
भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक रिश्तों के लिहाज से एक ऐतिहासिक मोड़ सामने आया है। भारत दौरे पर पहुंचे अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया है कि नई दिल्ली और वॉशिंगटन बहुप्रतीक्षित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (India-US Trade Agreement) को अंतिम रूप देने के 'बेहद करीब' पहुंच चुके हैं। रुबियो के अनुसार, दोनों देशों के वार्ताकारों ने ज्यादातर विवादित और जटिल मुद्दों को सुलझा लिया है और अब केवल कुछ सीमित तकनीकी पहलुओं को ही अंतिम रूप दिया जाना शेष है। इस बयान के बाद दोनों देशों के कारोबारी गलियारों और वैश्विक बाजारों में भारी उत्साह देखने को मिल रहा है, क्योंकि यह डील एशिया-प्रशांत और वैश्विक सप्लाई चेन के समीकरणों को नई दिशा दे सकती है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अपने आधिकारिक भारत दौरे के दौरान मुंबई में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से मुलाकात के साथ-साथ वरिष्ठ अधिकारियों से गहन चर्चा की है। उन्होंने कहा कि हालांकि व्यापार समझौतों की तकनीकी वार्ता सीधे तौर पर विदेश विभाग के दायरे में नहीं आती, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और वे खुद इस रणनीतिक डील की प्रगति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। रुबियो ने दो टूक शब्दों में कहा कि दोनों पक्ष उतने करीब पहुंच चुके हैं जितना किसी समझौते पर हस्ताक्षर होने से ठीक पहले हो सकते हैं, और उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही दोनों देश दुनिया के सामने इस बड़ी खुशखबरी की घोषणा कर इसे औपचारिक रूप से साइन करेंगे।
ट्रेड डील के इतने करीब पहुंचे दोनों देश: सिर्फ कुछ चुनिंदा मुद्दे बाकी
मार्को रुबियो ने व्यापार समझौते की वर्तमान स्थिति का ब्योरा देते हुए बताया कि दोनों देशों की टीमें पिछले कई महीनों से कानूनी ड्राफ्टिंग और क्लॉज-बाय-क्लॉज समीक्षा पर काम कर रही हैं। दोनों पक्षों का मुख्य उद्देश्य टैरिफ (आयात शुल्क) में पारस्परिक कटौती करना, रणनीतिक सामानों और सेवाओं के लिए बाजारों तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करना और गैर-टैरिफ बाधाओं को समाप्त करना है।
व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, समझौते का पहला चरण (First Tranche) लगभग तैयार हो चुका है। कुछ संवेदनशील क्षेत्रों, विशेषकर कृषि, डेयरी और चुनिंदा औद्योगिक उत्पादों पर दोनों देशों के घरेलू हितों को संतुलित करने के लिए अंतिम बातचीत चल रही है। रुबियो ने भरोसा जताया कि इन बचे हुए मुद्दों पर भी सहमति बन जाएगी, जिससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच वस्तुओं और सेवाओं के प्रवाह में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिलेगी।
'भूगोल एक हकीकत है': रूसी तेल और वैश्विक ऊर्जा संकट पर रुबियो का रुख
भारत के साथ ट्रेड डील की बात करते हुए मार्को रुबियो ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और भारत की ऊर्जा जरूरतों पर अमेरिकी प्रशासन का नजरिया भी साफ किया। उन्होंने कहा कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति राष्ट्रीय सुरक्षा छूट (National Security Waivers) या प्रतिबंधों से जुड़े नीतिगत फैसले लेते हैं, तो कई जटिल वैश्विक कारकों को ध्यान में रखा जाता है। रुबियो ने यथार्थवादी टिप्पणी करते हुए कहा कि 'भूगोल एक सच्चाई है' और दुनिया के कुछ देशों के लिए रातों-रात ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर होना संभव नहीं होता।
उन्होंने रेखांकित किया कि वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति, कीमतों में स्थिरता और पश्चिम एशिया (हॉर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर) में बढ़ते तनाव के बीच ऊर्जा प्रवाह को सुरक्षित रखना पहली प्राथमिकता है। अमेरिकी प्रशासन ने हाल ही में रूसी तेल खरीद पर प्रस्तावित भारी टैरिफ से जुड़े कदमों की समीक्षा के लिए समय लिया है, ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था और साझेदार देशों पर नकारात्मक असर न पड़े। रुबियो ने भारत को अमेरिका का अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी बताते हुए कहा कि भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने का प्रयास किया है और अमेरिका नई दिल्ली की चिंताओं को पूरी तरह समझता है।
भारत को बताया 'रिफाइनिंग सुपरपावर', जामनगर दौरे पर नजरें
अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत की रिफाइनिंग क्षमता की खुलकर सराहना करते हुए इसे 'रिफाइनिंग सुपरपावर' (Refining Superpower) करार दिया। भारत दौरे के तहत उनका गुजरात के जामनगर जाने का भी कार्यक्रम है, जहां दुनिया का सबसे बड़ा तेल रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स स्थित है। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल (Heavy Crude) और अन्य स्रोतों के प्रसंस्करण में भारतीय रिफाइनरियां एक अहम संतुलनकारी भूमिका निभा सकती हैं।
जामनगर में ऊर्जा बुनियादी ढांचे के अवलोकन और भारतीय ऊर्जा क्षेत्र के दिग्गजों के साथ होने वाली बैठकों से भारत और अमेरिका के बीच केवल पारंपरिक व्यापार ही नहीं, बल्कि पेट्रोकेमिकल्स, एलएनजी (LNG) और ग्रीन एनर्जी टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी बड़े दीर्घकालिक समझौतों की जमीन तैयार होगी।
द्विपक्षीय व्यापार में नया उछाल और भारतीय अर्थव्यवस्था को मिलने वाले फायदे
यदि भारत और अमेरिका के बीच यह व्यापार समझौता जल्द औपचारिक रूप ले लेता है, तो इसके भारतीय निर्यातकों, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और सेवा क्षेत्र के लिए व्यापक सकारात्मक परिणाम होंगे। वर्तमान में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। डील के जरिए भारतीय कपड़ा, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स, जेम्स एंड ज्वैलरी और आईटी सेवाओं को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी लाभ मिलने की उम्मीद है।
दूसरी ओर, अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत के तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजार, हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और ऊर्जा उपकरणों के निर्यात की राह और अधिक सुगम होगी। साथ ही, चीन पर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की अत्यधिक निर्भरता को कम करने (De-risking/China+1 Strategy) की दिशा में यह ट्रेड पैक्ट दोनों लोकतांत्रिक देशों को एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा घेरा प्रदान करेगा।
जल्द हो सकता है आधिकारिक हस्ताक्षर समारोह
राजनयिक सूत्रों के अनुसार, मार्को रुबियो और भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के बीच द्विपक्षीय बातचीत के दौरान रक्षा सहयोग, हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) की सुरक्षा स्थिति और व्यापार समझौते के अंतिम प्रारूप पर विस्तार से सहमति बन चुकी है। दोनों देशों के व्यापार मंत्रालयों द्वारा अंतिम कानूनी ड्राफ्ट को मंजूरी दिए जाने के बाद शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर इसकी औपचारिक घोषणा और हस्ताक्षर का कार्यक्रम तय किया जाएगा। रुबियो का यह आशावादी बयान स्पष्ट संकेत देता है कि दशकों से लंबित भारत-अमेरिका व्यापक व्यापार समझौता अब अपने निर्णायक मुकाम पर पहुंच चुका है।
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