
News India Live, Digital Desk: अक्सर हमारे समाज में देखा जाता है कि जब शादी टूटती है, तो सबसे ज्यादा नुकसान महिला को उठाना पड़ता है। वह भावनात्मक रूप से तो टूटती ही है, आर्थिक रूप से भी उसे अक्सर खाली हाथ घर से निकाल दिया जाता है। ससुराल वाले यह कहकर गहने और सामान रख लेते हैं कि “यह तो हमारे बेटे को तोहफे में मिला था।” लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मनमानी पर रोक लगा दी है।एक ऐतिहासिक फैसले में, देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ कर दिया है कि मुस्लिम महिलाओं को तलाक के बाद वह सारा सामान वापस पाने का पूरा हक़ है, जो शादी के वक्त उन्हें या उनके पति को रिश्तेदारों की तरफ से मिला था।एक महिला की जिद्द जिसने बदल दिया कानूनयह मामला रौशनआरा बेगम नाम की एक महिला का था। 2005 में उनकी शादी हुई, लेकिन कुछ साल बाद पति ने उन्हें तलाक दे दिया। रौशनआरा ने कोर्ट में गुहार लगाई कि शादी के वक्त उनके पिता ने जो नकदी और सोने के गहने ससुराल वालों (खासकर दूल्हे) को दिए थे, वह उन्हें वापस चाहिए।हैरानी की बात यह थी कि निचली अदालत और हाई कोर्ट ने उनकी मांग यह कहकर ठुकरा दी कि “जो गिफ्ट दूल्हे को दिए गए, वो दूल्हे की संपत्ति हैं।” लेकिन रौशनआरा ने हार नहीं मानी और वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? (जो हर महिला को जानना चाहिए)जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ए. एन. वेणुगोपाल गौड़ा की बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले को पूरी तरह गलत बताया। उन्होंने ‘मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डाइवोर्स) एक्ट, 1986’ का हवाला देते हुए कुछ बहुत अहम बातें कहीं:तोहफे सुरक्षा के लिए हैं: शादी के वक्त लड़की के पिता जो भी पैसा या जेवर देते हैं, भले ही वह दूल्हे के हाथ में दिया गया हो, उसका असली मकसद बेटी की भविष्य की सुरक्षा करना होता है।पति सिर्फ ‘ट्रस्टी’ है: कोर्ट ने माना कि शादी में मिले सामान पर पति सिर्फ एक रखवाले (Trustee) की तरह है, उसका असली मालिक पत्नी ही है।हिसाब पूरा करना होगा: कोर्ट ने रौशनआरा के पूर्व पति को आदेश दिया कि वह नकद राशि और सोने के गहने तुरंत वापस करे।इसका समाज पर क्या असर होगा?यह फैसला उन लाखों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो तलाक के बाद अपनी ही चीजों के लिए अदालतों के चक्कर काटती रहती हैं। अब पति यह बहाना नहीं बना सकते कि “फलाना गिफ्ट तो मेरे नाम पर दिया गया था।” सुप्रीम कोर्ट ने साफ सन्देश दिया है कि कानून का मकसद तकनीकी पेंच में फंसाना नहीं, बल्कि एक अकेली महिला को उसका सम्मान और हक़ दिलाना है।
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