
News India Live, Digital Desk : बिहार की राजनीति (Bihar Politics) भी कमाल की है, यहां कब कौन किसके गले मिल जाए और कब कौन किसके गले की फांस बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। ताजा मामला आरजेडी (RJD) के भीतर का है, जहां जुबानी जंग अब सड़क पर आ गई है। लालू परिवार के बेहद करीबी माने जाने वाले एमएलसी सुनील सिंह (Sunil Singh) ने अपनी ही पार्टी के दिग्गज और बुजुर्ग नेता शिवानंद तिवारी (Shivanand Tiwari) पर ऐसा हमला बोला है कि सुनने वाले हैरान रह गए हैं।मसला तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) को लेकर दी गई एक सलाह का है, जो सुनील सिंह को इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने शिवानंद तिवारी को ‘बिना मांगी सलाह देने वाला बाबा’ तक कह डाला। आइए, आसान शब्दों में समझते हैं कि आखिर आरजेडी के आंगन में ये कौन सा नया ‘बखेड़ा’ खड़ा हो गया है।1. “सलाह मांगी किसने थी आपसे?”बात तब बिगड़ी जब आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने तेजस्वी यादव को लेकर कोई टिप्पणी की या सलाह दी। बस फिर क्या था, सुनील सिंह, जो अक्सर अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं, आगबबूला हो गए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पार्टी में कुछ लोग ऐसे हैं जो खुद को ‘बाबा’ समझते हैं और बिना किसी के पूछे, झोला उठाकर सलाह देने चले आते हैं। उनका इशारा साफ था—कि तेजस्वी यादव को क्या करना चाहिए, ये बताने की जरूरत शिवानंद तिवारी को नहीं है।2. ‘मौकापरस्त’ कहकर पुराने जख्म कुरेद दिएसुनील सिंह यहीं नहीं रुके। उन्होंने बातों-बातों में शिवानंद तिवारी को ‘मौकापरस्त’ (Opportunist) तक कह दिया। उनका कहना था कि कुछ नेता ऐसे होते हैं जो सत्ता और फायदे की दिशा देखकर हवा की तरह अपना रुख बदल लेते हैं। “कभी इस डाल, कभी उस डाल”—सुनील सिंह का इशारा शायद शिवानंद तिवारी के पुराने राजनीतिक सफर की तरफ था, जब वे आरजेडी और जेडीयू (JDU) के बीच आते-जाते रहे हैं।3. “मलाई खाने आ जाते हैं…”बिहार की देसी राजनीति में “मलाई खाना” एक बड़ा मुहावरा है। सुनील सिंह ने आरोप लगाया कि जब संघर्ष का समय आता है, तब ऐसे नेता कहीं नजर नहीं आते, लेकिन जैसे ही सत्ता की सुख-सुविधा मिलने की बारी आती है, ये सबसे आगे लाइन में खड़े हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे ‘बाबाओं’ की वजह से ही पार्टी कन्फ्यूज होती है।4. तेजस्वी के ‘आसपास’ की घेराबंदी?राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह लड़ाई सिर्फ एक बयान की नहीं है। यह पार्टी के अंदर चल रही उस खींचतान का नतीजा है कि ‘तेजस्वी के कान’ किसके पास रहें। सुनील सिंह, जो खुद को लालू परिवार का वफादार सिपाही मानते हैं, उन्हें शायद यह पसंद नहीं आ रहा कि कोई और तेजस्वी यादव का ‘गाइड’ या सलाहकार बनने की कोशिश करे।5. अब आगे क्या होगा?फिलहाल तो शिवानंद तिवारी की तरफ से कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन आरजेडी जैसी पार्टी में, जहां लालू प्रसाद यादव की मर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलता, वहां दो नेताओं का ऐसे आपस में भिड़ना एक बड़ी खबर है। विपक्षी पार्टी बीजेपी और जेडीयू अब मजे ले रहे हैं कि “जब अपने ही घर में आग लगी हो, तो दूसरों से क्या लड़ेंगे?”
UK News
