
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की जिस रफ्तार और तकनीक पर आज पूरी दुनिया फिदा है, वही एआई बैकएंड पर इंसानी वजूद और प्राकृतिक संसाधनों के लिए एक बेहद खौफनाक खतरा बनती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली लेटेस्ट रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें साफ कहा गया है कि एआई को चलाने वाले विशालकाय डेटा सेंटर्स (Data Centers) बहुत ही तेजी से हमारे हिस्से की बिजली, पानी और जमीन को चट कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के नीति निर्माताओं को झकझोर कर रख दिया है क्योंकि हम जिस डिजिटल क्रांति का जश्न मना रहे हैं, वह चुपके से वैश्विक संसाधनों पर एक असहनीय और भारी दबाव डाल रही है। 10 देशों से भी ज्यादा बिजली डकार गए ये डेटा सेंटर, UN ने दी चेतावनी यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर वाटर, एनवायरनमेंट एंड हेल्थ (UNU-INWEH) द्वारा जारी इस रिपोर्ट के आंकड़े रोंगटे खड़े करने वाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल ग्लोबल डेटा सेंटर्स ने अकेले 448 लाख वाट घंटे बिजली का अंधाधुंध इस्तेमाल किया। बिजली की यह भारी-भरकम खपत दुनिया के 10 छोटे-बड़े देशों की कुल वार्षिक बिजली खपत से भी कहीं ज्यादा है। संयुक्त राष्ट्र ने बेहद कड़े शब्दों में आगाह किया है कि एआई के तेजी से बढ़ते चलन के कारण बिजली, पानी और उपजाऊ जमीन की खपत आने वाले दिनों में एक बेहद खतरनाक और अनियंत्रित स्तर पर पहुंच जाएगी। साल 2030 का वो खौफनाक मंजर, जब 65 करोड़ लोगों से ज्यादा लगेगी बिजली संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में भविष्य को लेकर जो अनुमान लगाए गए हैं, वे किसी बुरे सपने जैसे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2030 तक ग्लोबल डेटा सेंटरों की बिजली की भूख बढ़कर 945 टेरावाट-घंटे (TWh) तक पहुंच जाएगी। यह बिजली खपत पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया जैसे घनी आबादी वाले देशों की कुल वार्षिक बिजली खपत से भी तीन गुना अधिक होगी, जहां करीब 65 करोड़ से ज्यादा लोग निवास करते हैं। यानी जितने संसाधनों में 65 करोड़ लोगों का जीवन चलता है, उतनी बिजली अकेले ये मशीनें निगल जाएंगी। पानी की खपत भी हुई बेकाबू, 1.3 अरब आबादी के हक पर डाका डेटा सेंटरों की समस्या सिर्फ बिजली तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके सर्वरों को चौबीसों घंटे चालू और ठंडा रखने के लिए पानी की भी भारी-भरकम बर्बादी हो रही है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 2030 तक इन सेंटरों को ठंडा रखने के लिए जितने पानी की खपत होगी, वह उप-सहारा अफ्रीका (Sub-Saharan Africa) के करीब 1.3 अरब लोगों की बुनियादी वार्षिक पानी की जरूरतों के बराबर होगा। इसके अलावा, ये डेटा सेंटर दुनिया भर में 14,500 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक की कीमती और उपजाऊ जमीन को पूरी तरह से अपने घेराव में ले लेंगे। सिर्फ ग्रीन एनर्जी अपनाना समाधान नहीं, समझिए इसके पीछे का वैज्ञानिक सच अब तक पर्यावरण और टेक कंपनियां अपने नुकसान को सिर्फ कार्बन उत्सर्जन (Carbon Footprint) के पैमाने पर मापती आई हैं और इसके समाधान के रूप में 'ग्रीन एनर्जी' का राग अलापती हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिकों ने इस सोच को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सिर्फ ग्रीन या रिन्यूएबल एनर्जी अपनाना ही इस संकट का हल नहीं है। उदाहरण के लिए, अगर कोयले की जगह जैव ऊर्जा (Bioenergy) का इस्तेमाल किया जाए तो कार्बन उत्सर्जन भले ही 70 प्रतिशत तक कम हो जाएगा, लेकिन इसके बदले में पानी की खपत 30 गुना और जमीन की आवश्यकता 100 गुना तक और ज्यादा बढ़ जाएगी। तकनीक के अंधाधुंध इस्तेमाल पर तुरंत सख्त नीतियां बनाने का आह्वान यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर वाटर, एनवायरनमेंट एंड हेल्थ के निदेशक प्रोफेसर कावेह मदनी ने इस रिपोर्ट को लेकर स्थिति साफ की है। उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट एआई तकनीक के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसके कारण पर्यावरण पर पड़ रहे गैर-इरादतन और विनाशकारी प्रभावों को रोकने व इसे टिकाऊ (Sustainable) बनाने के लिए एक अंतिम चेतावनी है। वर्तमान समय में दुनिया भर के डेटा सेंटरों की करीब 20 प्रतिशत ऊर्जा सिर्फ एआई के कारण खर्च हो रही है, जिसके 2030 तक बढ़कर 40 प्रतिशत होने की उम्मीद है। संयुक्त राष्ट्र ने इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए दुनिया के सभी देशों से तुरंत सख्त नीतियां बनाने और जिम्मेदारी से तकनीक का उपयोग करने का पुरजोर आह्वान किया है।
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