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खालिदा जिया और भारत कभी गहरी कड़वाहट, तो कभी बेरुखी आखिर क्यों दिल्ली से हमेशा उलझी रहीं खालिदा?

News India Live, Digital Desk : बांग्लादेश की राजनीति की बात हो और वहां की ‘दो बेगमों’ (खालिदा जिया और शेख हसीना) का जिक्र न आए, ऐसा मुमकिन नहीं। जहाँ एक तरफ शेख हसीना का झुकाव हमेशा भारत की तरफ रहा, वहीं खालिदा जिया के दौर में भारत-बांग्लादेश रिश्तों ने कई बार काले दिन देखे। आज जब उनकी चर्चा हो रही है, तो उन पुरानी फाइलों को खोलना भी जरूरी है, जो बताती हैं कि खालिदा के राज में भारत के साथ तनातनी इतनी क्यों बढ़ गई थी।क्यों बनीं खालिदा ‘भारत के लिए सिरदर्द’?सच्चाई यह है कि खालिदा जिया की राजनीति ‘राष्ट्रवाद’ के उस रास्ते पर चलती थी, जिसमें भारत के विरोध को एक बड़े औजार के रूप में इस्तेमाल किया गया। उनके कार्यकाल में यह साफ महसूस होता था कि ढाका का झुकाव नई दिल्ली के बजाय इस्लामाबाद और कट्टरपंथी ताकतों की तरफ ज्यादा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उन्होंने भारत विरोधी सेंटिमेंट को हवा देकर अपनी सियासी जमीन को मजबूत किया था।पूर्वोत्तर भारत के चरमपंथियों को खुली छूटभारत की सुरक्षा के लिहाज से सबसे बुरा दौर वह था, जब खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों (Northeast India) में उग्रवाद चरम पर था। कहा जाता है कि उस समय उल्फा (ULFA) और अन्य विद्रोही समूहों को बांग्लादेश की धरती पर सुरक्षित ठिकाने मिले हुए थे। भारत कई बार इस मुद्दे को उठाता रहा, लेकिन खालिदा की सरकार अक्सर इन आरोपों को सिरे से खारिज कर देती थी। इसी वजह से दोनों देशों के सुरक्षा तंत्र के बीच भरोसे की कमी कभी पूरी नहीं हो पाई।कट्टरपंथियों का साथ और बढ़ता खतराखालिदा जिया की पार्टी बीएनपी (BNP) का ‘जमात-ए-इस्लामी’ जैसे कट्टरपंथी संगठनों के साथ गठबंधन भारत की चिंता का सबसे बड़ा कारण था। भारत हमेशा से चाहता रहा है कि उसकी सीमा के पास एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ढांचा बना रहे, लेकिन खालिदा के राज में कट्टरवाद को मिली हवा ने सीमाओं पर अस्थिरता और अवैध घुसपैठ की समस्याओं को और गंभीर बना दिया।एक कड़वाहट भरा कूटनीतिक सफरसिर्फ सुरक्षा के मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि नदी जल बंटवारे और ट्रेड को लेकर भी उनके दौर में बातचीत हमेशा ठंडी रही। भले ही व्यक्तिगत स्तर पर वो एक गरिमामयी नेत्री रहीं, लेकिन कूटनीति के पन्नों में उनका कार्यकाल भारत के लिए एक ‘कठिन दौर’ की तरह दर्ज है।खालिदा जिया के जाने के बाद आज इतिहास उन्हें उनकी मजबूती के लिए याद कर रहा है, लेकिन भारत-बांग्लादेश की साझी दोस्ती में वो ‘तल्ख यादें’ आज भी कहीं न कहीं चुभती हैं।