
किसी भी राष्ट्र की तरक्की और उसके भविष्य की दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपनी आने वाली पीढ़ियों के ज्ञान, कौशल और अनुसंधानों पर कितना निवेश करता है। आज के तकनीक-संचालित दौर में शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), वैज्ञानिक अनुसंधान, उन्नत बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी के निर्माण का सबसे सशक्त जरिया बन चुकी है। यही वजह है कि दुनिया के तमाम समृद्ध और विकसित देश अपनी अर्थव्यवस्था यानी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का एक बड़ा हिस्सा अपने एजुकेशन सिस्टम पर न्योछावर कर देते हैं।
नॉर्डिक और विकसित देश: शिक्षा को मानते हैं सर्वांगीण विकास का मूलमंत्र
जब वैश्विक स्तर पर शिक्षा पर होने वाले सरकारी खर्च का विश्लेषण किया जाता है, तो उत्तरी यूरोप के नॉर्डिक देश हमेशा इस सूची में शीर्ष पायदान पर नजर आते हैं। स्वीडन, आइसलैंड, डेनमार्क और फिनलैंड जैसे देश अपनी जीडीपी का लगभग 6.4 प्रतिशत से लेकर 7.3 प्रतिशत तक का भारी-भरकम हिस्सा शिक्षा पर खर्च करते हैं।
इन देशों में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शोध तक की व्यवस्था न केवल पूरी तरह से विश्वस्तरीय है, बल्कि अधिकांश नागरिकों के लिए लगभग नि:शुल्क या बेहद रियायती दरों पर उपलब्ध है। वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, ब्रिटेन (UK) अपनी जीडीपी का लगभग 5.3 प्रतिशत, फ्रांस 5.2 प्रतिशत और अमेरिका लगभग 4.9 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा प्रणाली पर व्यतीत करता है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों का मुख्य फोकस उच्च शिक्षा, अत्याधुनिक लैब्स, यूनिवर्सिटी रिसर्च और पेटेंट फाइलिंग पर होता है, जिससे वे दुनिया भर के मेधावी छात्रों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहते हैं।
एशियाई महाद्वीप का गणित: चीन, जापान और अन्य पड़ोसियों का रुख
एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की बात करें तो यहां शिक्षा पर होने वाले खर्च का पैटर्न थोड़ा भिन्न और दिलचस्प नजर आता है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन अपनी जीडीपी का लगभग 3.6 से 4.0 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा क्षेत्र में लगाता है। हालांकि, चीन की विशाल जीडीपी के कारण यह राशि मौद्रिक मूल्य में बहुत बड़ी होती है, जो मुख्य रूप से वोकेशनल ट्रेनिंग और सेमीकंडक्टर-टेक्नोलॉजी रिसर्च में जाती है।
दूसरी ओर, अत्यधिक विकसित माना जाने वाला जापान अपनी जीडीपी का लगभग 3.3 प्रतिशत हिस्सा ही शिक्षा पर सरकारी तौर पर खर्च करता है। हालांकि जापान में निजी क्षेत्र और परिवारों का शिक्षा पर व्यक्तिगत योगदान काफी अधिक होता है। दक्षिण एशिया के अन्य पड़ोसी देशों में भूटान अपनी जीडीपी का 7.5 प्रतिशत और कजाकिस्तान लगभग 7.2 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करके आश्चर्यजनक रूप से काफी आगे बने हुए हैं।
भारत की वास्तविक स्थिति: यूनेस्को रिपोर्ट और अंतरराष्ट्रीय मानक
यूनेस्को (UNESCO) की हालिया वैश्विक रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने अपनी जीडीपी का औसतन 4.1 प्रतिशत से लेकर 4.6 प्रतिशत तक हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में आवंटित किया है। यूनेस्को का 'एजुकेशन 2030 फ्रेमवर्क फॉर एक्शन' दुनिया के सभी देशों को अपनी जीडीपी का कम से कम 4 से 6 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च करने का सुझाव देता है। इस अंतरराष्ट्रीय मानक के पैमाने पर भारत अपनी स्थिति को सफलतापूर्वक संतुलित रखे हुए है।
जीडीपी प्रतिशत के आधार पर देखा जाए तो भारत का यह आवंटन चीन और जापान जैसे बड़े एशियाई देशों के सरकारी जीडीपी खर्च के अनुपात से भी अधिक नजर आता है। भारत अपने कुल सरकारी खर्च का लगभग 13.5 प्रतिशत से 17.2 प्रतिशत तक हिस्सा शिक्षा सेवाओं, बुनियादी ढांचे, मध्याह्न भोजन योजना (PM POSHAN) और प्राथमिक साक्षरता अभियानों पर खर्च करता है, जो संयुक्त राष्ट्र के 15 से 20 प्रतिशत के अनुशंसित दायरे के काफी करीब है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और 6% जीडीपी का महत्वाकांक्षी लक्ष्य
भारत सरकार द्वारा घोषित 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' (NEP 2020) में यह स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयासों से देश के शिक्षा बजट को बढ़ाकर जीडीपी के 6 प्रतिशत तक पहुंचाया जाएगा। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के साझा बजटीय योगदान से देश में डिजिटल कक्षाओं, पीएम श्री (PM SHRI) स्कूलों, नए आईआईटी (IITs), आईआईएम (IIMs) और मेडिकल कॉलेजों का जाल बिछाया जा रहा है।
भारत में शिक्षा पर होने वाले कुल खर्च को दो स्तरों पर देखा जाता है—पहला केंद्र सरकार का बजट आवंटन और दूसरा राज्य सरकारों का योगदान। चूंकि शिक्षा समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय है, इसलिए प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का एक बड़ा आर्थिक बोझ राज्य सरकारों के कंधों पर होता है। दक्षिण और पश्चिम भारत के कई राज्य शिक्षा पर अपने बजट का अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं, जबकि अन्य राज्यों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त बजटीय सहायता की लगातार आवश्यकता बनी हुई है।
क्वालिटी वर्सेस क्वांटिटी: खर्च के साथ गुणवत्ता में सुधार की चुनौती
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल जीडीपी का प्रतिशत बढ़ा देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि खर्च की जाने वाली राशि का प्रभावी और पारदर्शी उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में मुख्य चुनौती केवल स्कूलों और कॉलेजों का निर्माण करना नहीं, बल्कि शोध एवं नवाचार (R&D), शिक्षक प्रशिक्षण (Teacher Training) और कौशल विकास (Skill Development) में सुधार करना है।
वर्तमान में भारत अपनी जीडीपी का एक सीमित हिस्सा ही शोध और विकास (Research & Development) पर खर्च करता है, जो अमेरिका और दक्षिण कोरिया जैसे अग्रणी देशों की तुलना में कम है। यदि भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के साथ-साथ 'ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था' (Knowledge Economy) के रूप में स्थापित होना है, तो उच्च शिक्षा में इनोवेशन, पेटेंट फाइलिंग और रिसर्च स्कॉलरशिप पर खर्च को तेजी से बढ़ाना होगा।
भविष्य का रोडमैप: एआई और डिजिटल शिक्षा का नया दौर
आने वाले वर्षों में वैश्विक शिक्षा का स्वरूप पूरी तरह बदलने वाला है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कोडिंग, रोबोटिक्स और डिजिटल साक्षरता अब प्राथमिक स्तर से ही पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बन रहे हैं। ऐसे में भारत को अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में डिजिटल असमानता (Digital Divide) को समाप्त करने पर केंद्रित करना होगा।
भारत सरकार द्वारा 'समग्र शिक्षा अभियान' और 'अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन' (ANRF) जैसी पहलों के माध्यम से बजटीय आवंटन को परिणाम-उन्मुख बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। यदि भारत NEP 2020 के तहत अपनी जीडीपी के 6 प्रतिशत खर्च के लक्ष्य को पूर्ण रूप से हासिल कर लेता है, तो यह न केवल देश की साक्षरता दर को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की युवा मानव पूंजी को सबसे प्रतिस्पर्धी और कुशल ताकत के रूप में स्थापित करेगा।
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