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Mission Kerala : क्या अमित शाह सच में ‘वामपंथ के गढ़ में सेंध लगा पाएंगे? जानें अंदर की प्लानिंग

News India Live, Digital Desk : भारतीय राजनीति में जब भी किसी ‘कठिन चुनौती’ की बात होती है, तो दक्षिण भारत का नाम सबसे ऊपर आता है, खासकर केरल। बरसों से बीजेपी वहाँ अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि अमित शाह ने कुछ बड़ा प्लान कर लिया है। हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह के केरल दौरे ने राज्य की सियासी सरगर्मी को एकदम से तेज कर दिया है।हवा का रुख बदल रही है ‘त्रिशूर’ की जीतसच्चाई तो ये है कि सालों तक केरल में बीजेपी को एक ऐसी पार्टी के तौर पर देखा जाता था जिसका वोट प्रतिशत तो बढ़ता है, लेकिन सीटें नहीं आतीं। मगर त्रिशूर में सुरेश गोपी की जीत ने बीजेपी के लिए उम्मीद की एक नई खिड़की खोल दी है। अमित शाह इस बात को अच्छे से जानते हैं कि अगर एक सीट जीती जा सकती है, तो पूरा प्रदेश भी जीता जा सकता है। अब बीजेपी इसे महज ‘सपना’ नहीं, बल्कि अपना अगला बड़ा प्रोजेक्ट मानकर चल रही है।शाह की रणनीति: सिर्फ रैली नहीं, बूथ पर फोकसअमित शाह के ‘मिशन केरल’ की सबसे खास बात यह है कि वे सिर्फ बड़ी रैलियां करके वापस नहीं आ रहे हैं। इस बार उनकी रणनीति बहुत माइक्रो लेवल (सूक्ष्म स्तर) की है। वे कार्यकर्ताओं के साथ बैठकर सीधे फीडबैक ले रहे हैं। अमित शाह का सीधा संदेश है— “बूथ जीतो, चुनाव जीतो।” यानी बीजेपी अब राज्य के हर घर तक पहुँचने की योजना बना रही है, ताकि वामपंथ (LDF) और कांग्रेस (UDF) के पारंपरिक गढ़ को ढाया जा सके।नया समीकरण: जातियों और समुदायों को जोड़नाकेरल में राजनीति सिर्फ विचारधारा की नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों की भी है। अमित शाह इस बार राज्य के ईझवा समुदाय और ईसाई समुदाय के बीच बीजेपी की पैठ मजबूत करने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। आपने गौर किया होगा कि पिछले कुछ समय में बीजेपी ने ईसाई धर्मगुरुओं से संवाद काफी बढ़ाया है। अमित शाह का मानना है कि जब तक बीजेपी समाज के हर वर्ग को साथ नहीं जोड़ेगी, तब तक केरल की राह आसान नहीं होगी।चुनौतियां अभी बाकी हैंऐसा नहीं है कि रास्ता एकदम साफ है। केरल में सीपीएम का संगठन बहुत मजबूत है और कांग्रेस का अपना पुराना आधार है। लेकिन अमित शाह को अपनी चुनावी बिसात बिछाने के लिए जाना जाता है। इस बार केरल विधानसभा चुनावों के लिए उन्होंने जिस ‘ऑपरेशन’ की शुरुआत की है, उसने विपक्षी पार्टियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।आने वाले दिनों में यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि क्या केरल की जनता अब किसी ‘तीसरे विकल्प’ को मौका देती है या फिर शाह का यह मिशन अभी और लंबा चलेगा।