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ट्रंप और मोदी की ‘अगल-बगल’ वाली सीट का क्या है सीक्रेट, कैसे तय होता है कूटनीति का सिटिंग प्लान

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों के मंच 'जी7 शिखर सम्मेलन' (G7 Summit) से आई एक ताजा तस्वीर इस समय सोशल मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों तक खूब सुर्खियां बटोर रही है। इस तस्वीर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बिल्कुल अगल-बगल बैठे हुए बेहद गर्मजोशी से चर्चा करते नजर आ रहे हैं। इस हाई-प्रोफाइल बैठक के वीडियो सामने आने के बाद आम लोगों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वैश्विक नेताओं के बैठने की यह जगह महज एक इत्तेफाक होती है या इसके पीछे कोई गहरा कूटनीतिक गणित छिपा होता है। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में नेताओं के बैठने की व्यवस्था (Seating Arrangement) के पीछे बेहद कड़े प्रोटोकॉल, इतिहास और मेजबान देश की रणनीतियों का एक जटिल ताना-बाना काम करता है।

वर्णमाला का नियम या खास कूटनीतिक इशारा

वैश्विक मंचों पर नेताओं के बैठने का सबसे आम और निष्पक्ष तरीका अंग्रेजी वर्णमाला का क्रम (Alphabetical Order) होता है। इसके तहत देशों के आधिकारिक नामों के पहले अक्षर (जैसे कनाडॉ का C, फ्रांस का F, इंडिया का I) के आधार पर कुर्सियां लगाई जाती हैं ताकि किसी भी देश को छोटा या बड़ा दिखाने का विवाद ही पैदा न हो। हालांकि, जी7 जैसे विशेष और सीमित सदस्यों वाले सम्मेलनों में कई बार मेजबान देश (Host Country) कूटनीतिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर इस व्यवस्था में आंशिक बदलाव भी करता है। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप का एक साथ बैठना इस बात का भी संकेत देता है कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत और अमेरिका के रणनीतिक संबंध कितने मजबूत और महत्वपूर्ण हो चुके हैं।

मेजबान देश और 'आउटरीच' मेहमानों का विशेष प्रोटोकॉल

जी7 के सिटिंग अरेंजमेंट में एक और बेहद महत्वपूर्ण भूमिका 'मेजबान देश के प्रमुख' की होती है, जो मुख्य टेबल के केंद्र (Center) में बैठता है। चूंकि भारत जी7 का स्थायी सदस्य नहीं है बल्कि इसे एक विशेष 'आउटरीच देश' (Outreach Nation) के तौर पर आमंत्रित किया जाता है, इसलिए मुख्य सदस्यों और अतिथि देशों के बैठने के लिए प्रोटोकॉल टीम महीनों पहले से काम करती है। इसमें इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि जो देश वैश्विक भू-राजनीति या आर्थिक मोर्चे पर सबसे बड़ी भूमिका निभा रहे हैं, उन्हें मुख्य टेबल पर खास जगह मिले। ट्रंप और मोदी की यह नजदीकी न सिर्फ दोनों नेताओं के व्यक्तिगत तालमेल को दर्शाती है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते कद पर भी मुहर लगाती है।

एक गलत सीट और खड़ा हो सकता है बड़ा अंतरराष्ट्रीय विवाद

आपको जानकर हैरानी होगी कि इन सम्मेलनों में सिर्फ कुर्सी ही नहीं, बल्कि कैमरों का एंगल और नेताओं के चलने का क्रम भी पहले से फिक्स होता है। कूटनीति की भाषा में 'प्रोटोकॉल विभाग' का यह काम बेहद संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि बैठने की व्यवस्था में जरा सी चूक या किसी नेता को अनजाने में पीछे या दूर बैठा देना एक बड़ा कूटनीतिक अपमान (Diplomatic Affront) माना जा सकता है। इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब सिटिंग अरेंजमेंट को लेकर देशों के बीच तनाव पैदा हो गया था। यही वजह है कि जी7 की शेरपा बैठक (Sherpa Meeting) में ही इन बारीकियों को अंतिम रूप दे दिया जाता है, ताकि जब मोदी और ट्रंप जैसे दुनिया के कद्दावर नेता एक साथ बैठें, तो दुनिया को सिर्फ दोस्ती और सहयोग का मजबूत संदेश जाए।