
स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर देश की राजधानी दिल्ली स्थित ऐतिहासिक लाल किले पर आयोजित मुख्य राष्ट्रीय समारोह एक बार फिर राजनीतिक बयानबाजी और तकरार का बड़ा अखाड़ा बन गया है। इस साल के स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन को सुनने के लिए और देश के इस सबसे बड़े पर्व में शामिल होने के लिए विपक्ष के शीर्ष नेता यानी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे एक बार फिर अपनी तय सीटों से नदारद दिखे। इसके तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने आक्रामक रुख अपनाते हुए इस गैर-मौजूदगी को सीधा-सीधा देश के लोकतंत्र, राष्ट्रीय पर्व और शहीदों के सम्मान के प्रति अनादर करार दिया है। राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि आखिर क्यों कांग्रेस के दिग्गज नेता लगातार ऐसे राष्ट्रीय आयोजनों से दूरी बना रहे हैं, जिसके बाद पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग अपने चरम पर पहुंच गई है।
लाल किले के समारोह में क्यों नहीं पहुंचे राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे?
स्वतंत्रता दिवस का यह राष्ट्रीय पर्व देश के हर नागरिक के लिए गर्व का दिन होता है, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं के शामिल होने की एक स्थापित परंपरा रही है। हालांकि, पिछले कुछ सालों से यह देखने को मिला है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इस तरह के सरकारी और राष्ट्रीय आयोजनों से एक प्रकार की दूरी बना ली है। आधिकारिक सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के इस तरह से लाल किले के मुख्य मंच से गायब रहने के पीछे अलग-अलग कारण बताए जा रहे हैं। विपक्षी सूत्रों का दावा है कि उन्हें पिछले कुछ आयोजनों में बैठने के लिए जो सीटें आवंटित की जाती रही हैं, वे प्रोटोकॉल के हिसाब से काफी पीछे होती हैं, जिसे लेकर वे कई बार अपनी नाराजगी जता चुके हैं। इसके अलावा, राजनीतिक व्यस्तताओं और अन्य स्थानीय कार्यक्रमों का हवाला देकर भी इन बड़े नेताओं का इस समारोह में न पहुंचना अब एक निरंतर प्रवृत्ति बनता जा रहा है, जिसपर राजनीतिक विश्लेषक गहरी चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
बीजेपी का तीखा हमला: राष्ट्रीय पर्व का बहिष्कार देश और संविधान का अपमान
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के लाल किले के समारोह में शामिल न होने पर भारतीय जनता पार्टी ने बेहद कड़े शब्दों में हमला बोला है। बीजेपी के तमाम वरिष्ठ प्रवक्ताओं और नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कांग्रेस पार्टी पर करारा प्रहार किया है। सत्तारूढ़ दल का कहना है कि स्वतंत्रता दिवस किसी राजनीतिक पार्टी या सरकार का कार्यक्रम नहीं होता है, बल्कि यह 140 करोड़ देशवासियों का पावन राष्ट्रीय उत्सव है, जिसमें देश की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले अमर सेनानियों को याद किया जाता है। बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेता व्यक्तिगत अहंकार और राजनीतिक द्वेष के चलते देश के प्रधानमंत्री और लोकतांत्रिक संस्थाओं का विरोध करते-करते अब देश के राष्ट्रीय पर्वों का ही बहिष्कार करने लगे हैं। भाजपा ने इसे सीधे तौर पर देश की महान परंपराओं, लोकतंत्र और संविधान निर्माताओं का अपमान बताया है और जनता से कांग्रेस के इस रवैये पर सवाल पूछने की अपील की है।
कांग्रेस पार्टी और विपक्ष का पलटवार: प्रोटोकॉल की अनदेखी और जनता के मुद्दों पर जोर
बीजेपी के इन तीखे हमलों का जवाब देते हुए कांग्रेस पार्टी ने भी पलटवार करने में कोई देर नहीं लगाई। कांग्रेस के मीडिया विभाग और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने स्पष्ट किया है कि उनकी अनुपस्थिति को किसी भी रूप में राष्ट्र विरोधी या देश का अपमान नहीं कहा जाना चाहिए। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि सरकार जानबूझकर मुख्य विपक्षी दलों के नेताओं को अपमानित करने के लिए बैठने की व्यवस्था और प्रोटोकॉल में हेरफेर करती है। पार्टी का कहना है कि जब सरकार विपक्ष की आवाज को संसद के भीतर दबाने का प्रयास करती है और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा से भागती है, तो ऐसे प्रतीकात्मक आयोजनों में शामिल होने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। कांग्रेस ने यह भी कहा कि उनके नेता देश के प्रति अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए किसी सरकारी मंच के मोहताज नहीं हैं, और वे जनता के बीच रहकर स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, जो असली लोकतंत्र की खूबी है।
राजनीतिक संस्कृति और राष्ट्रीय पर्वों का भविष्य: क्या हो रहा है पतन?
इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति की एक बेहद निराशाजनक तस्वीर देश के सामने ला दी है, जहां अब राष्ट्रीय पर्व और स्वतंत्रता दिवस जैसे पवित्र अवसर भी राजनीतिक खींचतान और श्रेय लेने की होड़ का शिकार बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों को ही इस बात को समझना होगा कि देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े आयोजनों को राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए। यदि देश के सर्वोच्च नेता और विपक्षी दिग्गज इस तरह से एक मंच पर आने से कतराएंगे, तो इससे आम जनता के बीच गलत संदेश जाता है और राजनीतिक कटुता और अधिक बढ़ती है। आने वाले समय में इस बात की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है कि राजनीतिक दल अपने वैचारिक मतभेदों और राजनीतिक दूरियों को किनारे रखकर कम से कम राष्ट्रीय पर्वों की गरिमा और मर्यादा को बनाए रखने के लिए एक स्वस्थ राजनीतिक परंपरा की शुरुआत करें।
UK News