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कचरा नहीं, भविष्य की ‘क्लीन एनर्जी’ है गीला वेस्ट; अगले 20 साल में खड़ा होगा 5.1 लाख करोड़ रुपये का बड़ा बाजार

भारत को साल 2047 तक एक पूरी तरह विकसित देश (Viksit Bharat) बनाने के संकल्प में हमारे घरों, सब्जी मंडियों और बागवानी से निकलने वाला गीला कचरा (Organic Waste) एक बहुत बड़ी भूमिका निभाने जा रहा है। जिसे हम अक्सर बेकार समझकर डस्टबिन में डाल देते हैं, वह आने वाले समय में हमारी अर्थव्यवस्था का एक मजबूत आधार बनने वाला है। थिंक-टैंक 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर' (CEEW) की एक ताजा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यदि देश में सही नीतियों और 'ग्रीन ट्रांजिशन' मॉडल को अपनाया जाए, तो अगले 20 वर्षों के भीतर गीले कचरे के प्रबंधन (Wet Waste Management) का बाजार करीब 5.1 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा। यह न केवल हमारी अर्थव्यवस्था को एक नई रफ्तार देगा, बल्कि देश के बड़े शहरों की शक्ल बदलने की भी ताकत रखता है। समस्या से समाधान की ओर: अभी क्या है स्थिति? वर्तमान में भारत के शहरों से रोजाना जितना भी ठोस कचरा (Solid Waste) निकलता है, उसका लगभग आधा हिस्सा अकेले गीला कचरा (किचन का सामान, सड़ी-गली सब्जियां और पेड़-पौधों के अवशेष) होता है। इतनी बड़ी मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद हम अभी तक इसके सही इस्तेमाल में काफी पीछे हैं। मौजूदा तकनीकों और भविष्य के बदलावों को नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझा जा सकता है: अगर हम देश के इस वेस्ट मैनेजमेंट मॉडल को तेजी से ऑटोमेटेड बायोमेथनेशन की तरफ ले जाते हैं, तो इससे खेतों में रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers) पर हमारी निर्भरता बहुत कम हो जाएगी। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG) का उत्पादन होगा, जो विदेशों से महंगे ईंधन और गैस आयात करने के भारत के भारी-भरकम बिल को काफी हद तक कम कर देगा। दिल्ली के लिए क्यों वरदान है यह नई तकनीक? देश की राजधानी दिल्ली इस समय गाजीपुर, भलस्वा और ओखला में खड़े कचरे के विशाल पहाड़ों और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी से जूझ रही है। ऐसे में यह ग्रीन मॉडल दिल्ली के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। इन डंपिंग यार्ड्स में कचरे के सड़ने से भारी मात्रा में मीथेन गैस निकलती है, जो स्थानीय स्तर पर तापमान को बढ़ाकर 'थर्मल हॉट स्पॉट' पैदा करती है। इसी वजह से दिल्ली में जानलेवा लू (Heatwave) का प्रकोप हर साल बढ़ता जा रहा है। इस कचरे को प्रोसेस करने से मीथेन को सीधे क्लीन एनर्जी में बदला जा सकेगा, जिससे दिल्ली सचिवालय द्वारा शुरू की गई 'हीटवेव वैन' जैसी पहलों को भी जमीनी स्तर पर मजबूती मिलेगी। 'जीरो वेस्ट' की ओर बढ़ते कदम दिल्ली का 'मास्टर प्लान 2041' पहले से ही शहर को पूरी तरह 'जीरो वेस्ट' (Zero Waste) बनाने और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने की बात करता है। इस रिपोर्ट के सुझावों के अनुसार, दिल्ली के नरेला जैसे नए अर्बन क्लस्टर्स और डीडीए (DDA) के ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) प्रोजेक्ट्स में ऑन-साइट (यानी सोसायटी या कमर्शियल हब के भीतर ही) छोटे बायोगैस प्लांट लगाए जा सकते हैं। इससे वहां का कचरा बाहर जाने के बजाय सीधे वहीं पर बिजली और गैस में बदला जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP Model), ग्रीन बॉन्ड्स के जरिए निवेश और नगर निगमों द्वारा घरों से ही सूखा और गीला कचरा अलग-अलग करने (Source Segregation) के नियमों को कड़ाई से लागू करके हम दिल्ली समेत पूरे देश को न केवल कचरा-मुक्त बना सकते हैं, बल्कि इस वेस्ट से बेस्ट वेल्थ भी जनरेट कर सकते हैं।