
हमारी धरती के सबसे बड़े समंदर, प्रशांत महासागर की गहराइयों में एक ऐसा अदृश्य खतरा पनप रहा है, जो पूरी दुनिया के मौसम को पूरी तरह तहस-नहस कर सकता है। इंडोनेशिया के पास समंदर के नीचे शुरू हुआ गर्म पानी का एक विशालकाय बहाव अब भूमध्य रेखा के साथ-साथ तेजी से पूर्व की ओर बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, गर्मी का यह धीमा उभार करीब 14,500 किलोमीटर के दायरे में फैल चुका है। चौंकाने वाली बात यह है कि समंदर की सतह पर तैर रहे जहाजों को इसकी भनक तक नहीं लगी, लेकिन धरती से 1,300 किलोमीटर ऊपर चक्कर लगा रहे नासा के सैटेलाइट ने इस हलचल को पकड़ लिया है। इस बीच अमेरिकी मौसम एजेंसी 'नोआ' (NOAA) ने भी आधिकारिक तौर पर 'एल नीनो' की वापसी का एलान कर दिया है, जिसके इस सर्दी तक बेहद आक्रामक और विनाशकारी 'सुपर एल नीनो' में बदलने की 63% आशंका है।
अंतरिक्ष से कैसे खुला समंदर की 'केल्विन वेव' का राज?
आमतौर पर प्रशांत महासागर में चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को इंडोनेशिया की तरफ धकेलती हैं। लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ती हैं, तो पश्चिम में जमा गर्म पानी का विशाल हिस्सा वापस पूर्व की ओर खिसकने लगता है। समंदर के नीचे चलने वाली इसी सैकड़ों किलोमीटर चौड़ी और धीमी लहर को वैज्ञानिक भाषा में 'केल्विन वेव' कहा जाता है। नासा और यूरोपीय सहयोगियों के 'सेंटीनल-6' सैटेलाइट ने इस लहर को ट्रैक किया है। सैटेलाइट के डेटा से पता चला है कि इस गर्म पानी के गुजरने की वजह से पेरू के पास समंदर की सतह चुपचाप करीब 15 सेंटीमीटर ऊपर उठ गई है, जिसने अब एल नीनो को पूरी तरह ट्रिगर कर दिया है।
भारत के लिए क्यों खड़ी हो सकती है बड़ी मुसीबत?
मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस बार प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य औसत से 2°C ज्यादा दर्ज किया जा सकता है। इतिहास गवाह है कि जब भी ऐसा हुआ है (जैसे 1997 और 2015 में), तब दुनिया को विनाशकारी 'सुपर एल नीनो' का दंश झेलना पड़ा है। भारत के लिए यह खबर किसी बड़े झटके से कम नहीं है, क्योंकि एक मजबूत एल नीनो का सीधा और घातक असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है। इससे देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ने या सामान्य से बेहद कम बारिश होने का खतरा मंडराने लगा है। हालांकि, वैज्ञानिक उम्मीद जता रहे हैं कि 'इंडियन ओशन डाइपोल' (IOD) जैसी समुद्री स्थितियां इस खतरे के असर को थोड़ा कम कर सकती हैं।
UK News
