
अमेरिका और इजरायल के साथ जारी भीषण संघर्ष के बीच ईरान अपने सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा के जरिए दुनिया के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है। एक ऐतिहासिक और चौंकाने वाले फैसले के तहत खामेनेई के पार्थिव शरीर को पड़ोसी देश इराक की सरजमीं पर भी ले जाया जाएगा। यह वही इराक है जो एक समय ईरान का सबसे कट्टर दुश्मन था और दोनों देशों के बीच 8 सालों तक खूनी जंग चली थी। अब हर किसी के जेहन में यही सवाल है कि आखिर खामेनेई के शव को इराक के नजफ और कर्बला ले जाने के पीछे का धार्मिक और रणनीतिक कारण क्या है।
युद्ध के बाद सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब: दरगाह की तरह सजा ताबूत
गौरतलब है कि अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनके परिवार के सदस्य बीते 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की तरफ से शुरू हुए युद्ध के दौरान मारे गए थे। सुरक्षा कारणों और भीषण गोलाबारी के चलते उनकी बॉडी को तब से बेहद सुरक्षित रखा गया था। अब युद्ध का दौर थोड़ा थमने पर उनकी अंतिम यात्रा आधिकारिक तौर पर निकाली जा रही है। उनके ताबूत को एक विशाल और खुले ट्रक पर रखा गया है, जिसे किसी पवित्र दरगाह की तरह बेहद भव्य रूप से सजाया गया है। इस अंतिम विदाई का गवाह बनने के लिए पूरे ईरान की सड़कों पर लाखों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा है, जहां चारों तरफ सिर्फ ईरानी झंडे और मातम मनाते लोग दिखाई दे रहे हैं।
तेहरान से कर्बला तक 7 दिनों का रूट: मशहद में सुपुर्द-ए-खाक
सर्वोच्च नेता की यह अंतिम यात्रा 3 जुलाई से शुरू होकर 9 जुलाई तक चलेगी। सबसे पहले तेहरान के ग्रैंड मुसल्ला में आम जनता के दर्शन के लिए पार्थिव शरीर को रखा गया, जिसके बाद करीब 10 किलोमीटर लंबा विशाल जुलूस निकाला गया। इसके बाद शव को कोम शहर ले जाया जाएगा जहां विशेष धार्मिक रस्में पूरी की जाएंगी। कोम से इस यात्रा को इराक के शिया समुदाय के सबसे पवित्र स्थलों नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा, जो दोनों देशों के बीच बदलते समीकरणों को भी दर्शाता है। इराक से लौटने के बाद अंतिम दिन खामेनेई को उनके जन्मस्थान मशहद में सुपुर्द-ए-खाक (दफनाया) किया जाएगा।
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