
अयोध्या में भव्य और दिव्य राम मंदिर के निर्माण और रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अब मंदिर के दीर्घकालिक प्रबंधन और सुरक्षा को लेकर एक बड़ी मांग उठने लगी है। देश के वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों और विचारकों का मानना है कि अयोध्या राम मंदिर की व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे में ठीक वैसा ही कदम उठाया जाना चाहिए, जैसा उत्तर प्रदेश सरकार ने आज से करीब 44 साल पहले वाराणसी के ऐतिहासिक काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए उठाया था। दरअसल, साल 1983 में काशी विश्वनाथ मंदिर में हुई एक सनसनीखेज चोरी ने तत्कालीन सरकार को एक ऐसा कड़ा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया था, जिसने हमेशा के लिए वहां का पूरा सिस्टम बदल दिया।
क्या था 44 साल पुराना वाकया जिसने हिला दी थी सरकार?
यह बात साल 1983 की है, जब वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर से भगवान शिव का बेहद कीमती और ऐतिहासिक छत्र चोरी हो गया था। इस घटना के बाद पूरे देश के शिव भक्तों में भारी आक्रोश फैल गया और तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार पूरी तरह हिल गई थी। उस समय तक मंदिर का प्रबंधन स्थानीय मठाधीशों और पुजारियों के एक निजी ट्रस्ट के हाथों में था। इस बड़ी सुरक्षा चूक और अव्यवस्था को देखते हुए यूपी सरकार ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाने का फैसला किया।
जब यूपी सरकार ने कानून बनाकर अपने हाथ में लिया था काशी का नियंत्रण
चोरी की घटना के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 'काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम, 1983' (Kashi Vishwanath Temple Act) लागू किया। इस कानून के तहत सरकार ने मंदिर का पूरा प्रबंधन, सुरक्षा और वित्तीय व्यवस्था अपने नियंत्रण में ले ली। इसके लिए एक आधिकारिक बोर्ड का गठन किया गया, जिसकी कमान कमिश्नर और जिलाधिकारी जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को सौंपी गई। सरकार के इस फैसले का उस समय काफी विरोध भी हुआ, लेकिन बाद में देश की सर्वोच्च अदालत ने भी सरकार के इस कानून को पूरी तरह सही ठहराया। इसी सरकारी नियंत्रण का नतीजा है कि आज काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और वहां की सुरक्षा व्यवस्था पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुकी है।
अयोध्या राम मंदिर में 'काशी फॉर्मूला' लागू करने की क्यों हो रही है मांग?
वर्तमान में अयोध्या राम मंदिर का संचालन 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' द्वारा किया जा रहा है। हालांकि, राम मंदिर में हर दिन उमड़ रही लाखों श्रद्धालुओं की भारी भीड़, वैश्विक स्तर पर इसकी संवेदनशीलता और सुरक्षा खतरों को देखते हुए विशेषज्ञों का तर्क है कि इसे भी काशी विश्वनाथ मंदिर की तर्ज पर एक विशेष राज्य अधिनियम (State Act) के दायरे में लाया जाना चाहिए। जानकारों का कहना है कि एक पूर्ण वैधानिक बोर्ड (Statutory Board) बनने से मंदिर की सुरक्षा, चढ़ावे का पारदर्शी ऑडिट और वीआईपी मैनेजमेंट सीधे सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों की निगरानी में आ जाएगा, जिससे भविष्य में किसी भी प्रकार की चूक या विवाद की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
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