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Thanthania Kalibari : कोलकाता का वो सिद्ध शक्तिपीठ, जहां मां काली को चढ़ाया जाता है मछली और मांस का भोग

ठनठनिया कालीबाड़ी: कोलकाता का वो सिद्ध शक्तिपीठ, जहां मां काली को चढ़ाया जाता है ‘मछली और मांस’ का भोग!कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता अपनी समृद्ध संस्कृति और प्राचीन काली मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक है उत्तर कोलकाता का ‘ठनठनिया कालीबाड़ी’। यह मंदिर न केवल अपनी वास्तुकला बल्कि अपनी अनूठी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मां काली को सात्विक भोग के साथ-साथ तामसिक (मांसाहारी) भोग भी अर्पित किया जाता है, जिसे मां सहर्ष स्वीकार करती हैं।300 साल पुराना इतिहास और ‘ठनठनिया’ नाम का रहस्य इस मंदिर की स्थापना सन 1703 में शंकर घोष नामक एक धनी व्यापारी ने की थी। मंदिर का नाम ‘ठनठनिया’ पड़ने के पीछे एक रोचक कहानी है। पुराने समय में इस क्षेत्र में डाकुओं का काफी आतंक था। डाकुओं के हमले से लोगों को सावधान करने के लिए मंदिर में एक बड़ा घंटा जोर-जोर से बजाया जाता था, जिससे ‘ठन-ठन’ की आवाज निकलती थी। इसी ध्वनि के कारण मंदिर का नाम ‘ठनठनिया कालीबाड़ी’ प्रसिद्ध हो गया।मां काली का ‘सिद्धेश्वरी’ स्वरूप मंदिर के गर्भगृह में मां काली की प्रतिमा मिट्टी की बनी हुई है, जिसे ‘सिद्धेश्वरी काली’ कहा जाता है। हर साल कार्तिक अमावस्या (दीपावली) के दिन मां की प्रतिमा को नए सिरे से रंगा जाता है। यहां मां काली शांत मुद्रा में नहीं, बल्कि अपने रौद्र और शक्तिशाली स्वरूप में विराजमान हैं, जो भक्तों की सभी बाधाओं को दूर करती हैं।मछली और मांस का भोग: एक तांत्रिक परंपरा बंगाल में शक्ति पूजा की तांत्रिक पद्धति का गहरा प्रभाव है। ठनठनिया कालीबाड़ी में मां को भोग के रूप में निम्नलिखित चीजें अर्पित की जाती हैं:मछली का भोग: यहां रोजाना मां को मछली का भोग लगाना अनिवार्य माना जाता है।बलि और मांस: विशेष अवसरों और अमावस्या पर यहां पशु बलि की प्राचीन परंपरा रही है, जिसके बाद मांस को प्रसाद के रूप में पकाया और वितरित किया जाता है।लूची और बैंगन भाजा: मां को लूची (पूरी) और बैंगन की सब्जी भी बेहद प्रिय मानी जाती है।रामकृष्ण परमहंस का था गहरा जुड़ाव कहा जाता है कि महान संत रामकृष्ण परमहंस अक्सर इस मंदिर में आकर मां सिद्धेश्वरी की साधना किया करते थे। स्वामी विवेकानंद के परिवार का भी इस मंदिर से गहरा नाता था। आज भी यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है, विशेषकर शनिवार और मंगलवार के दिन मंदिर में पैर रखने की जगह नहीं होती।