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महिलाएं बाहर निकलीं तो होगी तबाही’: मौलाना रशीदी के विवादित बयान पर भड़कीं प्रियंका चतुर्वेदी

देश की राजनीति और सामाजिक गलियारों से इस वक्त एक बहुत बड़ा और तीखा विवाद सामने आ रहा है, जिसने महिलाओं की स्वतंत्रता, अधिकारों और रूढ़िवादी सोच को लेकर एक बार फिर राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ दी है। हाल ही में एक धार्मिक और राजनीतिक मंच से महिलाओं को लेकर बेहद आपत्तिजनक और भड़काऊ टिप्पणी की गई थी, जिसमें कहा गया था कि यदि औरतें अपने घरों से बाहर निकलती हैं तो भारी तबाही मच सकती है। इस बेहद संकुचित और पितृसत्तात्मक बयान का समर्थन जब मौलाना रशीदी द्वारा किया गया, तो देश भर के प्रगतिशील और राजनीतिक हलकों में भूचाल आ गया। इस बयान के खिलाफ शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की प्रखर सांसद और तेज-तर्रार नेत्री प्रियंका चतुर्वेदी ने बेहद कड़े शब्दों में मोर्चा खोलते हुए करारा पलटवार किया है। प्रियंका चतुर्वेदी ने दो टूक शब्दों में कहा कि इस तरह की घटिया और दबी हुई मानसिकता वाली सोच रखने वाले लोग महिलाओं की तरक्की से डरते हैं और देश की आधी आबादी को उनके हक से वंचित रखना चाहते हैं। इस तीखी बयानबाजी के बाद से सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट्स तक हर तरफ इसी बात की चर्चा हो रही है कि आखिर आज के आधुनिक भारत में भी महिलाओं की स्वतंत्रता पर इस तरह की बयानबाजी क्यों की जा रही है। आइए इस पूरे विवाद, मौलाना रशीदी के समर्थन और प्रियंका चतुर्वेदी के तीखे हमलों को विस्तार से समझते हैं।

महिलाओं की स्वतंत्रता पर विवादित बयान और रूढ़िवादी मानसिकता का पर्दाफाश

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब सार्वजनिक मंच से यह बयान दिया गया कि महिलाओं का घरों से बाहर निकलकर काम करना या सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होना समाज के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है और इससे बड़ी तबाही आ सकती है। इस तरह की सोच न केवल भारतीय संविधान में निहित लैंगिक समानता (Gender Equality) के सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि यह उन करोड़ों महिलाओं के संघर्ष का भी अपमान है जो अपनी मेहनत, प्रतिभा और शिक्षा के दम पर देश का नाम रोशन कर रही हैं। जब इस तरह के बयान को धार्मिक या वैचारिक आड़ में सही ठहराने की कोशिश की जाती है, तो समाज की प्रगति पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लग जाता है। महिलाओं ने अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर खेलकूद, सेना, राजनीति, प्रशासन और कॉर्पोरेट जगत तक हर क्षेत्र में अपनी लोहा मनवाया है। ऐसे में यह सवाल बार-बार उठता है कि आखिर कुछ तथाकथित धार्मिक और वैचारिक ठेकेदार महिलाओं की आजादी और उनकी आत्मनिर्भरता से क्यों डरते हैं। इस प्रकार की मानसिकता यह दर्शाती है कि समाज के एक हिस्से में आज भी पितृसत्तात्मक और सामंती सोच गहराई तक घर किए हुए है, जिसे बदलने के लिए लगातार वैचारिक और सामाजिक संघर्ष की आवश्यकता है।

मौलाना रशीदी का विवादित समर्थन और समाज में बढ़ती चिंताएं

इस पूरे मामले को तब और अधिक हवा मिली जब मौलाना रशीदी ने इस बयान का खुलकर समर्थन किया और इसके पक्ष में अपनी दलीलें रखनी शुरू कर दीं। मौलानाओं और धार्मिक गुरुओं द्वारा इस प्रकार के बयान दिए जाने से समाज में गलत संदेश जाता है और रूढ़िवादी ताकतों को बढ़ावा मिलता है। आलोचकों का कहना है कि धर्म की आड़ में महिलाओं के मौलिक अधिकारों को दबाने का यह प्रयास किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। जब धार्मिक हस्तियां आधुनिकता और महिला सशक्तिकरण के खिलाफ जाकर ऐसी बातें कहती हैं, तो इससे समाज में दूरियां बढ़ती हैं और लैंगिक न्याय की लड़ाई कमजोर होती है। जनता और बुद्धिजीवियों के बीच इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि आखिर क्यों कुछ लोग अपनी संकीर्ण मानसिकता को पूरे समाज पर थोपना चाहते हैं। इस समर्थन के बाद से देश भर के महिला संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस बयान की कड़ी निंदा की है और मांग की है कि महिलाओं के खिलाफ इस तरह की अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने वालों पर कानूनी और सामाजिक कार्रवाई होनी चाहिए।

प्रियंका चतुर्वेदी का आक्रामक पलटवार और नारी शक्ति का समर्थन

मौलाना रशीदी और इस विवादित बयान के पैरोकारों को आड़े हाथों लेते हुए सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने जिस आक्रामक और बेबाक अंदाज में पलटवार किया, उसने हर किसी का ध्यान खींच लिया है। प्रियंका चतुर्वेदी ने दो टूक शब्दों में कहा कि आज का भारत बदल चुका है और देश की बेटियां व महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति पूरी तरह जागरूक हैं। उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि तबाही महिलाओं के बाहर निकलने से नहीं, बल्कि उन लोगों की सड़ी-गली और ओछी मानसिकता से होती है जो महिलाओं को चार दीवारों के भीतर कैद रखना चाहते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश की अर्थव्यवस्था और विकास में महिलाओं का योगदान रीढ़ की हड्डी की तरह है, और यदि किसी को उनकी सफलता से परेशानी है तो यह उनकी अपनी मानसिक कमजोरी को दर्शाता है। प्रियंका चतुर्वेदी के इस मुखर और सशक्त विरोध के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें भारी समर्थन मिल रहा है, और देश भर के लोग उनके इस बयान को महिलाओं के सम्मान के पक्ष में एक मजबूत आवाज मान रहे हैं। यह घटना एक बार फिर यह साबित करती है कि भारतीय राजनीति में जब भी महिलाओं के अधिकारों पर हमला होगा, तब मुखर नेता आगे आकर इसका डटकर मुकाबला करेंगे।