
देश में आम जनता को महंगाई के मोर्चे पर एक बार फिर तगड़ा झटका लगा है। मई महीने के थोक महंगाई के आंकड़े जारी हो गए हैं, जिसने सरकार और आम आदमी दोनों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ईंधन, बिजली और खाद्य उत्पादों की कीमतों में लगातार हो रहे इजाफे के कारण मई में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई दर बढ़कर 9.68 प्रतिशत पर पहुंच गई है। यह उछाल पिछले कुछ महीनों के मुकाबले काफी बड़ा माना जा रहा है, जिससे बाजार विशेषज्ञों के बीच आगामी दिनों में खुदरा बाजार पर पड़ने वाले असर को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
खाद्य और ईंधन की कीमतों ने बिगाड़ा रसोई का बजट इस बार थोक महंगाई दर में आए इस बड़े उछाल की मुख्य वजह प्राथमिक वस्तुओं, विशेषकर खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में हुई भारी बढ़ोतरी को माना जा रहा है। मई के दौरान आलू, प्याज और हरी सब्जियों के दाम थोक बाजार में तेजी से बढ़े हैं। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उतार-चढ़ाव का सीधा असर घरेलू स्तर पर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दामों पर देखने को मिला है। इन आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के कारण सीधे तौर पर परिवहन लागत बढ़ी है, जिसका चौतरफा असर अन्य दैनिक उपभोग की चीजों पर भी पड़ रहा है।
विनिर्मित उत्पादों की बढ़ती लागत ने बढ़ाई विनिर्माताओं की चिंता थोक बाजार में केवल खाने-पीने की चीजें ही नहीं, बल्कि विनिर्मित उत्पाद (Manufactured Products) भी महंगे हुए हैं। बुनियादी धातुओं, रसायनों, कपड़ों और अन्य औद्योगिक कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की लागत में इजाफा दर्ज किया गया है। जानकारों का कहना है कि जब थोक स्तर पर कंपनियों के लिए उत्पादन लागत बढ़ती है, तो वे इसका बोझ अंततः खुदरा उपभोक्ताओं पर ही डालती हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में आम उपभोक्ताओं को खुदरा बाजार में भी विभिन्न उत्पादों के लिए जेब ढीली करनी पड़ सकती है।
आरबीआई की मौद्रिक नीति और ब्याज दरों पर क्या होगा असर थोक महंगाई दर के इस स्तर पर पहुंचने के बाद अब सभी की नजरें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अगले कदमों पर टिक गई हैं। लगातार बढ़ती महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक पर नीतिगत ब्याज दरों (रेपो रेट) को लेकर दबाव बढ़ सकता है। यदि महंगाई का यह रुख आने वाले समय में भी बरकरार रहता है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती के फैसले को टाल सकता है, या फिर बाजार में तरलता को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठा सकता है। इसका सीधा असर आम आदमी के होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई पर भी पड़ सकता है।
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