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RBI Plastic Notes: 1 अप्रैल से आ रहे ₹10 और ₹20 के नए पॉलीमर नोट, जानें क्या है खास

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश की मुद्रा प्रणाली में एक युगांतरकारी बदलाव की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। वित्तीय वर्ष के पहले दिन यानी 1 अप्रैल से केंद्रीय बैंक बाजार में ₹10 और ₹20 मूल्यवर्ग के नए पॉलीमर (प्लास्टिक) नोट जारी करने की तैयारी में है। लंबे समय से चर्चा में रही इस परियोजना को अब पायलट प्रोजेक्ट और फील्ड ट्रायल के रूप में धरातल पर उतारा जा रहा है। पारंपरिक कॉटन-पल्प पेपर की जगह आधुनिक बाय-एक्सियली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन (BOPP) प्लास्टिक सबस्ट्रेट से बनने वाले इन नोटों का प्राथमिक उद्देश्य रोजमर्रा के लेन-देन में तेजी से गलने और फटने वाले छोटे नोटों की लाइफ बढ़ाना तथा जाली नोटों पर पूरी तरह नकेल कसना है। इस घोषणा के बाद से ही आम उपभोक्ताओं, व्यापारियों और बैंकिंग सेक्टर के बीच इन नए नोटों के स्वरूप और सुरक्षा फीचर्स को लेकर उत्सुकता चरम पर पहुंच गई है।

1 अप्रैल से पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत: किन नोटों पर लागू होगा नया नियम?

रिजर्व बैंक की योजना के मुताबिक शुरुआत में केवल छोटे मूल्यवर्ग यानी ₹10 और ₹20 के नोटों को ही प्लास्टिक संस्करण में उतारा जाएगा। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में यह दो ऐसे मूल्यवर्ग हैं जिनका उपयोग सार्वजनिक परिवहन, किराना दुकानों, रेहड़ी-पटरी और दैनिक घरेलू खर्चों में सबसे अधिक बार-बार होता है। इस अत्यधिक उपयोग के चलते कागजी नोट बहुत जल्दी मैले, कटे-फटे और सीलनयुक्त हो जाते हैं। केंद्रीय बैंक पहले चरण में करीब 200 करोड़ पॉलीमर नोटों को बाजार में प्रचलन के लिए जारी करने की रूपरेखा बना रहा है, जिसमें 100 करोड़ नोट ₹10 के और 100 करोड़ नोट ₹20 के शामिल होंगे। विभिन्न भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों वाले चुनिंदा शहरों में इनका व्यावहारिक परीक्षण किया जाएगा ताकि यह परखा जा सके कि भीषण गर्मी, मानसूनी नमी और अत्यधिक धूल भरे माहौल में यह प्लास्टिक करेंसी कितनी टिकती है।

न भीगने का डर, न फटने की चिंता: क्या हैं प्लास्टिक नोटों के 5 सबसे बड़े फीचर्स?

पॉलीमर बैंकनोट्स सामान्य कागजी नोटों से कई मामलों में बिल्कुल अलग और तकनीकी रूप से कहीं अधिक उन्नत होते हैं:

  • वॉटरप्रूफ और पसीना-रोधी गुण: प्लास्टिक नोटों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये पानी, तेल, पसीने या किसी भी तरल पदार्थ में भीगने पर भी खराब नहीं होते। यदि बारिश में जेब में रखा नोट भीग भी जाए या भूलवश कपड़ों के साथ वॉशिंग मशीन में धुल जाए, तो भी यह गलता या चिपकता नहीं है और सूखने के बाद दोबारा इस्तेमाल लायक रहता है।

  • लंबी उम्र और उच्च टिकाऊपन: अध्ययन बताते हैं कि पारंपरिक कॉटन आधारित पेपर नोटों की तुलना में पॉलीमर नोट ढाई से चार गुना अधिक समय तक चलते हैं। इनकी तन्यता शक्ति अधिक होने के कारण ये हाथ से मोड़ने या खींचने पर आसानी से नहीं फटते।

  • पारदर्शी सुरक्षा खिड़की (Transparent Window): इन नोटों की सतह पर एक खास पारदर्शी हिस्सा यानी 'क्लियर विंडो' होती है। इस खिड़की के आर-पार देखा जा सकता है और इसमें जटिल ऑप्टिकल वेरिएबल डिवाइस (OVD) तथा होलोग्राम अंतर्निहित होते हैं, जिन्हें किसी सामान्य प्रिंटर या स्कैनर से कॉपी कर पाना लगभग असंभव है।

  • गंदगी और बैक्टीरिया मुक्त सतह: पॉलीमर की गैर-छिद्रपूर्ण (non-porous) सतह पर धूल, मैल और कीटाणु नहीं जमते। इससे ये नोट लंबे समय तक साफ-सुथरे रहते हैं और हाथों-हाथ संक्रमण फैलने का खतरा भी नगण्य हो जाता है।

  • पर्यावरण और रिसाइक्लिंग के अनुकूल: जब यह नोट अपना जीवनकाल पूरा कर लेंगे, तो इन्हें नष्ट करने के बजाय रिसाइकिल कर अन्य प्लास्टिक उत्पाद बनाने में इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिससे कार्बन फुटप्रिंट में कमी आएगी।

क्या बैंकों और एटीएम में बदल जाएंगी मशीनें? साइज को लेकर आरबीआई का स्पष्ट फैसला

नई करेंसी जारी होते ही बैंकों और आम जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या देश भर के एटीएम और कैश डिपॉजिट मशीनों को दोबारा री-कैलिब्रेट करना पड़ेगा। रिजर्व बैंक के नीति-निर्माताओं ने इस बार स्पष्ट निर्देश तय किए हैं कि नए ₹10 और ₹20 के प्लास्टिक नोटों की लंबाई, चौड़ाई और मोटाई के डाइमेंशन बिल्कुल मौजूदा पेपर नोटों के समान ही रखे जाएंगे। इस रणनीतिक कदम का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों को एटीएम ट्रे, नोट गिनने वाली मशीनों और वेंडिंग मशीनों में कोई महंगा हार्डवेयर बदलाव नहीं करना पड़ेगा, जिससे सैकड़ों करोड़ रुपये के अनावश्यक लॉजिस्टिक्स खर्च की बचत होगी।

जाली नोटों पर लगेगी लगाम: क्यों मुश्किल होगी प्लास्टिक करेंसी की नकल?

भारत में छोटे नोटों की जालसाजी रोकने के लिए पॉलीमर सबस्ट्रेट को एक अचूक हथियार माना जा रहा है। सामान्य कागजी नोटों पर सुरक्षा धागा या वॉटरमार्क चिपकाना जालसाजों के लिए अपेक्षाकृत आसान हो जाता है, लेकिन पॉलीमर शीट पर सुरक्षा लेयर्स को पिघले हुए प्लास्टिक के बीच में सील किया जाता है। इसमें खास शैडो इमेज, माइक्रो-प्रिंटिंग, कलर-शिफ्टिंग इंक और लेजर मार्कर्स का उपयोग होता है, जो अलग-अलग कोणों से देखने पर अपना रंग बदलते हैं। दुनिया के जिन 60 से अधिक देशों—जैसे ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा और न्यूजीलैंड—ने प्लास्टिक नोट अपनाए हैं, वहां जालसाजी की दरों में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है।

हर साल फटने वाले अरबों नोट और 'क्लीन नोट पॉलिसी' का अरबों का बोझ

भारतीय रिजर्व बैंक हर साल अपनी 'क्लीन नोट पॉलिसी' के तहत करीब 2,000 से 2,400 करोड़ मैले और कटे-फटे नोटों को नष्ट करता है। देश में खराब नोटों को नष्ट करने और उनकी जगह नए नोट छापने, ट्रांसपोर्ट करने तथा सर्कुलेशन में लाने पर सालाना लगभग ₹5,000 करोड़ का भारी-भरकम खर्च आता है। इस खर्च का एक बड़ा हिस्सा ₹10, ₹20 और ₹50 के नोटों के तेजी से खराब होने के कारण खर्च होता है। हालांकि प्लास्टिक नोट की शुरुआती छपाई लागत कागजी नोट की तुलना में 30 से 60 प्रतिशत अधिक होती है, लेकिन इनकी 4 गुना लंबी उम्र के कारण लंबी अवधि में सरकारी खजाने और टैक्सपेयर्स के हजारों करोड़ रुपये की बचत होगी।

क्या आपकी जेब में मौजूद पुराने ₹10 और ₹20 के कागजी नोट बंद हो जाएंगे?

नए नोटों की घोषणा के साथ ही सोशल मीडिया पर नोटबंदी जैसी किसी भी अफवाह या असमंजस को विराम देते हुए अधिकारियों ने साफ किया है कि पुराने कागजी नोट पूरी तरह से वैध बने रहेंगे। 1 अप्रैल से शुरू हो रहा यह चरण केवल एक प्रायोगिक सर्कुलेशन (फील्ड ट्रायल) है। बाजार में प्लास्टिक नोट और पुराने पेपर नोट दोनों एक साथ समानांतर रूप से चलेंगे। किसी भी नागरिक को अपने मौजूदा नोट बैंक जाकर बदलने की कतई आवश्यकता नहीं होगी। जैसे-जैसे पुराने कागजी नोट खराब होकर बैंकों में वापस आएंगे, उन्हें धीरे-धीरे सिस्टम से हटाया जाएगा और उनकी जगह नए मजबूत प्लास्टिक नोट स्वतः ही बाजार का हिस्सा बनते चले जाएंगे।