
जब भी कोई व्यक्ति होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन के लिए आवेदन करता है, तो उसके मन में सबसे पहली बात क्रेडिट स्कोर (CIBIL Score) की आती है। अधिकतर लोगों को लगता है कि यदि उनका सिबिल स्कोर 750 या 800 से ऊपर है, तो बैंक आंख मूंदकर लोन मंजूर कर देगा। असल में यह आधी सच्चाई है। आधुनिक बैंकिंग में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सख्त दिशा-निर्देशों और उन्नत रिस्क-अंडरराइटिंग एल्गोरिदम के चलते बैंक किसी भी ग्राहक की प्रोफाइल को 360 डिग्री नजरिए से परखते हैं।
कर्ज देने से पहले बैंक यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनका पैसा सुरक्षित रहे और भविष्य में खाता नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) में न बदले। इसके लिए बैंक ग्राहक के वित्तीय इतिहास, खर्च करने की आदतों और रोजगार की स्थिरता पर बाज जैसी पैनी नजर रखते हैं। यदि आप भी लोन के लिए आवेदन करने जा रहे हैं, तो उन 7 प्रमुख पैमानों को समझ लें, जो तय करते हैं कि आपका लोन अप्रूव होगा, उस पर ब्याज दर कितनी लगेगी या आवेदन तुरंत खारिज कर दिया जाएगा।
1. सिबिल स्कोर और रीपेमेंट हिस्ट्री: क्या आपने कभी किस्त चुकाने में की है देरी?
लोन वेरिफिकेशन की पहली सीढ़ी क्रेडिट स्कोर ही है, लेकिन बैंक केवल तीन अंकों के स्कोर (जैसे 750 या 800) को देखकर संतुष्ट नहीं होते। वे पूरी क्रेडिट इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (CIR) को स्कैन करते हैं। इस रिपोर्ट में देखा जाता है कि पिछले 24 से 36 महीनों में आपकी रीपेमेंट हिस्ट्री (पुनर्भुगतान का रिकॉर्ड) कैसी रही है।
यदि किसी ग्राहक ने दो साल पहले भी क्रेडिट कार्ड के बिल या किसी छोटी ईएमआई में 30 से 90 दिनों की देरी (DPD – Days Past Due) की होगी, तो बैंक का सिस्टम उसे 'अस्थिर व्यवहार' के तौर पर चिह्नित करता है। भले ही वर्तमान स्कोर ठीक दिख रहा हो, लेकिन देरी से भुगतान का पुराना इतिहास ब्याज दर को महंगा कर सकता है या सीधे आवेदन रद्द करा सकता है।
2. डेट-टू-इनकम रेशियो (FOIR): कमाई का कितना हिस्सा पहले से जा रहा किस्तों में?
बैंक यह कतई नहीं देखते कि आप हर महीने कितना कमाते हैं, बल्कि वे यह देखते हैं कि खर्चों और मौजूदा कर्जों के बाद आपके हाथ में कितना बचता है। इसे बैंकिंग भाषा में 'फिक्स्ड ऑब्लिगेशन टू इनकम रेशियो' (FOIR) या 'डेट-टू-इनकम' (DTI) रेशियो कहा जाता है।
आमतौर पर बैंक चाहते हैं कि आपकी कुल मासिक शुद्ध आय (Net Monthly Income) का 40% से 50% से अधिक हिस्सा मौजूदा ईएमआई में न जा रहा हो। यदि किसी की इन-हैंड सैलरी ₹1 लाख है और वह पहले से ही ₹55,000 की अलग-अलग किस्तों (कार लोन, पर्सनल लोन) का भुगतान कर रहा है, तो बैंक नया लोन देने से साफ इनकार कर देगा। भले ही सिबिल स्कोर 800 क्यों न हो, उच्च डीटीआई यह संकेत देता है कि नए लोन की ईएमआई आने पर ग्राहक डिफॉल्ट कर सकता है।
3. नौकरी और आय की निरंतरता: कंपनी की साख और कार्य अनुभव
बैंकों के लिए लोन की सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार ग्राहक की स्थिर आय होती है। इसलिए बैंक इस बात की गहरी पड़ताल करते हैं कि आप कहां काम करते हैं और कितने समय से उस पेशे में हैं। अधिकांश बैंक 'कैट-ए' (Tier-1 MNCs, सरकारी विभाग या बड़े कॉरपोरेट) कंपनियों के कर्मचारियों को कम ब्याज दर पर तुरंत लोन देते हैं, क्योंकि वहां नौकरी जाने का जोखिम कम होता है।
इसके अलावा, कार्य अनुभव भी मायने रखता है। यदि कोई वेतनभोगी व्यक्ति हर 6-8 महीने में नौकरी बदल रहा है या वर्तमान कंपनी में प्रोबेशन पीरियड पर है, तो बैंक सतर्क हो जाते हैं। सामान्यतः वर्तमान नौकरी में कम से कम 6 महीने से 1 साल और कुल कार्य अनुभव 2 से 3 साल होना अनिवार्य माना जाता है। वहीं स्वरोजगार (Self-Employed) प्रोफेशनल्स के मामले में पिछले 3 वर्षों के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) और व्यवसाय की निरंतरता को बारीकी से परखा जाता है।
4. बैंक स्टेटमेंट की फोरेंसिक जांच: बाउंस चार्ज, न्यूनतम बैलेंस और गैंबलिंग स्पेंड्स
लोन आवेदन के साथ जमा किए जाने वाले पिछले 6 महीने के बैंक स्टेटमेंट की जांच अब स्वचालित वित्तीय सॉफ्टवेयर से की जाती है। बैंक स्टेटमेंट केवल वेतन की पुष्टि के लिए नहीं होता, बल्कि यह ग्राहक के वित्तीय अनुशासन का आईना होता है।
बैंक स्टेटमेंट में सबसे पहले 'ईसीएस/ईएमआई बाउंस' (ECS Bounces) देखे जाते हैं। यदि खाते में पर्याप्त बैलेंस न होने के कारण कोई चेक या ऑटो-डेबिट कटा है, तो यह खतरे की घंटी मानी जाती है। इसके अलावा खाते में एवरेज मंथली बैलेंस (AMB) का स्तर, महीने के अंत में खाते का पूरी तरह खाली हो जाना, या सट्टेबाजी/ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स पर लगातार किए गए बड़े लेन-देन ग्राहक की वित्तीय साख को तुरंत कमजोर कर देते हैं।
5. क्रेडिट यूटिलाइजेशन रेशियो (CUR): क्या आप पूरी लिमिट खंगालने के आदी हैं?
क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते समय 'क्रेडिट यूटिलाइजेशन रेशियो' (CUR) पर नजर रखना बहुत जरूरी है। यह वह अनुपात है जो बताता है कि आपको मिली कुल क्रेडिट लिमिट में से आप औसतन कितना खर्च कर रहे हैं। बैंकिंग मानकों के अनुसार, CUR का स्तर 30% से नीचे होना आदर्श माना जाता है।
यदि किसी कार्डधारक की कुल लिमिट ₹2 लाख है और वह हर महीने ₹1.8 लाख (90%) तक कार्ड स्वाइप करता है, तो बैंक उसे 'क्रेडिट-हंग्री' (पैसे की तंगी से जूझ रहा व्यक्ति) मानते हैं। लगातार हाई यूटिलाइजेशन यह दर्शाता है कि व्यक्ति अपनी नियमित जरूरतों के लिए भी उधारी पर निर्भर है, जिससे अप्रत्याशित वित्तीय संकट आते ही उसके डिफॉल्ट करने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
6. सिक्योर्ड बनाम अनसिक्योर्ड लोन का संतुलन: आपके पास किस तरह का कर्ज है?
ऋणदाता यह भी देखते हैं कि ग्राहक के मौजूदा कर्ज पोर्टफोलियो में किस तरह के लोन शामिल हैं। भारतीय रिजर्व बैंक भी बैंकों को अनसिक्योर्ड लोन पर नियंत्रण रखने की सख्त हिदायत देता रहा है।
लोन मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं: सिक्योर्ड (होम लोन, गोल्ड लोन, ऑटो लोन—जहां कोई संपत्ति गिरवी होती है) और अनसिक्योर्ड (पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड कर्ज, कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन)। यदि किसी व्यक्ति के पास केवल मल्टीपल पर्सनल लोन और कई क्रेडिट कार्ड आउटस्टैंडिंग हैं, तो बैंक उसकी प्रोफाइल को 'हाई रिस्क' श्रेणी में डाल देते हैं। इसके विपरीत, होम लोन जैसा सिक्योर्ड लोन पोर्टफोलियो में होना वित्तीय स्थिरता और संपत्ति निर्माण का परिचायक माना जाता है।
7. 'क्रेडिट हंगर' और इंक्वायरी पैटर्न: यह आखिरी फैक्टर खोल देता है डिफॉल्ट की पोल!
यह वह सातवां और सबसे निर्णायक पैमाना है जिस पर बैंक सबसे ज्यादा सतर्कता बरतते हैं, और यही प्वाइंट यह तय करता है कि ग्राहक सुरक्षित है या डिफॉल्ट के मुहाने पर खड़ा है। इसे क्रेडिट की भाषा में 'रिसेंट हार्ड इंक्वायरी' (Recent Hard Inquiries) या 'क्रेडिट हंगर' कहा जाता है।
जब कोई व्यक्ति लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन करता है, तो बैंक उसकी क्रेडिट रिपोर्ट चेक करता है, जिसे 'हार्ड इंक्वायरी' कहते हैं। यदि बैंक देखता है कि ग्राहक ने पिछले 30 से 60 दिनों के भीतर एक साथ 5-6 अलग-अलग बैंकों या एनबीएफसी (NBFCs) में पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए धड़ाधड़ आवेदन किए हैं, तो सिस्टम तुरंत अलर्ट हो जाता है। इसका साफ मतलब होता है कि ग्राहक गंभीर नकदी संकट में फंसा हुआ है और जहां से भी पैसा मिले, उठाने की कोशिश कर रहा है। कई बार ग्राहक एक लोन की ईएमआई चुकाने के लिए दूसरा नया लोन लेने की जुगत में होते हैं। जैसे ही बैंक को यह 'क्रेडिट हंगर' और डेस्परेशन नजर आता है, वह भांप जाता है कि यह ग्राहक भविष्य में डिफॉल्ट की ओर बढ़ रहा है, और ऐसे आवेदन को तुरंत रिजेक्ट कर दिया जाता है।
UK News