
विशेष स्वास्थ्य रिपोर्टर, नई दिल्ली: भारतीय घरों में दूध को संपूर्ण आहार माना गया है। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, सुबह की चाय से लेकर रात में हल्दी वाले गर्म दूध तक, डेयरी उत्पाद हमारी दैनिक दिनचर्या का अहम हिस्सा रहे हैं। हालांकि, क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि दूध पीने या पनीर-मिठाई खाने के कुछ ही देर बाद आपके पेट में गुड़गुड़ाहट होने लगे, पेट फूल जाए या तेज दर्द और गैस की समस्या शुरू हो जाए? यदि ऐसा बार-बार होता है, तो इसे केवल साधारण बदहजमी या पेट की खराबी मानकर नजरअंदाज करने की भूल न करें। यह 'लैक्टोज इंटॉलरेंस' (Lactose Intolerance) का स्पष्ट संकेत हो सकता है।
हालिया स्वास्थ्य सर्वेक्षणों और गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में एक बहुत बड़ी आबादी लैक्टोज इंटॉलरेंस की समस्या से प्रभावित है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण लोग इसे सामान्य पेट की बीमारी समझते रहते हैं। यह समस्या केवल वयस्कों में ही नहीं, बल्कि बच्चों और युवाओं में भी तेजी से देखी जा रही है। आइए जानते हैं कि लैक्टोज इंटॉलरेंस क्या है, शरीर पर इसका क्या असर पड़ता है और इससे कैसे बचा जा सकता है।
लैक्टोज इंटॉलरेंस क्या है और यह दूध की एलर्जी से कैसे अलग है?
लैक्टोज वास्तव में एक प्रकार की प्राकृतिक चीनी (Natural Sugar) है जो दूध और सभी प्रकार के डेयरी उत्पादों में पाई जाती है। जब हम दूध पीते हैं, तो हमारी छोटी आंत (Small Intestine) 'लैक्टेज' (Lactase) नामक एक विशेष एंजाइम बनाती है। इस एंजाइम का काम दूध में मौजूद लैक्टोज चीनी को ग्लूकोज और गैलेक्टोज में तोड़ना होता है, जिससे शरीर इसे आसानी से पचाकर ऊर्जा में बदल सके।
जब किसी व्यक्ति की छोटी आंत में लैक्टेज एंजाइम का निर्माण कम होने लगता है या बिल्कुल बंद हो जाता है, तो शरीर दूध की मिठास यानी लैक्टोज को पचाने में असमर्थ हो जाता है। इस स्थिति को ही 'लैक्टोज इंटॉलरेंस' कहा जाता है। जब बिना पचा हुआ लैक्टोज छोटी आंत से होकर बड़ी आंत (Large Intestine) में पहुंचता है, तो वहां मौजूद बैक्टीरिया इसे फरमेंट (Ferment) करने लगते हैं। इसी प्रक्रिया के कारण पेट में अत्यधिक गैस, एसिडिटी, सूजन और ऐंठन पैदा होती है।
बहुत से लोग लैक्टोज इंटॉलरेंस और 'मिल्क एलर्जी' (Milk Allergy) को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों में बड़ा अंतर है। मिल्क एलर्जी हमारी इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली) की प्रतिक्रिया है, जहां शरीर दूध के प्रोटीन (कैसीन या वे प्रोटीन) को दुश्मन मानकर उस पर हमला करता है, जिससे त्वचा पर चकत्ते, सांस लेने में तकलीफ या चेहरे पर सूजन आ सकती है। वहीं, लैक्टोज इंटॉलरेंस पूरी तरह से पाचन तंत्र की कमजोरी से जुड़ी समस्या है।
दूध पीते ही शरीर में दिखने वाले 5 मुख्य लक्षण: ऐसे करें पहचान
यदि दूध या उससे बनी चीजों का सेवन करने के 30 मिनट से 2 घंटे के भीतर आपको नीचे दिए गए लक्षण महसूस होते हैं, तो आपको लैक्टोज इंटॉलरेंस हो सकता है:
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पेट में भारीपन और ब्लोटिंग (Bloating): दूध पीने के थोड़ी ही देर बाद पेट गुब्बारे की तरह फूल जाना और असहजता महसूस होना इसका सबसे पहला और मुख्य लक्षण है।
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अत्यधिक गैस और पेट में गुड़गुड़ाहट: बड़ी आंत में लैक्टोज के सड़ने के कारण लगातार पेट में गैस बनती है और तेज आवाजें (Gurgling Sound) सुनाई देती हैं।
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पेट के निचले हिस्से में ऐंठन और दर्द: आंतों में गैस के दबाव के कारण नाभि के आसपास या पेट के निचले भाग में तेज मरोड़ और दर्द महसूस हो सकता है।
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दस्त या पतला मल (Diarrhea): बिना पचा हुआ लैक्टोज आंतों में पानी खींचता है, जिससे अचानक पतला दस्त या बार-बार टॉयलेट भागने की स्थिति बन जाती है।
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जी मिचलाना और उल्टी का अहसास: कई लोगों को दूध पीने के बाद लगातार उल्टी जैसा महसूस होता है या सिर भारी हो जाता है।
भारत में क्यों बढ़ रहे हैं लैक्टोज इंटॉलरेंस के मामले?
वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि नवजात शिशु के शरीर में लैक्टेज एंजाइम भरपूर मात्रा में बनता है क्योंकि उनका मुख्य आहार मां का दूध ही होता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है और बच्चे ठोस आहार खाना शुरू करते हैं, शरीर में लैक्टेज एंजाइम का बनना प्राकृतिक रूप से धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसे 'प्राइमरी लैक्टोज इंटॉलरेंस' कहा जाता है।
इसके अलावा, कई बार पेट में गंभीर संक्रमण (जैसे टाइफाइड, फूड पॉइजनिंग या सीलिएक डिजीज) होने के कारण आंतों की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचता है। इस वजह से भी अस्थायी रूप से लैक्टेज एंजाइम बनना बंद हो जाता है, जिसे 'सेकेंडरी लैक्टोज इंटॉलरेंस' कहते हैं। आंतों का स्वास्थ्य ठीक होने पर यह समस्या स्वतः दूर भी हो सकती है।
लैक्टोज इंटॉलरेंस की जांच कैसे की जाती है?
यदि आपमें ये लक्षण दिखते हैं, तो डॉक्टर से परामर्श लेकर निम्नलिखित जांच कराई जा सकती है:
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हाइड्रोजन ब्रीथ टेस्ट (Hydrogen Breath Test): इस टेस्ट में मरीज को लैक्टोज युक्त घोल पिलाया जाता है और सांस में हाइड्रोजन गैस के स्तर को मापा जाता है। यदि सांस में हाइड्रोजन का स्तर अधिक आता है, तो यह लैक्टोज न पचने का पक्का सबूत है।
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एलिमिनेशन डाइट (Elimination Diet Test): आप खुद भी 1 से 2 सप्ताह के लिए दूध और सभी डेयरी उत्पादों का सेवन पूरी तरह बंद करके देख सकते हैं। यदि आपके पेट की समस्याएं पूरी तरह ठीक हो जाती हैं, तो यह लैक्टोज इंटॉलरेंस की ओर इशारा करता है।
दूध बंद करने पर कैसे मिलेगी कैल्शियम और विटामिन डी की खुराक?
लैक्टोज इंटॉलरेंस से पीड़ित लोगों के मन में सबसे बड़ा डर यह होता है कि अगर वे दूध पीना बंद कर देंगे, तो उनकी हड्डियां कमजोर हो जाएंगी और शरीर में कैल्शियम की भारी कमी हो जाएगी। हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि चिंता करने की कोई बात नहीं है, क्योंकि बाजार और प्रकृति में दूध के बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं:
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प्लांट-बेस्ड मिल्क (Plant-Based Milk): गाय या भैंस के दूध की जगह आप बादाम का दूध (Almond Milk), सोया मिल्क (Soy Milk), नारियल का दूध (Coconut Milk) या ओट मिल्क (Oats Milk) पी सकते हैं। सोया मिल्क में गाय के दूध जितना ही प्रोटीन और कैल्शियम पाया जाता है।
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लैक्टोज-फ्री मिल्क (Lactose-Free Milk): आजकल बाजारों में लैक्टोज-फ्री दूध आसानी से उपलब्ध है। इसमें से औद्योगिक रूप से लैक्टोज को हटा दिया जाता है, जिससे यह आसानी से पच जाता है।
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दही और छाछ (Yogurt & Buttermilk): आश्चर्यजनक रूप से, कई लैक्टोज इंटॉलरेंट लोग बिना किसी समस्या के दही और छाछ का सेवन कर सकते हैं। दही जमाने वाले बैक्टीरिया (Lactobacillus) दूध के अधिकांश लैक्टोज को पहले ही लैक्टिक एसिड में बदल देते हैं, जिससे यह सुपाच्य हो जाता है।
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गैर-डेयरी कैल्शियम स्रोत: कैल्शियम के लिए आप अपनी खुराक में रागी (Nachni), हरी पत्तेदार सब्जियां (पालक, मेथी), तिल (Sesame Seeds), राजमा, चना, बादाम, अंजीर और टोफू (Tofu) शामिल कर सकते हैं।
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लैक्टेज एंजाइम सप्लीमेंट्स: यदि आपको किसी शादी या पार्टी में मजबूरीवश डेयरी उत्पाद खाने पड़ रहे हैं, तो डॉक्टर की सलाह पर आप भोजन से ठीक पहले लैक्टेज एंजाइम की गोलियां ले सकते हैं, जो पाचन में मदद करती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि पेट में बार-बार होने वाली समस्याओं को नजरअंदाज न करें। अपनी खान-पान की आदतों पर ध्यान दें और यदि दूध आपको परेशान कर रहा है, तो तुरंत अपने आहार में बदलाव करें ताकि आपका पाचन तंत्र स्वस्थ रहे और शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्व मिलते रहें।
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