
लंदन/वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष के बीच ब्रिटेन ने अपनी तटस्थता की नीति को किनारे रखते हुए एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। शुक्रवार को डाउनिंग स्ट्रीट (ब्रिटिश प्रधानमंत्री कार्यालय) ने पुष्टि की है कि अमेरिका अब ईरान के मिसाइल ठिकानों को निशाना बनाने के लिए ब्रिटिश सैन्य बेसों (Military Bases) का इस्तेमाल कर सकेगा। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का यह फैसला उस समय आया है जब ईरान द्वारा खाड़ी देशों और वैश्विक तेल सप्लाई चेन पर हमले तेज हो गए हैं।ब्रिटेन का ‘यू-टर्न’: क्यों बदली रणनीति?कुछ समय पहले तक ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर अमेरिका के इस अनुरोध को खारिज कर रहे थे। उनका तर्क था कि किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए ‘कानूनी औचित्य’ जरूरी है और ब्रिटेन सीधे तौर पर किसी युद्ध का हिस्सा नहीं बनना चाहता। लेकिन दो प्रमुख कारणों ने पासा पलट दिया:सहयोगियों पर हमला: रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने हाल के दिनों में ब्रिटिश सहयोगियों और जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया, जिससे ब्रिटेन की सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगा।ट्रंप का दबाव: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ब्रिटेन को “निराशाजनक सहयोगी” करार दिया था। माना जा रहा है कि इस कूटनीतिक दबाव ने भी ब्रिटेन को यह सख्त कदम उठाने पर मजबूर किया।इन घातक बेसों से होगा ‘ऑपरेशन ईरान’न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, अमेरिका मुख्य रूप से दो रणनीतिक ठिकानों का उपयोग कर सकता है:आरएएफ फेयरफोर्ड (RAF Fairford): इंग्लैंड में स्थित यह बेस लंबी दूरी के बमवर्षक विमानों (Bombers) के लिए जाना जाता है।डिएगो गार्सिया (Diego Garcia): हिंद महासागर में स्थित यह बेस अमेरिका के लिए सामरिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण है, यहाँ से ईरान के मिसाइल ठिकानों तक पहुंचना बेहद आसान होगा।दुनिया पर क्या होगा असर?ईरानी मिसाइलों द्वारा जहाजों को निशाना बनाए जाने से वैश्विक तेल आपूर्ति (Oil Supply) पहले ही बाधित हो चुकी है। अब ब्रिटेन और अमेरिका की इस साझा कार्रवाई से क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंचने की आशंका है। यदि अमेरिका इन बेसों से हमला करता है, तो ईरान की जवाबी कार्रवाई पूरे पश्चिम एशिया को बड़े युद्ध की आग में झोंक सकती है।विशेषज्ञों की राय: ब्रिटेन का यह कदम नाटो (NATO) देशों के बीच एकजुटता दिखाने की कोशिश है, लेकिन यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ‘महंगाई के नए झटके’ लेकर आ सकता है।
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