
उत्तर प्रदेश की त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था और ग्रामीण राजनीति के गलियारों से इस वक्त की एक बेहद बड़ी और कूटनीतिक खबर सामने आ रही है। सूबे की सभी जिला पंचायतों और क्षेत्र पंचायतों (बीडीसी) का पांच साल का संवैधानिक कार्यकाल अगले महीने पूरी तरह से समाप्त होने जा रहा है। कार्यकाल की समाप्ति की तारीख नजदीक आते ही राज्य के प्रशासनिक महकमे और राजनीतिक हलकों में आगामी व्यवस्था को लेकर भारी हलचल और कयासबाजी का दौर शुरू हो गया है। इसी बीच ग्रामीण जनप्रतिनिधियों और पंचायती राज के जानकारों की तरफ से एक बेहद कड़क मांग उठने लगी है। मांग की जा रही है कि जिस तरह ग्राम पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने पर वहां कामकाज सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रशासक नियुक्त किए जाते हैं, ठीक उसी तर्ज पर जिला और क्षेत्र पंचायतों में भी तत्काल प्रभाव से प्रशासकों की कमान सौंप दी जाए। अगले महीने खत्म हो रही है जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों की कुर्सी उत्तर प्रदेश में मौजूदा जिला पंचायतों और क्षेत्र पंचायतों के बोर्ड का कार्यकाल अगले महीने अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि अगले महीने के बाद सभी जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों के प्रशासनिक व वित्तीय अधिकार पूरी तरह से समाप्त हो जाएंगे। जब तक राज्य में नए पंचायत चुनाव संपन्न नहीं हो जाते, तब तक इन बेहद महत्वपूर्ण ग्रामीण संस्थाओं के विकास कार्यों को ठप होने से बचाने के लिए एक कूटनीतिक और वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था का होना बेहद जरूरी है। इसी क्रेडिबिलिटी को ध्यान में रखते हुए शासन स्तर पर कानूनी पहलुओं को खंगाला जा रहा है कि कार्यकाल खत्म होने के अगले ही दिन से कमान किसके हाथ में सौंपी जाए। विकास कार्य न हों ठप, इसलिए ग्राम पंचायतों की तर्ज पर प्रशासक बनाने की वकालत पंचायती राज व्यवस्था से जुड़े संगठनों और जानकारों का कूटनीतिक तर्क है कि जिला और क्षेत्र पंचायतों के पास ग्रामीण इलाकों के विकास के लिए करोड़ों रुपये का बजट होता है। सड़कों का निर्माण, नालियां, पेयजल योजनाएं और स्कूलों की मरम्मत जैसे तमाम बड़े काम इन्हीं दोनों संस्थाओं के माध्यम से संचालित किए जाते हैं। यदि कार्यकाल खत्म होने के बाद समय पर प्रशासकों की नियुक्ति नहीं की गई, तो विकास कार्य पूरी तरह से अधर में लटक सकते हैं। पूर्व में जिस प्रकार ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पूरा होने पर वहां के सहायक विकास अधिकारी (ADO Panchayat) या अन्य अधिकारियों को प्रशासक की जिम्मेदारी दी जाती रही है, उसी कड़े फॉर्मूले को जिला स्तर पर भी लागू करने की मांग ने अब जोर पकड़ लिया है। प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट, डीएम और सीडीओ संभाल सकते हैं बड़ी कमान अगर शासन इस कूटनीतिक मांग को स्वीकार करते हुए प्रशासक नियुक्त करने के फॉर्मूले पर आगे बढ़ता है, तो जिला और क्षेत्र पंचायतों की पूरी कमान सीधे तौर पर ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) के हाथों में आ जाएगी। कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, जिला पंचायतों में जिलाधिकारी (DM) या मुख्य विकास अधिकारी (CDO) को प्रशासक नियुक्त किया जा सकता है, जबकि क्षेत्र पंचायतों (ब्लॉक स्तर) पर उप जिलाधिकारी (SDM) या खंड विकास अधिकारी (BDO) को वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सौंपे जा सकते हैं। इस व्यवस्था के लागू होने से ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे विकास कार्यों की गति भी बनी रहेगी और सरकारी बजट का कूटनीतिक इस्तेमाल भी समय पर सुनिश्चित किया जा सकेगा। राज्य निर्वाचन आयोग की तैयारियों और आगामी पंचायत चुनावों पर टिकी सबकी नजरें जिला व क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही अब हर किसी की नजरें उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग की कूटनीतिक तैयारियों पर टिक गई हैं। हालांकि, परिसीमन, मतदाता पुनरीक्षण और सीटों के आरक्षण की एक बेहद लंबी और कानूनी प्रक्रिया के चलते चुनावों के आयोजन में कुछ वक्त लग सकता है। ऐसे में चुनाव संपन्न होने तक की अंतरिम अवधि के लिए प्रशासकों की नियुक्ति का फैसला सबसे सटीक और व्यावहारिक नजर आ रहा है। अब देखना यह होगा कि इस महत्वपूर्ण मांग पर योगी सरकार आने वाले दिनों में क्या बड़ा और कड़ा फैसला लेती है और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास का नया कूटनीतिक रोडमैप किस तरह तैयार किया जाता है।
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