
बिहार की सियासत में एक बार फिर पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है और इसकी मुख्य वजह बना है बिहार विधान परिषद (MLC) का द्विवार्षिक चुनाव। राज्य की राजधानी पटना समेत विभिन्न स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए हो रहे इस चुनाव ने राजनीतिक सरगर्मी को पूरी तरह से गरमा दिया है। यूं तो विधान परिषद के इन चुनावों को अमूमन एक शांत और बौद्धिक वर्ग का चुनाव माना जाता था, लेकिन इस बार पटना की स्नातक और शिक्षक सीटों ने जो राजनीतिक रंग दिखाया है, उसने इसे सूबे का सबसे हाई-प्रोफाइल और 'हॉट सीट' मुकाबला बना दिया है। इस चुनाव के मैदान में सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष और नई ताकतों तक के बड़े दिग्गजों की साख सीधे तौर पर जुड़ गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक उत्तराधिकार और परिवार की सक्रिय एंट्री से लेकर बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले नेता व उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की रणनीति, आरजेडी के युवा चेहरे तेजस्वी यादव का चुनावी मैनेजमेंट और चुनावी रणनीतिकार से राजनीतिक दल बने प्रशांत किशोर (पीके) की साख तक—सब कुछ दांव पर लगा हुआ है। आइए विस्तार से जानते हैं कि पटना की इस हॉट सीट पर चल रहे सियासी घमासान के पीछे की असली कहानी क्या है और क्यों इस चुनाव को सभी दिग्गजों की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा माना जा रहा है।
पटना स्नातक और शिक्षक निर्वाचन सीटों पर क्यों मची है सियासी हलचल और क्या हैं समीकरण
बिहार विधान परिषद की इन सीटों पर होने वाले मतदान और प्रचार के बीच पटना का राजनीतिक समीकरण बेहद रोचक मोड़ पर आ गया है। पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र और पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र दोनों ही लंबे समय से राजनीतिक चर्चा के केंद्र रहे हैं, लेकिन इस बार का मुकाबला पारंपरिक समीकरणों से बिल्कुल अलग नजर आ रहा है। सत्ताधारी राष्ट्रीय जनता दल (NDA) की ओर से जहां एक तरफ अपनी जीत की साख बचाने की पूरी कोशिश की जा रही है, वहीं महागठबंधन और अन्य दलों ने भी इस किले को भेदने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। खासकर पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे पुराने और अनुभवी चेहरों के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर हो रही उठापटक ने मुकाबले को त्रिकोणीय और बेहद कड़ा बना दिया है। स्थानीय विधायक और क्षेत्र के बाहुबली तथा प्रभावी नेताओं की बयानबाजी ने इस चुनाव में तड़के का काम किया है, जिससे हर एक वोट की कीमत सोने के सिक्के जैसी हो गई है। यही वजह है कि राज्य के तमाम बड़े दल और उनके रणनीतिकार दिन-रात एक करके अपने-अपने पाले में वोटों को साधने की जुगत में लगे हुए हैं।
मुख्यमंत्री के बेटे निशांत कुमार की सक्रिय एंट्री से जेडीयू खेमे में बढ़ा उत्साह और नई सियासी चर्चाएं
इस पूरे विधान परिषद चुनाव में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला आकर्षण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार की राजनीतिक गलियारों में खुलकर हुई आक्रामक एंट्री रही है। अमूमन लाइमलाइट और प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति से दूर रहने वाले निशांत कुमार ने जिस प्रकार पटना और आसपास के इलाकों में अपने पिता की पार्टी के प्रत्याशियों के समर्थन में मोर्चा संभाला है, उसने राजनीतिक पंडितों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। नालंदा, पटना और मगध के इलाकों में उन्होंने जिस सक्रियता के साथ वोटरों से संपर्क साधा और पार्टी की कमान अपने हाथों में ली, उससे जेडीयू कार्यकर्ताओं का मनोबल सातवें आसमान पर है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव के जरिए पार्टी ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि आने वाले समय में युवा नेतृत्व किस तरह कमान संभालेगा। हालांकि, इस आक्रामक बैटिंग और दिलचस्पी का सीधा असर यह हुआ है कि इस चुनाव की जीत-हार का पूरा सेहरा और ठीकरा सीधे तौर पर निशांत कुमार के राजनीतिक कद से जोड़ा जाने लगा है, जिससे यह मुकाबला और अधिक दिलचस्प बन गया है।
सम्राट चौधरी और तेजस्वी यादव की प्रतिष्ठा के साथ-साथ प्रशांत किशोर की रणनीति की भी हो रही है परीक्षा
दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार और सरकार में अहम भूमिका निभा रहे उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए भी यह चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। शिक्षकों और स्नातकों के बीच अपनी पकड़ मजबूत रखने के लिए बीजेपी ने जो व्यूह रचना तैयार की है, उसकी सफलता-विफलता का सीधा असर उनकी सांगठनिक क्षमता पर पड़ेगा। इसके साथ ही, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और युवा नेता तेजस्वी यादव ने भी इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए मजबूत उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। विपक्षी दलों का यह प्रयास है कि वे स्नातक और शिक्षक मतदाताओं के असंतोष को भुनाकर सत्ता पक्ष को करारा झटका दें। इन सबके बीच, प्रशांत किशोर (पीके) की पार्टी और उनके द्वारा समर्थित उम्मीदवार भी इस चुनाव में अपनी जमीन तलाशने और अपनी राजनीतिक जमीन को धार देने के लिए पूरी ताकत से उतरे हुए हैं। यदि प्रशांत किशोर या उनके समर्थित उम्मीदवार इन सीटों पर कोई भी उलटफेर करने में कामयाब होते हैं, तो यह मुख्य दलों के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा। जैसे-जैसे मतदान का दिन नजदीक आ रहा है और प्रचार का शोर थमने की कगार पर है, पटना की यह हॉट सीट बिहार के भविष्य की राजनीतिक दिशा तय करने का एक बड़ा माध्यम बनती जा रही है।
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