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मां-बाप ने बचपन में बेच दी थी आपके नाम की जमीन? 18 के होते ही वापस ले सकते हैं अपना हक़, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

प्रॉपर्टी और जमीन-जायदाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है,जिसके बारे में हर किसी को,खासकर युवाओं को जरूर पता होना चाहिए। इस फैसले ने उन बच्चों को एक बड़ी ताकत दी है,जिनकी प्रॉपर्टी उनके नाबालिग रहते हुए उनके माता-पिता या अभिभावक ने बेच दी थी।क्या है सुप्रीम कोर्ट का यह बड़ा फैसला?आसान भाषा में समझें तो,अगर आप नाबालिग थे और आपके माता-पिता या किसी रिश्तेदार ने आपके नाम की कोई जमीन,मकान या दुकान बेच दी थी,तो18साल के होते ही आपके पास उस सौदे को चुनौती देने और उसे रद्द करवाने का पूरा अधिकार है।कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि इसके लिए आपको हमेशा कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने की ज़रूरत नहीं है। आप बालिग (18साल के) होने के बाद खुद ही कोई ऐसा कदम उठा सकते हैं,जिससे यह साफ हो जाए कि आप उस पुराने सौदे को नहीं मानते।एक पुराने विवाद से समझिए पूरी कहानीयह मामला कर्नाटक के एक गांव का है। बात1971की है,जब रुद्रप्पा नाम के एक शख्स ने अपने तीन नाबालिग बेटों के नाम पर दो प्लॉट खरीदे थे। कुछ समय बाद,उन्होंने बिना कोर्ट की इजाज़त लिए वह दोनों प्लॉट किसी और को बेच दिए।जब तीनों बेटे बड़े हुए और18साल के हो गए,तो उन्होंने उसी जमीन को एक दूसरे व्यक्ति के. एस. शिवप्पा को बेच दिया। बस यहीं से विवाद शुरू हो गया। जिस व्यक्ति ने पिता से जमीन खरीदी थी,उसने अपना दावा ठोका और बेटों से खरीदने वाले ने अपना। मामला अदालत में पहुंच गया।सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?इसी मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा:बालिग होते ही चुनौती दे सकते हैं:कोई भी व्यक्ति18साल की उम्र पूरी करने के बाद अपने अभिभावक द्वारा बचपन में बेची गई संपत्ति के सौदे को चुनौती दे सकता है।हमेशा मुकदमा जरूरी नहीं:कोर्ट ने सबसे बड़ी बात यह कही कि इस सौदे को रद्द कराने के लिए हर बार मुकदमा करना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। अगर बालिग होने के बाद वह व्यक्ति उस प्रॉपर्टी पर अपना हक़ जताने के लिए कोई ठोस कदम उठाता है (जैसे कि उसे खुद किसी और को बेच देना),तो यह भी पुराने सौदे को नकारने के लिए काफी माना जाएगा।कोर्ट ने माना कि कई बार तो बच्चे को पता ही नहीं होता कि उसके नाम की कोई संपत्ति बेच दी गई है। ऐसे में उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह बालिग होते ही सीधा कोर्ट का दरवाजा खटखटाए।यह फैसला उन लाखों लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण है,जिनकी संपत्ति से जुड़ा कोई फैसला उनके बचपन में उनकी मर्जी के बिना ले लिया गया था।