
देश की राजनीति में इन दिनों विरोध प्रदर्शनों के नए और अनोखे तरीके देखने को मिल रहे हैं, जो अक्सर बड़े राजनीतिक और नैतिक विवादों को जन्म दे देते हैं। दक्षिण भारत के राज्य केरलम (Kerala) के पलक्कड़ जिले से एक बेहद चौंकाने वाली और सनसनीखेज खबर सामने आई है। यहां मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एक ऐसा विरोध प्रदर्शन किया, जिसने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त की प्रतीकात्मक अर्थी निकालकर न केवल उनका अंतिम संस्कार किया, बल्कि जली हुई 'राख' को सार्वजनिक शौचालय में बहाकर अपना कड़ा आक्रोश जताया। इस अजीबोगरीब और आक्रामक विरोध प्रदर्शन के बाद से देश भर में एक नई बहस छिड़ गई है कि क्या संवैधानिक पदों पर बैठे प्रमुख अधिकारियों के खिलाफ इस तरह के तरीकों का इस्तेमाल लोकतांत्रिक मर्यादाओं के दायरे में आता है।
पलक्कड़ में ब्लॉक कांग्रेस कमेटी द्वारा निकाला गया अनोखा मार्च
यह पूरा मामला केरलम के पलक्कड़ शहर का है, जहां ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के बैनर तले कार्यकर्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सड़कों पर उतरकर जबरदस्त प्रदर्शन किया। प्रदर्शन की शुरुआत जिला कांग्रेस कमेटी (DCC) कार्यालय से हुई, जहां कार्यकर्ता हाथों में बैनर-पोस्टर और एक प्रतीकात्मक अर्थी लेकर नारेबाजी करते हुए आगे बढ़े। यह मार्च शहर के व्यस्त इलाकों से गुजरते हुए स्टेडियम बस स्टैंड के पास पहुंचा।
बस स्टैंड के पास पहुंचकर कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन को एक कदम और आगे बढ़ाया। उन्होंने वहां मुख्य चुनाव आयुक्त की एक बड़ी तस्वीर पर हार-फूल चढ़ाए और हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार से जुड़े तमाम कर्मकांडों का मंचन किया। इसके बाद सरेआम मुख्य चुनाव आयुक्त की प्रतीकात्मक चिता को आग के हवाले कर दिया गया। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अपनी नाराजगी व्यक्त की।
राख को शौचालय में बहाने से बढ़ा राजनीतिक और नैतिक विवाद
इस विरोध प्रदर्शन का वह हिस्सा सबसे ज्यादा विवादित और चर्चा का विषय बन गया, जब चिता जलने के बाद का घटनाक्रम सामने आया। प्रदर्शनकारी कार्यकर्ताओं ने चिता से बची हुई राख को बड़े ही प्रतीकात्मक और अपमानजनक तरीके से इकट्ठा किया और पास ही बने एक सार्वजनिक शौचालय में ले जाकर बहा दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे उच्च संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति के खिलाफ इस तरह के प्रदर्शन और राख को शौचालय में बहाने की हरकत ने राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाओं को जन्म दे दिया है।
इस घटना के सामने आते ही विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों ने कांग्रेस पार्टी के इस आक्रामक रवैये की कड़ी निंदा करनी शुरू कर दी है। आलोचकों का कहना है कि विरोध जताना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन किसी संवैधानिक संस्था के मुखिया के खिलाफ इस तरह के अमर्यादित और अपमानजनक कृत्यों का सहारा लेना देश की लोकतांत्रिक गरिमा के बिल्कुल विपरीत है।
कांग्रेस पार्टी के दोहरे मापदंडों पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल
इस विरोध प्रदर्शन के बाद केरलम की राजनीति में कांग्रेस पार्टी के कथित दोहरे रवैये और दोहरे मापदंडों को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक जानकारों और विरोधी दलों का कहना है कि कुछ समय पहले इसी पलक्कड़ जिले के प्रतिष्ठित 'गवर्नमेंट विक्टोरिया कॉलेज' के प्रिंसिपल के खिलाफ वामपंथी छात्र संगठन (SFI) ने इसी तरह से एक प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार का प्रदर्शन किया था।
उस समय कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं और प्रवक्ताओं ने एसएफआई के उस कृत्य की बेहद कड़ी शब्दों में आलोचना की थी और उसे असंसदीय व अशोभनीय करार दिया था। अब सवाल यह उठाया जा रहा है कि जब वामपंथियों ने ऐसा किया तो वह गलत था, लेकिन जब खुद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ यही तरीका अपनाया, तो वह कैसे सही हो गया? इस विरोधाभास के चलते कांग्रेस पार्टी अब विपक्षी दलों के साथ-साथ आम जनता के बीच भी तीखे सवालों के घेरे में आ गई है।
इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भारत की राजनीतिक संस्कृति में विरोध जताने की सीमाएं अब धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं, जहां संवैधानिक पदों की गरिमा को दरकिनार किया जा रहा है।
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