
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सार्वजनिक प्रदर्शनों और कानून-व्यवस्था के नाम पर इंटरनेट सेवाओं को निलंबित करने तथा मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश-निकास द्वार बंद किए जाने की प्रशासनिक कार्यशैली पर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद कड़ा ऐतराज जताया है। सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने इस मुद्दे को नागरिकों के बुनियादी मौलिक अधिकारों और दैनिक जीवन में आवागमन की स्वतंत्रता से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन हर छोटे-बड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक परिवहन तंत्र को ठप कर देना और इंटरनेट बंद कर देना आम जनता के लिए अनुचित प्रताड़ना का कारण बन रहा है। इस मामले में संज्ञान लेते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के गृह सचिव और दिल्ली पुलिस कमिश्नर को औपचारिक नोटिस जारी कर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: सार्वजनिक असुविधा और संवैधानिक अधिकारों का टकराव
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली पीठ ने मौखिक टिप्पणियों में कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसकी आड़ में या इसे रोकने के लिए पूरी राजधानी के जनजीवन को बंधक नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि लुटियंस दिल्ली, मध्य दिल्ली या संवेदनशील इलाकों में प्रदर्शन के आह्वान मात्र से डीएमआरसी (DMRC) के कई प्रमुख मेट्रो स्टेशनों को घंटों या पूरे दिन के लिए बंद कर दिया जाता है। इससे अस्पताल जाने वाले मरीजों, स्कूल-कॉलेज के छात्रों, प्रतियोगी परीक्षा के परीक्षार्थियों और दफ्तर जाने वाले कामकाजी लोगों को भारी जाम और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। अदालत ने सख्त लहजे में पूछा कि क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बुनियादी ढांचे और संचार माध्यमों को बंद करना ही एकमात्र प्रशासनिक विकल्प रह गया है?
इंटरनेट शटडाउन और मेट्रो स्टेशन सील करने के मानक नियमों पर सवाल
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष विस्तृत आंकड़े पेश करते हुए तर्क दिया कि दिल्ली जैसे संवेदनशील महानगर में टेलीकॉम सस्पेंशन रूल्स (इंटरनेट निलंबन नियम) और धारा 144 का इस्तेमाल नियमित प्रशासनिक हथियार की तरह किया जाने लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए सवाल किया कि क्या स्टेशन बंद करने या मोबाइल इंटरनेट डेटा ब्लॉक करने से पहले किसी भी स्तर पर 'आनुपातिकता के सिद्धांत' (Doctrine of Proportionality) का परीक्षण किया जाता है? अदालत ने अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले की नजीर याद दिलाते हुए दोहराया कि इंटरनेट का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है और इसका निलंबन केवल अपरिहार्य राष्ट्रीय सुरक्षा संकट की स्थिति में ही न्यूनतम समय के लिए किया जा सकता है। मेट्रो स्टेशनों की अचानक बंदी से सड़कों पर वाहनों का अत्यधिक दबाव बढ़ जाता है, जिससे पूरी दिल्ली में घंटों ट्रैफिक जाम की स्थिति बन जाती है।
केंद्रीय गृह सचिव और दिल्ली पुलिस कमिश्नर को नोटिस: किन बिंदुओं पर मांगा जवाब?
सर्वोच्च न्यायालय ने मामले में केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस नेतृत्व को नोटिस जारी करते हुए आगामी सुनवाई से पहले व्यापक जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत ने प्रमुख रूप से तीन बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है:
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निर्णय लेने की वैधानिक प्रक्रिया: किसी इलाके में मेट्रो स्टेशन बंद करने या टेलीकॉम सेवाएं निलंबित करने का निर्णय किस स्तर के अधिकारी द्वारा लिया जाता है और इसके लिए क्या कोई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) मौजूद है?
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पूर्व सूचना तंत्र का अभाव: स्टेशनों को बंद करने या रूट डायवर्ट करने की सूचना आम जनता को रियल-टाइम में सही समय पर क्यों नहीं मिल पाती, जिससे लाखों यात्री बीच रास्ते में फंस जाते हैं?
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वैकल्पिक सुरक्षा रणनीति: क्या राजधानी पुलिस के पास भारी भीड़ और प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए ऐसी आधुनिक तकनीक और रणनीतिक उपाय नहीं हैं जिनसे आम नागरिकों की दैनिक आवाजाही प्रभावित न हो?
आम जनता, छात्र और कामकाजी वर्ग पर पड़ रहा दोहरा असर
याचिका में इस बात को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है कि राजीव चौक, केंद्रीय सचिवालय, मंडी हाउस, आईटीओ, पटेल चौक और उद्योग भवन जैसे प्रमुख इंटरचेंज और केंद्रीय मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद होने से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) यानी नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद से आने वाले दैनिक यात्रियों की पूरी दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो जाती है। ऑनलाइन डिलीवरी सेवाएं, यूपीआई और डिजिटल भुगतान तंत्र, एम्बुलेंस सेवाएं और अस्पतालों की आपातकालीन कनेक्टिविटी इंटरनेट बंदी के कारण बुरी तरह चरमरा जाती है। वकीलों ने दलील दी कि कई मामलों में छात्रों की ऑनलाइन परीक्षाएं छूट गईं और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं में देरी हुई, जिसकी जवाबदेही प्रशासन को लेनी चाहिए।
अदालत की भावी दिशा: राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट एसओपी (SOP) बनाने की तैयारी
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि वह इस मामले में केवल दिल्ली तक सीमित रहने के बजाय पूरे देश के लिए विरोध प्रदर्शनों के दौरान संचार और सार्वजनिक परिवहन को नियंत्रित करने के संबंध में एक राष्ट्रीय स्तर का दिशानिर्देश या एसओपी (Standard Operating Procedure) तैयार कर सकता है। अदालत का मानना है कि सुरक्षा एजेंसियों को आधुनिक भीड़ प्रबंधन (Crowd Management) तकनीकों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, ताकि सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक सेवाओं का सुचारू संचालन सुनिश्चित किया जा सके। मामले की अगली सुनवाई आगामी कुछ हफ्तों में तय की गई है, जिस पर देश भर के कानूनी विशेषज्ञों और आम नागरिकों की निगाहें टिकी हुई हैं।
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