले से ही इनकम टैक्स और GST का विस्तृत डेटा मौजूद है।सोशल मैपिंग: यदि इस डेटा को सामाजिक वर्गों के आधार पर मैप कर दिया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि किस समुदाय से कितना रेवेन्यू आ रहा है।व्यापारियों की शक्ति: देश में लगभग 6 करोड़ और अकेले दिल्ली में 20 लाख व्यापारी सक्रिय हैं, जो आर्थिक नीतियों में उचित हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं।व्यापारियों की चिंता: नीतियों में मिले सम्मानCTI का मानना है कि अक्सर करदाताओं को केवल ‘दुधारू गाय’ की तरह देखा जाता है, जबकि सुविधाओं और योजनाओं के समय उन्हें प्राथमिकता नहीं मिलती। संगठन की मांग है कि:अधिक टैक्स देने वाले वर्गों को सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर और सर्विसेज में विशेष लाभ मिलना चाहिए।आर्थिक योगदान को भी ‘सामाजिक न्याय’ और भविष्य के नीति निर्माण का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।क्या होगा असर?संसद में अमित शाह की घोषणा के बाद देश में जनगणना की प्रक्रिया को लेकर चर्चा गरम है। ऐसे में व्यापारियों की यह मांग इस मुद्दे को ‘सामाजिक’ से ‘आर्थिक’ दिशा की ओर मोड़ सकती है। हालांकि, सरकार की ओर से फिलहाल इस मांग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
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