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जेल बनी गैंगस्टरों का सेफ हेवन: सलाखों के पीछे से चल रहा अपराध का साम्राज्य, कैसे काम करता है यह खतरनाक नेक्सस

कानून की नजर में जेल को अपराधियों को सुधारने, उन्हें उनके किए की सजा देने और समाज से दूर रखने के लिए एक सुरक्षित चारदीवारी माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से देश की सुरक्षा एजेंसियों और न्याय व्यवस्था के सामने एक बहुत बड़ा और चिंताजनक सवाल खड़ा हो गया है कि क्या वाकई जेलें अब अपराधियों के लिए सजा की जगह बन गई हैं या फिर वे दुर्दांत गैंगस्टरों के लिए 'कमांड सेंटर' (Command Center) में तब्दील हो चुकी हैं? हाल के दिनों में सामने आए कई सनसनीखेज मामलों ने यह साबित कर दिया है कि बड़े-बड़े गैंगस्टर सलाखों के पीछे बैठकर भी अपने आपराधिक सिंडिकेट को उतनी ही आसानी से चला रहे हैं जितना वे बाहर रहकर चलाते थे। जेल के अंदर बैठकर फिरौती मांगना, कारोबारियों को धमकाना और बड़ी वारदातों की साजिश रचना आज के समय में एक कड़वी सच्चाई बन चुका है। आइए विस्तार से जानते हैं कि किस तरह जेलें गैंगस्टरों के लिए मुफीद ठिकाना बनती जा रही हैं और इसके पीछे का पूरा काला सच क्या है।

1990 के दशक से शुरू हुआ था जेलों से अपराध संचालन का दौर और आज की स्थिति

यदि हम भारतीय अपराध जगत के इतिहास पर नजर डालें, तो जेल के अंदर से वारदातों को अंजाम देने की यह प्रवृत्ति नई नहीं है। 1990 के दशक के दौर में भी देश के कई बड़े गैंगस्टरों ने जेल के भीतर से ही व्यापारियों, बिल्डरों और आम नागरिकों को निशाना बनाने का खेल शुरू किया था। हालांकि, समय-समय पर कड़े प्रशासनिक कदमों और पुलिस की सख्ती के कारण इन अवैध गतिविधियों पर कुछ हद तक लगाम कसने में सफलता जरूर मिली थी, लेकिन यह जड़ से खत्म नहीं हो सका।

हाल ही में अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर हुए हमले जैसे गंभीर मामलों के तूल पकड़ने के बाद एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि क्या जेल प्रशासन अपराधियों पर नकेल कसने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। आम आदमी के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस जेल की सुरक्षा व्यवस्था को सबसे चाक-चौबंद माना जाता है, वहां बैठकर कोई अपराधी अपने गुनाहों का साम्राज्य कैसे बेखौफ चला सकता है।

लॉरेंस बिश्नोई गैंग और जेल की चारदीवारी से चल रहे आपराधिक षड्यंत्र

वर्तमान समय में जेलों के भीतर से चल रहे आपराधिक नेटवर्क का सबसे बड़ा उदाहरण लॉरेंस बिश्नोई (Lawrence Bishnoi) और उसके गिरोह की गतिविधियां हैं। देश को दहलाने वाले कई हाई-प्रोफाइल मामलों और हाल ही में हुई गोलीबारी की घटनाओं में बिश्नोई गैंग का नाम सामने आया है। हैरानी की बात यह है कि इस गैंग का मुखिया लॉरेंस बिश्नोई गुजरात की अत्यधिक सुरक्षा वाली साबरमती सेंट्रल जेल में बंद है, जबकि उसका भाई अनमोल बिश्नोई दिल्ली की तिहाड़ जेल या अन्य सुरक्षित ठिकानों पर कैद बताया जाता है।

अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग हाई-सिक्योरिटी जेलों में बंद होने के बावजूद इन सरगनाओं के नाम पर लगातार रंगदारी वसूली जा रही है और सनसनीखेज वारदातों को अंजाम दिया जा रहा है। पिछले कुछ सालों में मुंबई और अन्य बड़े शहरों में हुई कई बड़ी फायरिंग व हत्या की वारदातों के तार सीधे तौर पर जेल के अंदर बैठे इन्हीं चेहरों से जुड़े पाए गए हैं। जेल के अंदर रहने का एक बड़ा फायदा इन गैंगस्टरों को यह मिलता है कि वे अपने पारंपरिक दुश्मनों के हमलों और पुलिस एनकाउंटर के खतरे से पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं, और जेल उनकी सुरक्षा का सबसे मजबूत कवच बन जाती है।

अंडरवर्ल्ड का पुराना इतिहास: दाऊद इब्राहिम से लेकर अरुण गवली तक का तरीका

जेल के अंदर से क्राइम सिंडिकेट चलाने का यह तरीका नया नहीं है। अतीत के पन्नों को पलटें तो पाएंगे कि अंडरवर्ल्ड के डॉन दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन और अबू सलेम जैसे अपराधी भले ही देश से बाहर विदेशों में बैठकर मुंबई और देश के अन्य हिस्सों में हमलों के निर्देश देते रहे हों, लेकिन देश के भीतर कई स्थानीय और बड़े गैंगस्टर हमेशा से जेलों को अपना अड्डा बनाते आए हैं।

मुंबई, पुणे, ठाणे और नासिक जैसी बड़ी जेलों के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण दर्ज हैं जहां गैंगस्टरों ने सलाखों के पीछे रहते हुए ही अपने लिए नए शूटरों की भर्ती की, व्यापारियों से जबरन वसूली (Extortion) के नेटवर्क को संभाला और हत्या के आदेश दिए। उदाहरण के लिए, कुख्यात गैंगस्टर अरुण गवली और अश्विन नाइक जैसे नाम देश के अंदर ही रहकर जेल की बैरकों से अपने आपराधिक गिरोहों का संचालन करते रहे हैं। अरुण गवली पर तो यहां तक आरोप लगे थे कि उसने जेल के भीतर रहते हुए ही शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के बेहद करीबी माने जाने वाले जयंत जाधव की हत्या की बड़ी साजिश रची थी। बताया जाता है कि गवली को एक जेल से दूसरी जेल में ट्रांसफर किए जाने के फैसले में जाधव की भूमिका थी, जिससे नाराज होकर गवली ने कथित तौर पर जेल के अंदर से ही उसकी हत्या का फरमान जारी कर दिया था। इसके अलावा, गैंगस्टर नाइक पर भी जेल में बंद रहते हुए अपनी ही पत्नी नीता नाइक की हत्या का आदेश देने के गंभीर आरोप लग चुके हैं।

जेल के अंदर गैंगस्टरों को कैसे मिलती है मदद? भ्रष्टाचार का गंदा खेल

सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि कड़े सुरक्षा पहरे, सीसीटीवी कैमरों और जेल मैनुअल के कड़े नियमों के बावजूद गैंगस्टरों तक बाहरी दुनिया की हर सुविधा और संदेश कैसे पहुंच जाते हैं? इस पूरी व्यवस्था के पीछे एक बड़ा और भ्रष्ट नेक्सस काम करता है।

  • भ्रष्ट पुलिसकर्मी और जेल स्टाफ: जेल के भीतर गैंग्स को सबसे बड़ी मदद कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों की तरफ से मिलती है। पैसों की भारी रिश्वत, महंगे तोहफे या अन्य प्रलोभनों के लालच में आकर कुछ अधिकारी नियमों को ताक पर रख देते हैं।

  • अवैध मोबाइल और संचार साधन: इन्हीं भ्रष्ट कर्मचारियों की मिलीभगत से जेल की कोठरियों तक मोबाइल फोन, सिम कार्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पहुंचाए जाते हैं, जिससे गैंगस्टर बिना किसी रुकावट के अपने गुर्गों से बात कर सकें।

  • वकीलों और मुलाकातों का दुरुपयोग: जेल के अंदर बंद सरगनाओं से मिलने आने वाले वकीलों, पेशी पर ले जाने वाले पुलिसकर्मियों और अन्य मुलाकातियों के जरिए गोपनीय संदेश बाहर तक पहुंचाए जाते हैं। इस तरह से कोड वर्ड में निर्देश देकर वे अपने साम्राज्य को बेरोक-टोक चलाते रहते हैं।

निष्कर्ष: व्यवस्था में सुधार की सख्त जरूरत

जेलों के अंदर से चल रहा यह आपराधिक साम्राज्य देश की आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। यदि समय रहते जेल प्रशासनों में कड़े तकनीकी सुधार, जैमर की पुख्ता व्यवस्था और भ्रष्ट अधिकारियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, तो सलाखों के पीछे बैठे ये अपराधी आम जनता के लिए और अधिक खतरनाक साबित होते रहेंगे। न्याय प्रणाली और पुलिस प्रशासन को मिलकर इस नेक्सस को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए कुछ ठोस और कड़े कदम उठाने होंगे, ताकि जेल वास्तव में अपराधियों के लिए सजा की जगह बन सके, न कि उनका सुरक्षित दफ्तर।