
भारत में परिवहन और आवागमन का परिदृश्य बीते कुछ वर्षों में बुनियादी तौर पर बदल चुका है। कभी एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए जाम, टूटी सड़कें और सुस्त रफ्तार वाली रेलगाड़ियां यात्रियों के घंटों बर्बाद कर देती थीं। आज वही सफर विश्वस्तरीय एक्सेस-कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे और स्वदेशी सेमी-हाईस्पीड ट्रेनों के जरिए फर्राटेदार और बेहद सुगम बन चुका है। केंद्र सरकार की 'भारतमाला परियोजना', 'गति शक्ति नेशनल मास्टर प्लान' और भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण अभियान ने मिलकर देश के प्रमुख औद्योगिक, व्यापारिक और धार्मिक केंद्रों के बीच की दूरियों को समय के पैमाने पर आधा कर दिया है।
एक्सप्रेसवे क्रांति: सड़कों पर 100 से 120 किमी/घंटा की निर्बाध रफ्तार
देश में आधुनिक एक्सप्रेसवे का बढ़ता नेटवर्क केवल कंक्रीट की सड़कें नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की नई जीवनरेखा बन चुका है। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, समृद्धि महामार्ग (मुंबई-नागपुर), और बेंगलुरु-मैसूरु एक्सप्रेसवे जैसे प्रोजेक्ट्स ने अंतर-शहर यात्रा के अनुभव को पूरी तरह बदल दिया है। इन 6 से 8 लेन वाले नियंत्रित-पहुंच मार्गों पर बिना किसी ट्रैफिक सिग्नल या स्थानीय रुकावट के वाहन 100 से 120 किमी प्रति घंटे की गति से दौड़ते हैं। उदाहरण के तौर पर, लखनऊ से गाजीपुर तक 340 किलोमीटर से अधिक लंबे पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के बनने से पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों की दूरी जो पहले 10 से 12 घंटे लेती थी, अब घटकर महज 4 से 5 घंटे रह गई है। इसी तरह आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे और यमुना एक्सप्रेसवे के तालमेल ने राजधानी लखनऊ से दिल्ली तक का सड़क मार्ग का सफर 6 से 7 घंटे के भीतर समेट दिया है।
वंदे भारत और नमो भारत: रेलवे के बदलते ट्रैक और घटते घंटे
सड़क परिवहन के साथ-साथ भारतीय रेलवे ने भी गति और आराम के मामले में लंबी छलांग लगाई है। स्वदेशी तकनीक से निर्मित वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनों ने देश के कोने-कोने में लंबी दूरी के सफर को घंटों छोटा कर दिया है। 130 से 160 किमी प्रति घंटे की परिचालन गति वाली इन चेयर-कार और स्लीपर ट्रेनों ने यात्रियों को हवाई यात्रा जैसा अनुभव पटरियों पर दिया है। दिल्ली से वाराणसी, दिल्ली से कटरा, मुंबई से अहमदाबाद, और चेन्नई से मैसूरु जैसे व्यस्त रेल रूटों पर यात्रा समय में 25% से 40% तक की भारी कटौती दर्ज की गई है। इसके समानांतर, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में संचालित 'नमो भारत' (RRTS – रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम) ने दिल्ली, गाजियाबाद और मेरठ के बीच आवागमन को अभूतपूर्व गति दी है, जिससे दैनिक यात्रियों को जाम से पूरी मुक्ति मिली है।
लॉजिस्टिक्स लागत में कमी और व्यापारिक गतिविधियों को मिला बूस्ट
एक्सप्रेसवे और तेज रेल कनेक्टिविटी का सबसे बड़ा लाभ देश की अर्थव्यवस्था और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को मिल रहा है। पहले जहां भारी ट्रकों और मालवाहक वाहनों को एक राज्य से दूसरे राज्य जाने में टोल नाकों, खराब सड़कों और शहरी जाम के कारण कई दिन लग जाते थे, वहीं अब समर्पित फ्रेट कॉरिडोर (Dedicated Freight Corridor – DFC) और एक्सप्रेसवे के जरिए माल ढुलाई का समय 50% तक कम हो गया है। समय की बचत से ईंधन की भारी खपत घटी है, वाहनों का रखरखाव खर्च कम हुआ है और देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लॉजिस्टिक्स लागत को घटाकर वैश्विक मानकों के करीब लाने में बड़ी सफलता मिल रही है। औद्योगिक गलियारों (Industrial Corridors) के एक्सप्रेसवे के किनारे विकसित होने से स्थानीय स्तर पर रोजगार और विनिर्माण इकाइयों को नई गति मिली है।
टियर-2 और टियर-3 शहरों का मेट्रो शहरों से सीधा जुड़ाव
इस बुनियादी ढांचे की क्रांति ने देश के छोटे शहरों की किस्मत बदल दी है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, प्रयागराज, और वाराणसी जैसे शहर अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से इतने करीब महसूस होते हैं कि लोग सुबह निकलकर शाम तक अपना काम निपटाकर वापस लौट सकते हैं। दक्षिण भारत में बेंगलुरु और चेन्नई के बीच नए एक्सप्रेसवे कॉरिडोर से दोनों आईटी हब के बीच की दूरी महज दो से तीन घंटे की रह जाएगी। पश्चिमी भारत में मुंबई और नागपुर के बीच का फासला समृद्धि महामार्ग के कारण 16 घंटे से घटकर लगभग 8 घंटे पर आ चुका है। इस तेज कनेक्टिविटी ने न केवल पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं और उच्च शिक्षा तक आम जनता की पहुंच को आसान बनाया है, बल्कि रियल एस्टेट और स्थानीय उद्योगों में भी भारी उछाल ला दिया है।
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