
किसी भी अचानक आई मुसीबत या आपातकालीन स्थिति में लोग तुरंत मदद के लिए अपने फोन से इमरजेंसी नंबर घुमाते हैं। लेकिन भारत में अब तक सबसे बड़ी दिक्कत यह रही है कि अलग-अलग राज्यों में और अलग-अलग सेवाओं (जैसे पुलिस, फायर ब्रिगेड, एम्बुलेंस) के लिए अलग-अलग नंबर डायल करने पड़ते हैं। संकट के समय घबराहट में कई बार सही नंबर याद नहीं आता, जिससे सही समय पर मदद मिलने में देरी हो जाती है। लेकिन आने वाले दिनों में देश के नागरिकों को इस परेशानी से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण आदेश देते हुए पूरे देश में सिर्फ एक एकीकृत इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर '112' को पूरी तरह प्रभावी बनाने का निर्देश दिया है। इन सभी पुराने नंबरों की जगह लेगा सिर्फ '112' वर्तमान में देश के विभिन्न हिस्सों में आपातकालीन मदद के लिए कई तरह के हेल्पलाइन नंबर काम कर रहे हैं। नए आदेश के बाद इन सभी नंबरों को धीरे-धीरे आपस में मर्ज (एकीकृत) कर दिया जाएगा, ताकि देश का कोई भी नागरिक कहीं से भी सिर्फ 112 डायल करके हर तरह की आपातकालीन सहायता पा सके: 100 (पुलिस सहायता) 101 (फायर ब्रिगेड) 102 और 108 (स्वास्थ्य/एम्बुलेंस सेवाएं) 1033 (नेशनल हाईवे इमरजेंसी) 1091 (महिला हेल्पलाइन) 'सेव लाइफ फाउंडेशन' की याचिका पर आया ऐतिहासिक फैसला सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक आदेश 'सेव लाइफ फाउंडेशन' द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को सख्त लहजे में निर्देश दिया है कि वे अगले तीन महीने के भीतर इस '112' हेल्पलाइन सेवा को अपने यहां पूरी तरह से चालू करें। इसके साथ ही एक प्रभावी ‘गुड समैरिटन’ (मददगारों की सुरक्षा) शिकायत निवारण प्रणाली भी स्थापित की जाए। जीने के अधिकार का हिस्सा है तुरंत इलाज: अदालत ने सुनवाई के दौरान बेहद संवेदनशील टिप्पणी करते हुए कहा कि नागरिकों का समय पर इलाज (ट्रॉमा केयर) पाने का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले 'जीने के अधिकार' का एक अभिन्न हिस्सा है। राज्य सरकारें इस व्यवस्था को लेकर कितनी गंभीर हैं, इसकी जांच के लिए उन्हें नियमित रूप से अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी, मासिक बैठकें करनी होंगी और इसकी कार्यवाही को सरकारी पोर्टल पर अपलोड करना होगा। "हादसे के समय तेजी ही असली जीवनरक्षक दवा है" अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि जब कोई व्यक्ति सड़क दुर्घटना या किसी अन्य हादसे का शिकार होता है, तो वह पूरी तरह सदमे और भ्रम की स्थिति में होता है। ऐसे में बिना किसी देरी के शुरुआती कुछ मिनटों (गोल्डन ऑवर) में मिलने वाली डॉक्टरी मदद ही उसकी जान बचा सकती है। कोर्ट ने कहा, "ऐसी नाजुक स्थिति में बिना इलाज के बीता हर एक मिनट इंसान के जीवित रहने की संभावना को कम कर देता है। इसलिए आपातकालीन सेवाओं में तेजी लाना ही असल में जीवनरक्षक दवा की तरह काम करता है।" मददगारों के मन से दूर होगा कानूनी प्रक्रियाओं का डर अक्सर देखा जाता है कि सड़क पर किसी घायल को देखकर भी कई राहगीर कानूनी प्रक्रियाओं, पुलिस थाने के चक्कर काटने और कोर्ट में गवाही देने के डर से मदद करने के लिए आगे नहीं आते। जजों की पीठ ने कहा कि इस डर और मानसिक दबाव को दूर करने के लिए आम जनता में जागरूकता बढ़ाना, प्राथमिक उपचार के कौशल को बढ़ावा देना और एक मजबूत 'गुड समैरिटन' कानून को जमीन पर लागू करना बेहद जरूरी है। हाई-टेक होगा 112 नंबर: GPS और लोकेशन ट्रैकिंग से लैस होंगी एम्बुलेंस सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी व्यवस्था को आधुनिक और पारदर्शी बनाने के लिए तकनीकी बदलावों के भी आदेश दिए हैं: ऑटोमोटिव इंडस्ट्री मानक-125 (AIS-125): देश के सभी राज्यों को अपनी सभी सरकारी और निजी एम्बुलेंस गाड़ियों को इस विशेष मानक के अनुरूप अपग्रेड करना होगा। रीयल-टाइम ट्रैकिंग: सभी एम्बुलेंस में अनिवार्य रूप से जीपीएस (GPS) और वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) लगाना होगा, जो सीधे हेल्पलाइन 112 के कंट्रोल रूम से रीयल-टाइम में जुड़े रहेंगे। इससे कंट्रोल रूम को तुरंत पता चल सकेगा कि हादसे की जगह के सबसे करीब कौन सी एम्बुलेंस मौजूद है। समय-समय पर ऑडिट: एम्बुलेंस के पहुंचने के समय (Response Time), इलाज की गुणवत्ता और उपकरणों की स्थिति की समय-समय पर जांच की जाएगी और इसकी रिपोर्ट एक केंद्रीय अथॉरिटी को भेजी जाएगी।
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