
दक्षिण-पूर्व एशियाई द्वीप राष्ट्र इंडोनेशिया में एक बार फिर कुदरत का भीषण प्रकोप देखने को मिला है। बीते 24 घंटों के भीतर देश के अलग-अलग हिस्सों में धरती 3 बार जोरदार तरीके से हिली, जिससे लाखों लोग दहशत में आ गए। सबसे ताजा और शक्तिशाली झटका रिक्टर पैमाने पर 6.0 तीव्रता का मापा गया।
भूकंप के झटके इतने तीव्र थे कि बहुमंजिला इमारतें झूलने लगीं, दीवारों में दरारें आ गईं और घरों के पंखे व सामान तेजी से हिलने लगे। कंपन महसूस होते ही लोग चीखते-चिल्लाते हुए अपने घरों, दफ्तरों और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स से निकलकर खुले मैदानों व सड़कों की ओर भागे। लगातार आ रहे आफ्टरशॉक्स (भूकंप के बाद के झटके) के डर से कई तटीय और संवेदनशील इलाकों में लोग रात भर खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हुए। स्थानीय आपदा प्रबंधन एजेंसियां और मौसम विज्ञान विभाग (BMKG) स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
'पैसिफिक रिंग ऑफ फायर': भूगर्भीय हलचलों का सबसे संवेदनशील चक्रव्यूह
इंडोनेशिया में बार-बार आने वाले विनाशकारी भूकंपों को समझने के लिए इसकी भौगोलिक और भूगर्भीय अवस्थिति को जानना अनिवार्य है। इंडोनेशिया दुनिया के सबसे सक्रिय सिस्मिक और वॉल्केनिक क्षेत्र 'पैसिफिक रिंग ऑफ फायर' (Ring of Fire) के ठीक ऊपर स्थित है। यह प्रशांत महासागर के चारों ओर लगभग 40,000 किलोमीटर में फैला घोड़े की नाल (हॉर्सशू) के आकार का एक ऐसा इलाका है, जहां दुनिया के 75 फीसदी से अधिक सक्रिय ज्वालामुखी मौजूद हैं और दुनिया के 90 फीसदी भूकंप यहीं दर्ज किए जाते हैं।
इंडोनेशिया की जमीन के नीचे पृथ्वी की चार प्रमुख टेक्टोनिक प्लेटों का निरंतर और तीव्र टकराव होता रहता है। इनमें इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट, यूरेशियन प्लेट, पैसिफिक प्लेट और फिलीपीन सी प्लेट शामिल हैं। इंडो-ऑस्ट्रेलियन प्लेट लगातार उत्तर दिशा की ओर खिसकते हुए यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है। प्लेटों के इस घर्षण और सबडक्शन (एक प्लेट का दूसरी के नीचे जाना) से जमीन के भीतर भारी मात्रा में ऊर्जा संचित होती रहती है। जब यह ऊर्जा अचानक फॉल्ट लाइनों के जरिए बाहर निकलती है, तो इंडोनेशिया के द्वीप भयंकर जलजले से कांप उठते हैं।
6.0 तीव्रता का विज्ञान: उथले केंद्र ने क्यों बढ़ाई तबाही की आशंका?
रिक्टर पैमाने पर 6.0 तीव्रता का भूकंप मध्यम से तीव्र श्रेणी में आता है, जो कमजोर संरचनाओं को गिराने और मजबूत इमारतों को नुकसान पहुंचाने में सक्षम होता है। रिक्टर स्केल एक लॉगरिदमिक पैमाना है, जिसका अर्थ यह है कि प्रत्येक पूर्ण संख्या में वृद्धि के साथ जमीन का कंपन 10 गुना और ऊर्जा का उत्सर्जन लगभग 32 गुना बढ़ जाता है। यानी 6.0 तीव्रता का झटका 5.0 तीव्रता के झटके की तुलना में लगभग 32 गुना अधिक ऊर्जा छोड़ता है।
इसके अलावा, भूकंप का हाइपोसेंटर (जमीन के भीतर गहराई) इसके प्रभाव को तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इंडोनेशिया के ताजा झटके उथली गहराई (Shallow Depth) पर केंद्रित थे। उथले भूकंप (10 से 35 किमी गहराई) सतह के बेहद करीब होते हैं, जिससे ऊर्जा तरंगों को सतह तक पहुंचने में बहुत कम दूरी तय करनी पड़ती है। ऊर्जा का क्षय न होने के कारण जमीन पर कंपन की तीव्रता अधिकतम होती है, जिससे न केवल जान-माल के नुकसान का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, बल्कि सुनामी की आशंका भी प्रबल हो जाती है।
सुनामी का साया और चेतावनी प्रणालियों की सक्रियता
17 हजार से अधिक द्वीपों से मिलकर बने इंडोनेशिया में जब भी समुद्र के भीतर या तटीय इलाकों में 6.0 या उससे अधिक तीव्रता का उथला भूकंप आता है, तो सबसे बड़ा खतरा सुनामी का मंडराने लगता है। जब समुद्र की तलहटी में मौजूद टेक्टोनिक प्लेट अचानक ऊपर या नीचे खिसकती है, तो समुद्र का लाखों टन पानी तेजी से विस्थापित होता है और तटों की ओर दैत्याकार लहरों के रूप में बढ़ता है।
हालांकि, 24 घंटे के भीतर आए इन झटकों के बाद इंडोनेशिया की मौसम विज्ञान, जलवायु विज्ञान और भूभौतिकीय एजेंसी (BMKG) ने त्वरित सिस्मिक विश्लेषण किया और तत्काल किसी बड़ी सुनामी के खतरे को खारिज कर दिया, जिससे तटीय इलाकों में रहने वाली आबादी ने राहत की सांस ली। 2004 की भीषण त्रासदी के बाद से इंडोनेशिया ने हिंद महासागर में अत्याधुनिक डीप-ओशन सुनामी बोया और सिस्मिक सेंसर नेटवर्क स्थापित किया है, जो किसी भी आपात स्थिति में कुछ ही मिनटों के भीतर अलर्ट जारी करने की क्षमता रखता है।
खौफनाक इतिहास: इंडोनेशिया को झकझोरने वाले प्रलयंकारी भूकंप
इंडोनेशिया का इतिहास गवाह है कि टेक्टोनिक प्लेटों की इस जंग ने देश को बार-बार गहरे मानवीय और आर्थिक जख्म दिए हैं:
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2004 का सुमात्रा-अंडमान भूकंप और सुनामी: 26 दिसंबर 2004 को सुमात्रा तट पर 9.1 से 9.3 तीव्रता का महाविनाशकारी भूकंप आया था। इसके बाद उठी 30 मीटर ऊंची सुनामी की लहरों ने इंडोनेशिया के आचे प्रांत समेत 14 देशों में तबाही मचाई थी, जिसमें 2,30,000 से अधिक लोगों की जान चली गई थी।
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2006 का योग्यकार्ता भूकंप: जावा द्वीप पर आए 6.3 तीव्रता के इस उथले भूकंप ने 5,700 से अधिक लोगों की जान ली थी और लाखों घरों को तबाह कर दिया था।
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2018 का सुलावेसी (पालू) भूकंप: 7.5 तीव्रता के भूकंप के बाद आई सुनामी और भीषण मृदा द्रवीकरण (सॉइल लिक्विफैक्शन) के चलते पूरा पालू शहर धंस गया था, जिसमें 4,300 से ज्यादा मौतें दर्ज की गई थीं।
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2022 का सियानजूर (जावा) भूकंप: केवल 5.6 तीव्रता का होने के बावजूद, अत्यधिक उथले केंद्र और घनी आबादी वाले क्षेत्र के कारण इस भूकंप ने 300 से अधिक लोगों की जान ली थी और हजारों स्कूल व मकान जमींदोज कर दिए थे।
क्या किसी बड़े 'सुंडा मेगाथ्रस्ट' महाभूकंप की आहट हैं ये झटके?
भूवैज्ञानिकों के लिए 24 घंटे में तीन लगातार झटकों का आना बेहद संवेदनशील संकेत है। वैज्ञानिक लंबे समय से सुमात्रा और जावा के तट पर स्थित 'सुंडा मेगाथ्रस्ट' (Sunda Megathrust) फॉल्ट लाइन पर नजर गड़ाए हुए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस क्षेत्र में लंबे समय से एक बड़ा सिस्मिक गैप बना हुआ है, जहां भारी मात्रा में टेक्टोनिक तनाव फंसा हुआ है।
लगातार आने वाले 5.5 से 6.0 तीव्रता के झटके यह दर्शाते हैं कि फॉल्ट लाइनों के बीच लगातार घर्षण हो रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या ये झटके ऊर्जा को धीरे-धीरे मुक्त कर रहे हैं या फिर ये किसी आने वाले विशालकाय भूकंप (मेगाक्वेक) का पूर्वाभास हैं। ऐसी अनिश्चित परिस्थितियों में, इंडोनेशियाई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सख्त भूकंपरोधी बिल्डिंग कोड लागू करना, जनता के बीच नियमित मॉक ड्रिल संचालित करना और तटीय इलाकों में तेजी से निकासी की पुख्ता योजना तैयार रखना है ताकि भविष्य की किसी भी अनहोनी से जनहानि को न्यूनतम किया जा सके।
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