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एफआईपिक बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने समझाई प्रधानमंत्री मोदी की विजन रणनीति

भारतीय कूटनीति के मोर्चे पर पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसा अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिला है जिसने दुनिया भर के छोटे और विकासशील देशों का ध्यान भारत की ओर खींचा है। विशेष रूप से प्रशांत महासागर में फैले छोटे-छोटे द्वीप राष्ट्रों के साथ भारत के रिश्ते अब एक नई और मजबूत ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं। हाल ही में आयोजित फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन (FIPIC) के विदेश मंत्रियों की उच्च-स्तरीय बैठक के दौरान देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पूरी दुनिया के सामने यह स्पष्ट किया कि भारत किस प्रकार इन दूरदराज के द्वीपीय देशों के विकास, आपदा प्रबंधन और उनकी संप्रभुता की रक्षा में लगातार एक भरोसेमंद साझीदार की भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना को आगे बढ़ाते हुए भारत ने इन देशों के साथ अपने संबंधों को एक नई दिशा दी है। आइए इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक बैठक, प्रशांत क्षेत्र में भारत की सहायता नीति और इसके भू-राजनीतिक निहितार्थों की पूरी और गहरी समीक्षा करते हैं।

प्रशांत द्वीप समूह के देशों के लिए भारत की बढ़ती प्रतिबद्धता और एफआईपिक मंच

प्रशांत महासागर के ये छोटे द्वीप राष्ट्र भौगोलिक रूप से भले ही क्षेत्रफल में छोटे हों, लेकिन वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर इनका सामरिक महत्व बहुत अधिक है। लंबे समय तक इन क्षेत्रों को वैश्विक महाशक्तियों द्वारा नजरअंदाज किया जाता रहा था, लेकिन जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'ग्लोबल साउथ' (Global South) की आवाज को बुलंद करने की कमान संभाली है, तब से भारत ने इन देशों के साथ सीधे संवाद के द्वार खोले हैं। FIPIC यानी फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन का यह मंच इसी दिशा में एक ऐतिहासिक पहल साबित हुआ है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बैठक के दौरान इस बात पर जोर दिया कि भारत केवल वादे करने में विश्वास नहीं रखता, बल्कि जमीन पर उतरकर इन देशों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए ठोस और पारदर्शी परियोजनाएं चला रहा है, जिससे वहां के आम नागरिकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आ रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और 'सागर' अवधारणा का असर

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने संबोधन के दौरान विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दूरदर्शी दृष्टिकोण का जिक्र किया जिसके तहत भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में 'सागर' (SAGAR – Security and Growth for All in the Region) की नीति पर काम कर रहा है। प्रशांत द्वीप देशों को जब भी स्वास्थ्य संकट, प्राकृतिक आपदा या आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा है, भारत ने एक सच्चे और विश्वसनीय मित्र की तरह सबसे पहले आगे बढ़कर मदद का हाथ बढ़ाया है। चाहे कोविड-19 महामारी के दौरान जीवनरक्षक दवाइयां और वैक्सीन उपलब्ध कराने की बात हो, या फिर चक्रवातों और सुनामी जैसी आपदाओं के समय त्वरित राहत सामग्री पहुंचाने का काम हो, भारत ने हमेशा इन राष्ट्रों की प्राथमिकताओं को सर्वोपरि रखा है। पीएम मोदी के इसी व्यक्तिगत जुड़ाव और कूटनीतिक इच्छाशक्ति के कारण आज प्रशांत महासागर के ये देश भारत को एक सच्चे और निस्वार्थ मित्र के रूप में देखते हैं।

जलवायु परिवर्तन और सतत विकास के मोर्चे पर भारत का साझा सहयोग

इन द्वीपीय देशों के सामने आज के समय में यदि कोई सबसे बड़ा और अस्तित्वगत संकट है, तो वह ग्लोबल वार्मिंग और समुद्र के जलस्तर का लगातार बढ़ना है। जलवायु परिवर्तन के कारण इन छोटे देशों के डूबने का खतरा मंडरा रहा है, और वे लंबे समय से विकसित देशों से न्याय की गुहार लगा रहे थे। FIPIC की इस बैठक में एस जयशंकर ने यह स्पष्ट किया कि भारत इन देशों के साथ मिलकर नवीकरणीय ऊर्जा, सोलर प्रोजेक्ट्स, पर्यावरण अनुकूल बुनियादी ढांचे और आपदा-रोधी तकनीकों के विकास में पूरी मदद कर रहा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के जरिए इन देशों में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कई वित्तीय और तकनीकी सहायता पैकेज प्रदान किए हैं। इससे न केवल उनकी ऊर्जा जरूरतें पूरी हो रही हैं, बल्कि वे पर्यावरण संकट से निपटने के लिए अधिक सक्षम भी बन रहे हैं।

वैश्विक भू-राजनीति और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत का बढ़ता रणनीतिक कद

आज के दौर में जब हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र दुनिया की महाशक्तियों के बीच कूटनीतिक और सामरिक अखाड़ा बनता जा रहा है, तब भारत की यह समावेशी और विकास-केंद्रित नीति इस क्षेत्र में एक संतुलन स्थापित करने का काम कर रही है। चीन जैसी विस्तारवादी ताकतों द्वारा इन छोटे देशों को कर्ज के जाल में फंसाने की रणनीतियों के विपरीत, भारत की यह साझेदारी पूरी तरह से संप्रभुता के सम्मान, आपसी पारदर्शिता और जन-कल्याण पर आधारित है। FIPIC विदेश मंत्रियों की बैठक में एस जयशंकर के इस बेबाक और स्पष्ट संदेश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत केवल अपनी सीमाओं तक सीमित रहने वाली महाशक्ति नहीं है, बल्कि वह पूरी दुनिया के साथ मिलकर साझा समृद्धि और वैश्विक शांति का मार्ग प्रशस्त करने वाला एक जिम्मेदार राष्ट्र है। आने वाले समय में भारत और प्रशांत द्वीप समूहों के यह मजबूत होते रिश्ते वैश्विक कूटनीति का एक नया और स्वर्णिम अध्याय लिखने वाले हैं।