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‘आम पब्लिशर्स के लिए वक्त नहीं, पर बंद कमरों में घंटों मीटिंग…’ सूचना विभाग के सहायक निदेशक अनुराग प्रसाद के रवैये पर भड़के लोग

उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में अंदर खाने कुछ ऐसा चल रहा है..जिसे नहीं चलना चाहिए था…!! बाहर से आए "दो खिलाड़ी" अधिकारी खुलकर बैटिंग कर रहे हैं….!! कोई डर नहीं कोई जवाबदेही नहीं….!! खुद का राग फिट है …अगर उस राग पर आपका राग सेट हो गया तो आप सूचना विभाग की पिच पर कहीं से भी बिना बल्ले के शाट्स खेलिए..!!! विभाग के विज्ञापन आवंटन में मनमानी या कुछ और? सूचना विभाग के सहायक निदेशक अनुराग प्रसाद के रवैये से पब्लिशर्स में भारी आक्रोश है। किसी भी सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुँचाने में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। इस विभाग का काम पारदर्शी तरीके से सभी पब्लिशर्स और मीडिया माध्यमों को साथ लेकर चलना है। लेकिन हाल के दिनों में विभाग के भीतर से आ रही खबरें एक अलग ही कहानी बयां कर रही हैं। विभाग के सहायक निदेशक (Assistant Director) अनुराग प्रसाद के कामकाज के तरीके और उनके रवैये को लेकर स्थानीय और आम पब्लिशर्स के बीच गहरा असंतोष पनप रहा है। पब्लिशर्स का आरोप है कि विभाग के भीतर पक्षपात और मनमानी का एक नया ढर्रा चल पड़ा है, जिससे छोटे और स्वतंत्र मीडिया हाउसों का अस्तित्व खतरे में आ गया है। बंद कमरों में मीटिंग और आम पब्लिशर्स की अनदेखी का आरोप विभिन्न मीडिया पब्लिशर्स द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों में सबसे गंभीर आरोप सहायक निदेशक के पक्षपातपूर्ण व्यवहार को लेकर है। पब्लिशर्स का कहना है कि जहां एक तरफ आम पब्लिशर्स अपनी जायज मांगों और विज्ञापनों के सिलसिले में मिलने पहुंचते हैं, तो उन्हें मिलने के लिए कुछ मिनट का समय भी बड़ी मुश्किल से मिलता है। अक्सर उन्हें टाल दिया जाता है या उनके प्रपोजल पर विचार तक नहीं किया जाता। इसके विपरीत, आरोप है कि कुछ खास प्रपोजल और महिला प्रतिनिधियों के आने पर नियमों को ताक पर रख दिया जाता है। बंद कमरों में घंटों तक मीटिंग का दौर चलता है और उन प्रपोजल्स पर बिना किसी देरी के तत्काल विज्ञापन जारी कर दिए जाते हैं। पब्लिशर्स का कहना है कि इस तरह का दोहरा मापदंड और भेदभावपूर्ण रवैया किसी भी सरकारी अधिकारी की गरिमा और विभाग की पारदर्शिता के खिलाफ है। डीएवीपी (DAVP) नियमों का बहाना या निजी नुकसान को छुपाने की कोशिश? जब छोटे पब्लिशर्स अपने रोके गए भुगतानों या नए विज्ञापनों की मांग को लेकर सहायक निदेशक अनुराग प्रसाद के पास जाते हैं, तो उन्हें अक्सर एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता है। अधिकारियों का तर्क होता है कि "डीएवीपी (DAVP) के आधार पर नॉन-डीएवीपी (Non-DAVP) का भुगतान करने के लिए शासन स्तर पर फाइल अभी विचाराधीन है।" इस तकनीकी बहाने को आगे कर महीनों से पब्लिशर्स की फाइलें दबाकर रखी गई हैं। लेकिन इस कथित 'विचाराधीन फाइल' के पीछे का सच कुछ और ही इशारा करता है: करोड़ों का खेल: एक तरफ जहां छोटे पब्लिशर्स को बजट और फाइलों का हवाला देकर खाली हाथ लौटाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ विभाग द्वारा चुनिंदा लोगों के लिए करोड़ों रुपये के विज्ञापन लगातार जारी किए जा रहे हैं। तुरंत भुगतान: केवल विज्ञापन जारी ही नहीं हो रहे, बल्कि बैक-चैनल से उनका मोटा भुगतान भी समय पर क्लियर किया जा रहा है। पब्लिशर्स का सीधा सवाल: क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है? छोटे और मध्यम पब्लिशर्स का कहना है कि जब नियम सबके लिए एक समान होते हैं, तो फिर बजट और फाइलों का संकट सिर्फ आम लोगों के लिए ही क्यों पैदा होता है? एक ही विभाग के भीतर दो अलग-अलग व्यवस्थाएं चलना साफ तौर पर यह दर्शाता है कि पारदर्शिता की आड़ में मनमानी का खेल चल रहा है। अगर शासन स्तर पर फाइलें रुकी हैं, तो फिर करोड़ों के अन्य विज्ञापनों का भुगतान किस आधार पर किया जा रहा है? इस पूरे घटनाक्रम ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। पब्लिशर्स ने अब इस मामले को उच्च अधिकारियों और शासन के आला दरबार तक ले जाने की तैयारी कर ली है, ताकि इस कथित भेदभाव और विज्ञापन आवंटन के खेल की निष्पक्ष जांच हो सके और सभी को उनका वाजिब हक मिल सके।