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यूपी में सारस का अनोखा ट्रेंड! मुरादाबाद-बिजनौर बने इस राजकीय पक्षी के सबसे पसंदीदा ठिकाने

उत्तर प्रदेश के पर्यावरण, वन्यजीव और वन विभाग के गलियारों से इस वक्त पक्षी प्रेमियों को हैरान करने वाली एक बेहद दिलचस्प और कूटनीतिक रिपोर्ट सामने आई है। उत्तर प्रदेश का राजकीय पक्षी 'सारस' (Sarus Crane) अपनी अनूठी जीवनशैली और वफादारी के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। ताजा वन्यजीव गणना और वन विभाग की कड़े कूटनीतिक सर्वे में यह साफ हुआ है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद और बिजनौर जिले इन दिनों सारस पक्षियों की सबसे पसंदीदा पनाहगाह (ठिकाना) बनकर उभरे हैं। इन दोनों जिलों के वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) में सारस की संख्या में भारी इजाफा दर्ज किया गया है। लेकिन इसी रिपोर्ट का एक दूसरा और बेहद चिंताजनक पहलू भी सामने आया है, जिसने पर्यावरणविदों को गहरे तनाव में डाल दिया है। मुरादाबाद और बिजनौर के पड़ोसी जिले अमरोहा में पिछले चार सालों से सारस का एक भी जोड़ा दिखाई नहीं दिया है, जिससे वन विभाग के दावों पर कड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। मुरादाबाद और बिजनौर के प्राकृतिक वातावरण ने सारस को किया सबसे ज्यादा आकर्षित वन विभाग की कूटनीतिक रिपोर्ट के मुताबिक, मुरादाबाद और बिजनौर जिलों में बहने वाली नदियों के किनारे, दलदली इलाके और विशाल धान के खेत सारस पक्षियों के अनुकूल पाए गए हैं। बिजनौर में गंगा नदी के खादर क्षेत्र और मुरादाबाद के ग्रामीण इलाकों के जलाशयों में इन पक्षियों को लगातार समूह में देखा जा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों और किसानों का पक्षियों के प्रति बढ़ता कूटनीतिक लगाव और संरक्षण के प्रयासों ने इस क्रेडिबिलिटी को और मजबूत किया है। सारस को फलने-फूलने के लिए शांत और सुरक्षित वातावरण की जरूरत होती है, जो उन्हें इन दोनों जिलों के प्राकृतिक परिवेश में भरपूर मिल रहा है, जिसके चलते यहां उनकी ब्रीडिंग (प्रजनन) भी बेहद सफल रही है। अमरोहा में पिछले 4 सालों से सारस का 'सन्नाटा', आखिर क्यों रूठ गए पक्षी एक तरफ जहां मुरादाबाद-बिजनौर में सारस की चहचहाहट गूंज रही है, वहीं अमरोहा जिले का वन्यजीव रिकॉर्ड इस मामले में पूरी तरह खाली नजर आ रहा है। वन विभाग के कड़े कूटनीतिक आंकड़ों के अनुसार, अमरोहा के जंगलों और ग्रामीण तालाबों में पिछले लगातार चार वर्षों से सारस का कोई जोड़ा या घोंसला नहीं देखा गया है। पर्यावरणविदों का मानना है कि अमरोहा में तेजी से घटते प्राकृतिक वेटलैंड्स, जलाशयों पर अवैध कब्जे, खेती में अत्यधिक कीटनाशकों (पेस्टिसाइड्स) का इस्तेमाल और मोबाइल टावरों के रेडिएशन के कारण सारस पक्षियों ने इस जिले से पूरी तरह दूरी बना ली है। सारस हमेशा जोड़े में रहते हैं और एक बार अपनी जगह बदलने के बाद वे वहां कूटनीतिक रूप से दोबारा आसानी से वापस नहीं लौटते। सारस पक्षी की वफादारी और कूटनीतिक महत्व की अनोखी है दास्तान हिंदू संस्कृति और लोककथाओं में सारस को प्रेम, समर्पण और अटूट वफादारी का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। यह पक्षी पूरी जिंदगी सिर्फ एक ही साथी के साथ बिताता है। यदि किसी कारणवश जोड़े में से एक की मौत हो जाए, तो दूसरा पक्षी भी उसके वियोग में तड़प-तड़प कर अपनी जान दे देता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसी क्रेडिबिलिटी और इसकी घटती संख्या को देखते हुए इसे सूबे का राजकीय पक्षी घोषित किया था। दलदली जमीनों को साफ रखने और इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) का संतुलन बनाए रखने में इन भारी-भरकम पक्षियों की कूटनीतिक भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। वन विभाग अलर्ट, अमरोहा में सारस की वापसी के लिए तैयार हो रहा स्पेशल रोडमैप पड़ोसी जिलों में सारस की बंपर मौजूदगी और अमरोहा से उनके पूरी तरह लापता होने के इस कड़े विरोधाभास को देखते हुए उत्तर प्रदेश वन विभाग अब पूरी तरह से अलर्ट मोड पर आ गया है। मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के कूटनीतिक निर्देशों के तहत अमरोहा के पुराने जलस्रोतों और तालाबों को दोबारा जीवित करने (काली नदी के किनारों के पुनरुद्धार) की योजना बनाई जा रही है। इसके साथ ही, किसानों को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाने का फैसला लिया गया है ताकि वे खेतों में जहरीले रसायनों का उपयोग कम करें। प्रशासन को पूरी उम्मीद है कि कड़े संरक्षण उपायों के लागू होने के बाद आने वाले सालों में अमरोहाकी वादियों में भी सारस के जोड़ों की दोबारा कूटनीतिक वापसी संभव हो सकेगी।