Monday , September 21 2026

बिहार में उपेंद्र कुशवाहा ने दिया ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ वाला सियासी टिप्स

बिहार की सियासत में इन दिनों बयानों के तीर और राजनीतिक समीकरण इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि हर नया दिन एक नया भूचाल लेकर आ रहा है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख और अनुभवी राजनेता उपेंद्र कुशवाहा ने एक बार फिर से ऐसा तीखा और धारदार बयान दे दिया है जिसने राज्य के राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। उपेंद्र कुशवाहा ने एक सार्वजनिक मंच से समाज और पार्टी कार्यकर्ताओं को 'बंटेंगे तो कटेंगे' वाला ऐसा अचूक सियासी टिप्स दिया है, जिसके निहितार्थ आने वाले चुनावों के लिहाज से बहुत बड़े माने जा रहे हैं। सबसे खास और चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस वक्त कुशवाहा यह बयान दे रहे थे, ठीक उसी मंच पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी जैसे दिग्गज नेता भी मौजूद थे। इन तमाम बड़े चेहरों की मौजूदगी में दिए गए इस बयान ने एनडीए खेमे के भीतर और बाहर दोनों तरफ नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है, और हर कोई यह कयास लगा रहा है कि आखिर इस बयान के पीछे की असली राजनीतिक रणनीति क्या है।

बिहार जैसे जातियों के मकड़जाल में उलझे राज्य में हर एक शब्द और नारे का बहुत बड़ा रणनीतिक महत्व होता है। जब कोई नेता मंच से एकता और एकजुटता की बात करते हुए इस तरह के जुमलों का इस्तेमाल करता है, तो उसके राजनीतिक संदेश बहुत दूर तक जाते हैं। विपक्षी दलों ने इस पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया है, वहीं एनडीए के भीतर इसे एक बड़ी गोलबंदी की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। आइए इस पूरे घटनाक्रम, मंच पर मौजूद चेहरों के समीकरण और उपेंद्र कुशवाहा के इस सनसनीखेज बयान के हर एक पहलू को बेहद विस्तार से समझते हैं।

किस मंच से दिया गया यह बयान और क्यों अचानक चर्चा में आए उपेंद्र कुशवाहा?

यह पूरा वाकया उस समय का है जब राज्य की राजधानी पटना या किसी बड़े जिले में एनडीए समर्थित एक भव्य राजनीतिक या सामाजिक सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में एनडीए के कई दिग्गज नेता एक ही मंच पर नजर आए, जिससे यह दिखाने की कोशिश की जा रही थी कि सत्ताधारी गठबंधन पूरी तरह एकजुट और मजबूत है। इसी दौरान जब राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा माइक पर अपनी बात रखने आए, तो उन्होंने अपनी चिर-परिचित आक्रामक और विश्लेषणात्मक शैली में राजनीतिक और सामाजिक हालातों पर खुलकर बात की। उन्होंने अपने संबोधन के दौरान उपस्थित जनसमूह को आगाह करते हुए कहा कि यदि समाज और राजनीतिक दल छोटी-छोटी जातियों या आपसी मतभेदों के आधार पर बिखरे रहेंगे, तो विरोधी ताकतें इसका पूरा फायदा उठाएंगी।

इसी संदर्भ में उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि सभी लोग आपस में एकजुट रहें, क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज बंटा है, तब-तब उसका नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि यह नारा या वाक्य मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषणों से काफी चर्चा में आया था, लेकिन जब बिहार के संदर्भ में उपेंद्र कुशवाहा जैसे दिग्गज नेता ने इसे एनडीए के मंच से दोहराया, तो इसके राजनीतिक मायने पूरी तरह बदल गए। वहां मौजूद लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ इस बात का समर्थन किया, लेकिन इसके सियासी गलियारों में दूरगामी परिणाम पड़ने तय माने जा रहे हैं।

मंच पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी की मौजूदगी ने खींचा सबका ध्यान

इस पूरे कार्यक्रम का सबसे आकर्षक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील पहलू यह रहा कि जब उपेंद्र कुशवाहा 'बंटेंगे तो कटेंगे' जैसी बातें कह रहे थे, तब मंच पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार और बिहार के उपमुख्यमंत्री व भाजपा के दिग्गज नेता सम्राट चौधरी भी करीने से बैठे हुए थे। राजनीतिक पंडितों के लिए यह दृश्य बहुत कुछ बयां करने वाला था। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) हमेशा से सर्वधर्म समभाव और सेकुलरिज्म की राजनीति की बात करती रही है, वहीं दूसरी तरफ इस तरह के बयानों पर उनके राजनीतिक सहयोगियों की तरफ से ऐसी सहमति दिखना एक नए राजनीतिक समीकरण की ओर इशारा करता है।

निशांत कुमार की राजनीतिक सक्रियता या मंचों पर उनकी उपस्थिति को लेकर पिछले कुछ समय से अटकलों का बाजार गर्म रहता है, और ऐसे हाई-प्रोफाइल मंच पर उनका मौजूद रहना और इन बयानों को सुनना यह दर्शाता है कि गठबंधन के भीतर विचारों का एक नया सामंजस्य बिठाने की कोशिश चल रही है। वहीं, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जो खुद हिंदुत्ववादी और आक्रामक तेवरों के लिए जाने जाते हैं, वे इस बयान के दौरान बेहद तन्मयता से सुनते नजर आए। इन तीनों नेताओं का एक मंच पर होना और इस तरह के बयानों का समर्थन मिलना यह साबित करता है कि आगामी चुनावों के लिए एनडीए अपनी वैचारिक और सामाजिक गोलबंदी को और अधिक धारदार बनाने में जुट गया है।

विपक्षी दलों का तीखा पलटवार: कहा- एनडीए के पास विकास का कोई मुद्दा नहीं, इसलिए अपना रहे हैं ध्रुवीकरण का रास्ता

उपेंद्र कुशवाहा के इस बयान के सामने आते ही बिहार का मुख्य विपक्ष यानी राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस और अन्य घटक दल पूरी तरह हमलावर हो गए हैं। विपक्षी नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार पर तीखे हमले बोले और कहा कि एनडीए के पास जनता को दिखाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में कोई बड़ा विकास कार्य या रोजगार का आंकड़ा नहीं बचा है, यही वजह है कि वे चुनावों से ठीक पहले समाज को बांटने और ध्रुवीकरण करने वाले बयानों का सहारा ले रहे हैं। विपक्ष का यह आरोप है कि इस प्रकार के नारों और बयानों से राज्य का सामाजिक सौहार्द बिगड़ता है और आम जनता के असली मुद्दे जैसे महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन पीछे छूट जाते हैं।

विपक्षी खेमे का यह भी कहना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जो कभी सुशासन और सबको साथ लेकर चलने की बात करते थे, आज वे मजबूर हो चुके हैं और उनके ही मंच से ऐसे विभाजनकारी बयानों को बढ़ावा दिया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस मुद्दे को आसानी से छोड़ने वाला नहीं है और आने वाले दिनों में चुनावी रैलियों में इस बयान को एक बड़ा हथियार बनाकर एनडीए को घेरा जाएगा। बहरहाल, सत्ता पक्ष की तरफ से अभी तक इस पर कोई बहुत तीखा बचाव सामने नहीं आया है, लेकिन अंदरखाने यह माना जा रहा है कि यह बयान रणनीतिक रूप से सोच-समझकर दिया गया है।

बिहार की सियासत पर इस बयान का क्या होगा दूरगामी असर? जातिगत समीकरणों की नई बिसात

बिहार की राजनीति हमेशा से जातियों के ताने-बाने पर टिकी रही है, जहां यादव, कुर्मी, कुशवाहा, भूमिहार, राजपूत और दलित वोट बैंक हर एक पार्टी की जीत-हार तय करते हैं। उपेंद्र कुशवाहा खुद एक बड़े कोइरी (कुशवाहा) समाज के नेता हैं, जो राज्य में एक निर्णायक वोट बैंक माने जाते हैं। जब कुशवाहा समाज का एक कद्दावर नेता इस प्रकार की एकजुटता और वैचारिक नारे की बात करता है, तो इसका सीधा असर लव-कुश और अन्य पिछड़ी जातियों के समीकरणों पर पड़ता है। वे अपने समाज को यह संदेश देना चाहते हैं कि यदि वे राजनीतिक रूप से बिखर गए, तो उनका वजूद कमजोर हो जाएगा।

दूसरी ओर, इस बयान के जरिए एनडीए यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि तमाम आंतरिक असहमतियों और अलग-अलग दलों के होने के बावजूद वे विपक्ष के खिलाफ एक मजबूत और अटूट दीवार बनकर खड़े हैं। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस तरह की बयानबाजी केवल एक शुरुआत है, और जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें नजदीक आएंगी, बिहार की राजनीति में बयानों के तीर और अधिक तीखे होते चले जाएंगे। जनता अब यह तय करेगी कि वह विकास के मुद्दों पर वोट करती है या फिर इन वैचारिक और राजनीतिक नारों के आधार पर अपना पालय तय करती है।