
वैश्विक राजनीति के मंच पर जब भी वॉशिंगटन और बीजिंग के शीर्ष नेतृत्व की बैठक होती है, दुनिया की नजरें महाशक्तियों के रुख पर टिक जाती हैं। डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत में व्यापार शुल्क, तकनीकी वर्चस्व, ताइवान संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला हमेशा केंद्र में रहते हैं। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़े, खिलौने और औद्योगिक कलपुर्जों के मामले में अमेरिका का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार होने के बावजूद एक ऐसा क्षेत्र है जहां बीजिंग के लिए पेंटागन के दरवाजे पूरी तरह सील हैं—हथियारों का कारोबार।
वॉशिंगटन और बीजिंग: व्यापार में अरबों डॉलर, लेकिन रक्षा क्षेत्र में शून्य डील
आंकड़ों पर गौर करें तो संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बीच हर साल सैकड़ों अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है। अमेरिकी सुपरमार्केट्स से लेकर सिलिकॉन वैली तक चीनी उत्पादों की भरमार दिखती है। इसके ठीक उलट जब बात सामरिक सुरक्षा और मिलिट्री हार्डवेयर की आती है, तो अमेरिका अपनी सेना के लिए चीन से एक बुलेट या ड्रोन तक नहीं खरीदता। यह कोई संयोग नहीं बल्कि कई दशकों से चली आ रही कठोर विदेश नीति, रणनीतिक अविश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सुविचारित फैसला है।
1989 का तियानमेन स्क्वायर नरसंहार और स्थायी अमेरिकी हथियार प्रतिबंध
अमेरिका द्वारा चीनी हथियारों के आयात और निर्यात पर पूर्ण पाबंदी की नींव जून 1989 की तियानमेन स्क्वायर घटना के बाद पड़ी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश के प्रशासन ने बीजिंग द्वारा मानवाधिकारों के घोर हनन के विरोध में चीन पर कड़े रक्षा प्रतिबंध थोप दिए। इस कानून के तहत अमेरिका ने चीन को किसी भी प्रकार की रक्षा सामग्री, संवेदनशील सैन्य उपकरण और दोहरे उपयोग वाली तकनीकों की बिक्री पर पूर्ण रोक लगाई। साथ ही चीन से अमेरिकी रक्षा बलों के लिए किसी भी सैन्य साजो-सामान के आयात को पूरी तरह गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। यह प्रतिबंध आज भी पूरी ताकत से लागू है।
बैकडोर जासूसी और आधुनिक साइबर वारफेयर का जानलेवा जोखिम
इक्कीसवीं सदी का युद्ध केवल तोप और बारूद का नहीं, बल्कि सॉफ्टवेयर, माइक्रोचिप्स, एआई एल्गोरिदम और सैटेलाइट कनेक्टिविटी का खेल बन चुका है। पेंटागन के रणनीतिकारों को स्पष्ट डर है कि यदि चीन से कोई रक्षा उपकरण या सैन्य चिप्स खरीदी जाती हैं, तो उनमें 'हार्डवेयर ट्रोजन' या गुप्त बैकडोर प्रोग्राम मौजूद हो सकते हैं। युद्ध की स्थिति में बीजिंग महज एक साइबर कमांड से अमेरिकी मिसाइल डिफेंस, रडार नेटवर्क या फाइटर जेट्स के एवियोनिक्स को पंगु बना सकता है। यही कारण है कि अमेरिकी कांग्रेस ने नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट (NDAA) के तहत चीनी टेलीकॉम और टेक कंपनियों को अमेरिकी डिफेंस सप्लाई चेन से बाहर निकाल फेंका है।
रिवर्स इंजीनियरिंग और बौद्धिक संपदा चोरी की कड़वी हकीकत
अमेरिकी रक्षा उद्योग की रीढ़ उसकी बेजोड़ तकनीक और नवाचार है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के कई आधुनिक लड़ाकू विमान, जैसे जे-20 स्टील्थ फाइटर और जे-31, अमेरिकी एफ-22 और एफ-35 के डिज़ाइनों से हैरान करने वाली समानता रखते हैं। अमेरिका का लंबे समय से आरोप रहा है कि चीन ने औद्योगिक जासूसी और साइबर हैकिंग के जरिए पेटेंट तकनीकें चुराई हैं। ऐसे माहौल में अगर अमेरिका चीन के साथ किसी रक्षा व्यापार या संयुक्त निर्माण में शामिल होता है, तो उसकी शेष अत्याधुनिक मिलिट्री तकनीकों के लीक होने का शत-प्रतिशत खतरा बना रहता है।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का भू-राजनीतिक टकराव और ताइवान का सवाल
चीन केवल अमेरिका का व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि अमेरिकी नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी में दर्ज उसका सबसे बड़ा रणनीतिक व सैन्य प्रतिस्पर्धी है। साउथ चाइना सी में चीन की कृत्रिम सैन्य चौकियों का निर्माण, पूर्वी लद्दाख में भारत के साथ सीमा विवाद, और ताइवान पर जबरन कब्जे की बीजिंग की धमकियां सीधे अमेरिकी हितों को चुनौती देती हैं। अमेरिका ताइवान को अरबों डॉलर के अत्याधुनिक हथियार बेचता है ताकि वह चीनी हमले को रोक सके। ऐसे प्रतिद्वंद्वी से हथियार खरीदना, जो किसी भी समय सीधे युद्ध में सामने आ सकता है, रणनीतिक आत्मघात के समान होगा।
नाटो इंटरऑपरेबिलिटी और अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक परिसर की आत्मनिर्भरता
अमेरिकी रक्षा प्रणाली पूरी तरह से नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के मानकों के अनुरूप काम करती है। पश्चिमी हथियारों की प्रोग्रामिंग, संचार आवृत्ति और युद्ध प्रणालियां चीनी मानक के बिल्कुल अनुकूल नहीं हैं। दूसरी अहम बात यह है कि अमेरिका खुद दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है। लॉकहीड मार्टिन, बोइंग, नॉर्थ्रॉप ग्रुम्मन, रेथियॉन और जनरल डायनेमिक्स जैसी दिग्गज अमेरिकी कंपनियां दुनिया के सबसे घातक हथियार बनाती हैं। पेंटागन 'बाय अमेरिकन' नीति के तहत अपनी घरेलू कंपनियों और नाटो सहयोगियों को प्राथमिकता देता है, जिससे उसकी सैन्य आत्मनिर्भरता अटूट बनी रहे।
डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच होने वाले उच्चस्तरीय राजनयिक संवाद भले ही टैरिफ, मुद्रा विनिमय या कृषि व्यापार में तात्कालिक राहत ला दें, लेकिन दोनों देशों के सैन्य संबंध कभी सामान्य नहीं हो सकते। हथियारों की खरीद-फरोख्त विश्वास की सर्वोच्च बुनियाद पर टिकी होती है, और जब तक बीजिंग व वॉशिंगटन वैश्विक प्रभुत्व की जंग में आमने-सामने हैं, पेंटागन के शस्त्रागार में 'मेड इन चाइना' का कोई स्थान नहीं होगा।
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