
बिहार की राजधानी पटना में हाल ही में हुई सनसनीखेज गोलीबारी और बढ़ते अपराध के ग्राफ ने एक बार फिर सूबे की कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस दर्दनाक और दहला देने वाली घटना के बाद राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। जन सुराज पार्टी के सूत्रधार और राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने पटना गोलीकांड को लेकर राज्य की नीतीश कुमार सरकार पर अब तक का सबसे तीखा और आक्रामक हमला बोला है। उन्होंने सरकार को खुली चुनौती देते हुए सीधा सवाल किया है कि यदि पुराना दौर 'जंगल राज' था, तो आज सरेआम हो रही इन वारदतों को क्या नाम दिया जाए। प्रशांत किशोर ने यहां तक कह दिया कि या तो अपराधियों का एनकाउंटर कीजिए या फिर उन्हें सरेआम फांसी पर लटका दीजिए, वरना इस राज्य की जनता का कानून से पूरी तरह भरोसा उठ जाएगा। इस बयान के सामने आने के बाद से बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया है और हर तरफ इसी बात की चर्चा हो रही है कि क्या वाकई सुशासन बाबू के राज में कानून-व्यवस्था पूरी तरह बेपटरी हो चुकी है।
पटना गोलीकांड की खौफनाक दास्तान और आम जनता के बीच फैला खौफ का माहौल
यह पूरी सनसनीखेज घटना पटना के व्यस्त इलाके में उस समय घटी जब बेखौफ अपराधियों ने दिनदहाड़े गोलीबारी की इस दुस्साहसिक वारदात को अंजाम दिया। इस गोलीकांड में कई निर्दोष लोगों के गोलियों का शिकार होने और गंभीर रूप से घायल होने की खबर सामने आई, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल पैदा हो गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, अपराधियों के दिलों में पुलिस और कानून का खौफ इस कदर खत्म हो चुका है कि उन्हें अब किसी का कोई डर नहीं रहा है। आए दिन राजधानी पटना समेत पूरे बिहार से हत्या, लूट, अपहरण और गोलीबारी की घटनाएं सामने आ रही हैं, जिससे आम नागरिक अपने ही घरों में खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। इस तरह की वारदतों ने पुलिस प्रशासन की कार्यशैली और सुरक्षा दावों की पोल खोलकर रख दी है, जिसके बाद से लगातार सरकार विरोधी सुर तेज होते जा रहे हैं।
प्रशांत किशोर का तीखा तंज: 'जंगल राज' की परिभाषा और मौजूदा सरकार की नाकामी पर सवाल
अपनी जन सुराज यात्रा और जनसभाओं के माध्यम से लगातार बिहार की व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले प्रशांत किशोर ने पटना गोलीकांड को लेकर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने पुरानी सरकारों के कार्यकाल की याद दिलाते हुए मौजूदा सत्ताधीशों से तीखे शब्दों में पूछा कि अगर उस दौर को विपक्ष जंगल राज कहता था, तो आज सरेआम निर्दोषों का खून बहने वाली इस व्यवस्था को क्या कहा जाना चाहिए। पीके का साफ कहना है कि नाम बदलने या विज्ञापनों से जमीन पर हकीकत नहीं बदलती है। आज बिहार का युवा रोजगार के अभाव में पलायन करने को मजबूर है और जो लोग पीछे रह गए हैं, वे अपराधियों की गोलियों का निशाना बन रहे हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि शासन चलाने में पूरी तरह विफल हो चुकी मौजूदा सरकार को अब जनता के सामने सच स्वीकार करना चाहिए और अपराधियों के खिलाफ बिना किसी राजनीतिक दबाव के कठोरतम कार्रवाई करनी चाहिए।
अपराधियों के हौसले बुलंद, पुलिस प्रशासन और एनकाउंटर नीति पर गरमाई सियासत
बिहार में बढ़ते अपराध और बेखौफ घूम रहे अपराधियों पर लगाम कसने के लिए अब राजनीतिक गलियारों में एनकाउंटर और सख्त सजा की मांग जोर पकड़ने लगी है। प्रशांत किशोर द्वारा यह कहना कि या तो अपराधियों का एनकाउंटर किया जाए या उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाया जाए, इस बात को दर्शाता है कि राज्य की जनता और नेताओं में अब व्यवस्था को लेकर कितना भारी आक्रोश भरा पड़ा है। पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से आपराधिक घटनाओं में इजाफा हुआ है, उसने पुलिस की खुफिया तंत्र और पेट्रोलिंग व्यवस्था पर भी गंभीर उंगलियां उठाई हैं। विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि राजनीतिक संरक्षण के चलते अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं और पुलिस केवल कागजी कार्रवाई करने तक सीमित रह गई है। इस बढ़ते दबाव के बीच अब देखना यह होगा कि क्या शासन-प्रशासन नींद से जागकर कोई ठोस कदम उठाता है या फिर हालात ऐसे ही बद से बदतर बने रहते हैं।
बिहार के राजनीतिक भविष्य और बदलाव की बयार पर क्या होगा इसका असर
पटना गोलीकांड और उस पर आए प्रशांत किशोर के इस आक्रामक बयान ने आने वाले समय के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। बिहार की जनता अब परंपरागत जातियों की राजनीति से ऊपर उठकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सबसे बढ़कर अपनी सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर बात करना चाहती है। जन सुराज के मंच से उठ रही यह आवाज इस बात का संकेत है कि राज्य का मतदाता अब बदलाव चाहता है और किसी भी दल को केवल खोखले वादों के आधार पर माफ करने के मूड में नहीं है। यदि सरकार ने समय रहते अपराधियों पर नकेल नहीं कसी और कानून का राज स्थापित नहीं किया, तो आगामी चुनावों में जनता का यह आक्रोश सत्ता परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। बहरहाल, पटना की सड़कों पर बहा यह खून और उस पर हो रही सियासत ने एक बार फिर से बिहार के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खींच दी हैं।
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