News India Live, Digital Desk: भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी दोस्ती अब एक ऐसे नए युग में प्रवेश कर गई है, जिसने वैश्विक रणनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। दोनों देशों के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण रक्षा समझौते (Reciprocal Exchange of Logistics Agreement) पर सहमति बनी है। इस समझौते के तहत अब भारत और रूस की सेनाएं एक-दूसरे के सैन्य अड्डों, युद्धपोतों और विमानों के लिए रसद सुविधाओं का उपयोग कर सकेंगी। यह कदम न केवल रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता को बल देगा, बल्कि हिंद महासागर से लेकर आर्कटिक तक भारत की पहुंच को भी विस्तार देगा।रक्षा क्षेत्र में नई क्रांति: क्या है यह ‘लॉजिस्टिक’ समझौता?सरल शब्दों में कहें तो इस समझौते के बाद भारतीय नौसेना और वायुसेना को रूस के सैन्य ठन्डे और बंदरगाहों पर ईंधन भरने, मरम्मत करने और रसद (भोजन व अन्य सामग्री) जुटाने की सुविधा मिलेगी। यही सुविधा रूसी सेना को भारत में उपलब्ध होगी। जानकारों का मानना है कि यह समझौता अमेरिका के साथ किए गए ‘लेमोआ’ (LEMOA) समझौते की तर्ज पर है, जो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को और अधिक मजबूती प्रदान करता है।चीन और पाकिस्तान के लिए बड़ा कड़ा संदेशइस समझौते के दूरगामी परिणाम होने वाले हैं। उत्तर में रूस की मौजूदगी और दक्षिण में भारत की मजबूत स्थिति के बीच यह तालमेल सीधे तौर पर चीन की विस्तारवादी नीतियों पर लगाम लगाएगा। अब भारतीय युद्धपोत रूसी बंदरगाहों का उपयोग कर सकेंगे, जिससे आर्कटिक क्षेत्र और उत्तरी समुद्री मार्गों में भारत की उपस्थिति प्रभावी हो जाएगी। पाकिस्तान के लिए भी यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि रूस ने साफ कर दिया है कि भारत उसका सबसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार है।युद्ध की स्थिति में गेमचेंजर साबित होगा यह कदमविशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक युद्धों में केवल हथियारों की संख्या मायने नहीं रखती, बल्कि रसद और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) की सुगमता सबसे अहम होती है। इस समझौते से भारतीय सेना को दूरदराज के क्षेत्रों में लंबी अवधि तक तैनात रहने की क्षमता मिलेगी। यदि भविष्य में कोई सैन्य संकट पैदा होता है, तो भारत को रूस के विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ मिलेगा, जो सामरिक दृष्टि से भारत को अजेय बनाता है।दोस्ती की नई मिसाल और ग्लोबल पावर की ओर कदमप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच लगातार बढ़ते संवाद का ही परिणाम है कि दोनों देश जटिल वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद एक-दूसरे के करीब आए हैं। यह डील दर्शाती है कि भारत किसी एक गुट पर निर्भर रहने के बजाय अपनी जरूरतों के हिसाब से रणनीतिक साझेदारी करने में सक्षम है। यह समझौता ‘मेक इन इंडिया’ और रक्षा निर्यात के लक्ष्यों को हासिल करने में भी मददगार साबित होगा।
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