
News India Live, Digital Desk : भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों को लेकर एक नई और महत्वपूर्ण हलचल शुरू हो गई है। हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर (S. Jaishankar) ने भारत-अमेरिका व्यापार सौदे (India-US Trade Deal) और क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) को लेकर कुछ ऐसी बातें साझा की हैं, जो आने वाले समय में वैश्विक बाजार की दिशा बदल सकती हैं।सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में विदेश मंत्रालय सीधे तौर पर व्यापारिक शर्तों में शामिल नहीं है, बल्कि इसके लिए एक विशेष ‘इनिशिएटिव’ काम कर रहा है।क्रिटिकल मिनरल्स और ‘फोर्ज’ इनिशिएटिव: चीन की टेंशन बढ़ी?विदेश मंत्री जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका के बीच इस समय सबसे अधिक ध्यान ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ (जैसे लिथियम, कोबाल्ट, निकल) पर है। इन खनिजों का उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और चिप मेकिंग में होता है, जहां वर्तमान में चीन का एकाधिकार है।इस एकाधिकार को तोड़ने के लिए दोनों देशों ने ‘FORGE’ (फोर्ज) इनिशिएटिव को गति दी है। यह पहल रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में एक मजबूत सप्लाई चेन बनाने के लिए तैयार की गई है, ताकि भविष्य में किसी भी एक देश पर निर्भरता कम की जा सके।व्यापार सौदे में जयशंकर की भूमिका: सीधे शामिल क्यों नहीं?रिपोर्ट्स के अनुसार, डॉ. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि वह सीधे तौर पर ट्रेड एग्रीमेंट की टेबल पर नहीं बैठ रहे हैं। उनका ध्यान कूटनीतिक संबंधों और भू-राजनीतिक सुरक्षा (Geopolitical Security) पर है। व्यापारिक बारीकियों और टैरिफ जैसे मुद्दों को संबंधित मंत्रालयों और विशेष कार्यबलों (Task Forces) के लिए छोड़ दिया गया है। जयशंकर का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि यह डील भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों (Strategic Interests) के अनुकूल हो।iCET: तकनीक के क्षेत्र में नई क्रांति की तैयारीभारत और अमेरिका के बीच iCET (इनीशिएटिव ऑन क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी) के तहत सहयोग को और गहरा किया जा रहा है। जयशंकर ने संकेत दिया कि सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अंतरिक्ष क्षेत्र में दोनों देशों की भागीदारी अब केवल चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर उतरने लगी है।क्या होगा भारत को फायदा?विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह व्यापारिक समझौता और क्रिटिकल मिनरल पार्टनरशिप सफल रहती है, तो:भारत दुनिया का नया ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ बन सकता है।चिप और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में भारत की आयात पर निर्भरता कम होगी।अमेरिका के साथ रक्षा सौदों में और अधिक पारदर्शिता और गति आएगी।चुनौतियां अभी भी बरकरारभले ही संबंध मधुर दिख रहे हों, लेकिन डेटा लोकलाइजेशन, एच-1बी वीजा और कुछ कृषि उत्पादों पर टैरिफ को लेकर अभी भी दोनों देशों के बीच पेंच फंसा हुआ है। जयशंकर की वॉशिंगटन यात्रा इन मतभेदों को कम करने और एक ‘बड़ी तस्वीर’ पेश करने की कोशिश मानी जा रही है।
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