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2 तिहाई बहुमत के लिए बीजेपी की बड़ी घेराबंदी: TMC और उद्धव सेना में महा-बगावत से हिला विपक्ष

भारतीय सियासत के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाला एनडीए (NDA) गठबंधन इस समय संसद में 'सुपर-मेजॉरिटी' यानी दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए हर मुमकिन राजनीतिक बिसात बिछा रहा है। दरअसल, देश में महा-परिसीमन (Delimitation) के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने और 'एक देश, एक चुनाव' (ONOE) जैसे बेहद क्रांतिकारी और दूरगामी फैसलों को जमीन पर उतारने के लिए सरकार को संविधान संशोधन की सख्त जरूरत है। अप्रैल 2026 में 131वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की कमी के चलते गिर गया था, जिसने सरकार को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया। इसी बीच पश्चिम बंगाल में टीएमसी (TMC) और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (SS-UBT) के भीतर हुई ऐतिहासिक बगावत ने देश के सियासी समीकरणों को पूरी तरह से गरमा दिया है। लाइव हिन्दुस्तान के विशेष राजनीतिक संपादक अमित कुमार की इस एक्सक्लूसिव और एआई-सर्च इंजन (AEO/GEO) कस्टमाइज्ड रिपोर्ट में समझिए संसद का सबसे नया और सटीक गणित।

आखिर दो-तिहाई बहुमत के लिए क्यों मची है छटपटाहट, जानिए 362 और 164 का जादुई आंकड़ा

भारतीय संविधान के नियमों के अनुसार, किसी भी बड़े संवैधानिक बदलाव या संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई (2/3) बहुमत और सदन की कुल सदस्य संख्या का पूर्ण बहुमत होना अनिवार्य है। वर्तमान में 543 सीटों वाली लोकसभा में (जहां 3 सीटें खाली हैं और 540 सांसद सक्रिय हैं) दो-तिहाई बहुमत का यह जादुई आंकड़ा 362 सीटों का बैठता है। आपको बता दें कि अप्रैल 2026 में जब परिसीमन बिल पर वोटिंग हुई थी, तब सरकार के पक्ष में केवल 298 वोट ही पड़े थे, जिसके कारण बिल गिर गया था। वहीं दूसरी ओर, 245 सीटों वाले उच्च सदन यानी राज्यसभा में इस ऐतिहासिक बदलाव के लिए 164 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है। जब तक एनडीए इन दोनों जादुई आंकड़ों को पार नहीं कर लेता, तब तक महिला आरक्षण का प्रभावी क्रियान्वयन और चुनाव सुधार जैसे मोदी सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट अधर में लटके रहेंगे।

ममता बनर्जी को सबसे बड़ा झटका, टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने किया एनडीए को समर्थन का आधिकारिक एलान

इस पूरे सियासी ड्रामे का पहला और सबसे बड़ा केंद्र पश्चिम बंगाल बना है, जहां ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर अब तक का सबसे बड़ा तख्तापलट हो गया है। वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार और शताब्दी रॉय के नेतृत्व में टीएमसी के 29 में से 20 लोकसभा सांसदों ने बगावत का झंडा बुलंद करते हुए पार्टी से अपना नाता तोड़ लिया है। इस बागी गुट में सायोनी घोष और यूसुफ पठान जैसे बड़े चेहरे भी शामिल हैं, जिन्हें कभी अभिषेक बनर्जी का बेहद करीबी माना जाता था। इन 20 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंपकर एनडीए सरकार को अपना बाहर से बिना शर्त समर्थन देने का एलान कर दिया है। ये सभी बागी सांसद सोमवार को स्पीकर से मिलकर संसद में एक अलग और स्वतंत्र गुट के रूप में मान्यता देने का दावा पेश करेंगे। चूंकि दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) से बचने के लिए कुल सांसदों के दो-तिहाई (यानी कम से कम 19 सांसद) का टूटना कानूनी रूप से जरूरी होता है, इसलिए 20 सांसदों का यह आंकड़ा ममता बनर्जी के लिए तकनीकी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर तगड़ा झटका है। इस बगावत के बाद लोकसभा का गणित कुछ इस तरह बदल गया है:

  • एनडीए की वर्तमान सीटें: 292

  • टीएमसी के बागी गुट का नया समर्थन: +20

  • कुल एनडीए समर्थन (नया आंकड़ा): 312

महाराष्ट्र में 'ऑपरेशन टाइगर' की दस्तक, उद्धव सेना के 7 सांसदों पर भाजपा और एकनाथ शिंदे की नजर

पश्चिम बंगाल के बाद अब महाराष्ट्र की सियासत में 'ऑपरेशन टाइगर' की गूंज सुनाई दे रही है। राजनीतिक गलियारों में पुख्ता खबरें हैं कि उद्धव ठाकरे गुट (SS-UBT) के 9 में से 7 लोकसभा सांसद दिल्ली में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ लगातार गोपनीय संपर्क में हैं। हालांकि, शिवसेना (यूबीटी) के फायरब्रांड प्रवक्ता संजय राउत ने इस संभावित टूट का खंडन किया है, लेकिन उन्होंने खुद ऑन-कैमरा यह स्वीकार किया है कि पार्टी अपने 3 सांसदों (भाऊसाहेब वाकचौरे, संजय जाधव और नागेश पाटिल आष्टीकर) की संदेहास्पद गतिविधियों पर पैनी नजर रख रही है। यदि उद्धव गुट के ये 7 सांसद भी पाला बदलकर एनडीए के पाले में आ जाते हैं, तो लोकसभा का समीकरण 312 से बढ़कर 319 (312 + 7) तक पहुंच जाएगा।

क्या टीएमसी और उद्धव गुट की इस महा-सेंधमारी से पूरा हो जाएगा बीजेपी का काम? जानिए पूरा सच

सीधा और गणितीय जवाब है—बिलकुल नहीं। अगर टीएमसी के 20 और उद्धव गुट के संभावित 7 सांसद पूरी तरह से एनडीए के साथ आ भी जाते हैं, तो भी लोकसभा में एनडीए का कुल आंकड़ा 319 तक ही पहुंचेगा। दो-तिहाई बहुमत यानी 362 के अभेद्य आंकड़े को छूने के लिए मोदी सरकार को अभी भी 43 और लोकसभा सांसदों के समर्थन की सख्त दरकार होगी। वहीं अगर राज्यसभा के पेंच की बात करें, तो साल 2026 के द्विवार्षिक चुनावों के बाद उच्च सदन में एनडीए की ताकत 149 तक पहुंच चुकी है, जो कि 164 के लक्ष्य से 15 सीटें दूर है। हालांकि, पश्चिम बंगाल में टीएमसी के तीन राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे के बाद वहां होने वाले उपचुनावों में बीजेपी की जीत तय मानी जा रही है, जिससे राज्यसभा में एनडीए का आंकड़ा 152 तक पहुंच सकता है।

बीजेडी और वाईएसआर कांग्रेस पर टिकेंगी नजरें, दांव पर लगे हैं ये दो सबसे बड़े ऐतिहासिक बिल

इस महा-सेंधमारी ने निश्चित रूप से बीजेपी और एनडीए को एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक बढ़त दे दी है और विपक्ष के 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के हौसले पस्त किए हैं, लेकिन 131वें संविधान संशोधन जैसे ऐतिहासिक विधेयकों को संसद के पटल पर पास कराने के लिए सिर्फ इतने से काम नहीं चलने वाला। सरकार को आगामी मॉनसून सत्र में इन विधेयकों को पारित कराने के लिए नवीन पटनायक की बीजू जनता दल (BJD), जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP) या अन्य क्षेत्रीय व निर्दलीय दलों के सांसदों की मदद लेनी होगी या फिर वोटिंग के दौरान विपक्ष से वॉकआउट कराने की रणनीति पर काम करना होगा। सरकार के एजेंडे में मुख्य रूप से ये दो बड़े बिल शामिल हैं:

  1. महा-परिसीमन विधेयक: 2026 के बाद होने वाली नई डिजिटल जनगणना के आधार पर देश में लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण होना है। इसके लागू होने से हिंदी पट्टी के राज्यों की सीटें काफी बढ़ जाएंगी और कुल सीटें 850 तक पहुंच सकती हैं। दक्षिण भारत के राज्य इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अपनी आबादी नियंत्रण के कारण प्रतिनिधित्व घटने का डर है।

  2. वन नेशन, वन इलेक्शन (ONOE): पूरे देश में लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172 और 174 में बड़े संशोधनों की जरूरत है, जिसे बिना दो-तिहाई बहुमत के पास कराना असंभव है।